बदनिन से विदेशी पर्यटक तक करवा रहे गोदना
* अनाज के बदले अब रूपए मांगे जाने लगे
जबलपुर। बैगा जनजाति में गुदना बनाने वाली महिलाएं जिन्हें बदनिन कहा जाता है अब उनके पास पर्यटकों की भीड़ रहती है। गुदना आम टेटू बनाने की तुलना में भारी चुभव एवं दर्द पहुंचाने वाला होता है। इस गोदना की स्याही भी बदनिन ही तैयार करती हैं। पीड़ियों से काम करने वाली ये बदनिन गुदना की स्याही बनाने का तरीका अपने परिवार के ही सदस्यों को सिखाते हैं।
समीपवर्ती आदिवासी बाहुल्य बैगा चक के हर गांव में एक दो बदनिन मौजूद होती है। दरअसल बैगा संस्कृति का एक हिस्सा गुदना है। हरेक आदिवासी महिलाओं के श्रंगार में गुदना प्रमुख होता है। जब लड़की जब 7-8 वर्ष की होती है तभी उसके माता पिता उसकी खूबसूरती लिए गुदना करते हैं। युवतियों में तो जबदस्त शौक होता है।
बैगा जनजाति पर गहन अध्ययन करने वाले डॉ.वी चौरसिया ने बताया कि डिंडौरी जिले के आदिवासी इलाकों में गोदना परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। गोदने के आधार पर बैगा आदिवासी की उम्र व समाज की पहचान की जा सकती है।
आय का जरिया बना
गोदना गोदने वाली बदनिन पहले अनाज के बदले ये महिला बैगाओं के शरीर पर गोदना बना देती थीं किन्तु बैगा चक में कान्हा होकर आने वाले पर्यटकों के कारण वे भी अब गोदना के बदले रूपए लेने लगी हैं। देशी विदेशी पर्यटक उनसे गोदना बनवाते है। पर्यटकों से 50 से 100 रूपए तक मिल जाते है जबकि बैगा महिलाओं से अब भी उन्हें विशेष आमदनी नहीं हो पाती है।
ऐसे तैयार होती है स्याही
गोदना बनाने वाली विशेष स्याही काले तिलों को अच्छी तरह भून कर कर उसका लौंदा बनाकर जलाया जाता है। जलने के बाद प्राप्त स्याही को एक प्रकार की गोंद में मिलाकर पूरी तैयार कर ली जाती है। इसमें भिलवां रस, मालवन वृक्ष का रस या रामतिल में फेंट कर इस्तेमाल किया जाता है। गोदना बनाने के लिए सुई में डुबो डिबो कर बदनिन विशेष प्रकार की आकृति एवं चिन्ह बनाकर गोदना करती है।
विदेशी संक्रमण का शिकार
गोदना के दौरान होने वाले जख्म में अमूमन बैगा महिलाओं को इंफैक्शन नहीं होता है लेकिन पर्यटक अधिकांश इंफैक्शन का शिकार हो रहे है। हाल ही में पर्यटक को गोदना के बाद इंफैक्शन हो गया। इस पर गोदना करने वाली महिला ने ही जड़ी-बूटी से इलाज किया।
राजा से बचाने हुई प्रथा प्रारंभ
बैगा में चलने वाली कथा के मुताबिक बैगा राजा कामुक प्रवृति का था। वह जिस लड़की का उपभोग करता था, उसके शरीर में गोदना की सुईसे निशान बना दिया करता था। राजा के चंगुल से बचने बैगाओं ने अपनी लड़कियों के शरीर में गोदना का निशान बनाने लगे। ऐसी भी धारणा है कि गोदना से चर्म रोग तथा गठिया बात जैसी बीमारी नहीं होती है।
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