Sunday, 31 May 2015

ट्रांजिट हाउस उपलब्ध नहीं संसाधन

 जबलपुर। पशु चिकित्सा महाविद्यालय में स्थापित वन्य प्राणी केन्द्र सिर्फ नाम का रह गया है। यहां शाकाहारी एवं मांसाहारी वन प्राणियों को उपचार के दौरान रखने के लिए ट्रांजिट हाउस तक नहीं है। बांधवगढ़, पन्ना, पेंच तथा कान्हा नेशनल पार्क के मध्य स्थित जबलपुर स्थित वन प्राणी केन्द्र से वन विभाग के बड़ी आशाएं थीं लेकिन जबलपुर में नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय हो जाने के बावजूद यहां ट्रांजिट हाउस तक नहीं बन पाया है जिसके परिणाम स्वरूप घायल और बीमार वन्य प्राणियों को अकाल मौत के मुंह में जाना पड़ता है। सिर्फ पशुचिकित्सालय महाविद्यालय ही नहीं वन अमने के पास भी ट्रांजिट हाउस नहीं है।  केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के नियमों के अनुसार चिड़िया को रखने के लिए  तैयार होने वाले ट्रांजिट रूम के लिए 20 फुट लम्बा, चौड़ा और उंचा बाड़ा होना चाहिए। इसमें घायल परिंदे अथवा उसके असहाय बच्चों को तब तक रखा जा सकता है जब तक वह स्वयं प्राकृतिक वातावरण में जीवित रहने लायक न हो जाए। इसी तरह शाकाहारी प्राणी, हिरन, बारहसिंघा आदि के लिए 10 गुणित 10 फुट का बाड़ा होना चहिए। इसी प्रकार मांसाहारी जीव के लिए 20 गुणित 20 फुट का बाड़ा होना चाहिए। पशुचिकित्सा महाविद्यालय में ट्रांजिट हाउस की जगह कुछ पिंजरे भर मौजूद हैं। बकरी के साथ हिरन का बच्चा   बरगी के जंगल में चरने गई बकरी के साथ पूर्व में हिरन का बच्चा आ गया था। इस नवजात हिरन के बच्चे को रखने एवं उपचार की बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी। जबलपुर में अनेक बार लकड़बग्घा, हिरन, बारहसिंघा जैसे प्राणी घायल अवस्था मिल चुके हैं। इसके उपचार के लिए कम से कम महीना रखना आवश्यक था लेकिन आनन-फानन उन्हें बिना घाव भरे ही जंगल में छोड़ना पड़ा है।  बाघ का इलाज संभव नहीं वन्य प्राणी केन्द्र में बाघ एवं तेन्दुए का इलाज हो सके इसके लिए वन विभाग ने कई करोड़ रुपए इस केन्द्र को दिए थे लेकिन यहां आज तक बाघ   का इलाज संभव नहीं हो पाया है। दरअसल बाघ के उपचार के लिए उस पर शिकंजा कसने के लिए इस्क्यूंजर होना चाहिए लेकिन यह मशीन यहां नहीं है। यहां लाए जाने वाले बाघ को बेहद क्रूरतापूर्वक देशी शिकंजों से दबाकर रखा जाता है।  बाहर जाते हैं उपचार के लिए  हालत ये है कि नेशनल पार्क द्वारा अपने बाघ जैसे वन्य प्राणियों को उपचार के लिए यहां भेजना बंद कर दिया है। उनके उपचार के लिए चिकित्सकों को जंगल ही बुलाया जा रहा है। हाल ही में बांधवगढ़ में एक बाघिन को कॉलर आईडी के कारण गहरा जख्म हो गया था। उसकी प्लास्टिक सर्जरी जबलपुर के पशु चिकित्सकों ने जाकर की थी।  वर्जन  पशु चिकित्सा महाविद्यालय में वन्य प्राणी केन्द्र स्थापित हैं लेकिन ट्रांजिट हाउस नहीं हैं किन्तु उपचार के लिए वन्य प्राणियों को रखने के लिए व्यवस्थाएं और बेहतर करने की योजना हैं। वन विभाग का वन्य प्राणी ट्रांजिस्ट रूम जबलपुर में होना चाहिए। इससे वन प्राणियों को लम्बे समय तक रखकर उस पर अध्ययन एवं अनुसंधान किया जा सकेगा।  एबी श्रीवास्तव ,  डायरेक्टर वन्य प्राणी केन्द्र  पशु चिकित्सा महाविद्यालय वर्जन  मेरे द्वारा जबलपुर पशु चिकित्सा महाविद्यालय में ट्रांजिट हाउस तैयार करने की अनेक बार मांग की जा चुकी है लेकिन विभाग अनसुनी कर देता है। जबलपुर सहित समीपस्थ जिलों में आए दिन वन्य प्राणी वाहनों, खदान, नहर तथा अन्य कारण से गंभीर जख्मी हो जाते हैं, लेकिन इन जख्मी जानवर को रखने कोई व्यवस्था नहीं है। इसी तरह प्राणियों के बच्चों को भी संरक्षण प्रदान करने व्यवस्था नहीं है।  मनीष कुलश्रेष्ठ, वन्य प्राणी विशेषज्ञ  ---------------------------------------------------------- सेना को दुर्गम इलाके में रसद  पहुंचाने तैयार होंगे एलएसव्ही जबलपुर। भारतीय सेना को ऊंचे पहाड़ी और दुर्गम स्थानों पर रसद पहुंचाने के लिए लाइट स्पेस्लिस्ट व्हीकल(एलएसव्ही) की जरूरत महसूस की जा रही है। व्हीकल फैक्टरी द्वारा एलएसव्ही तैयार करने प्रस्ताव तैयार किया है। इसको लेकर सहयोगी कंपनियों को भी आमंत्रित किया जा चुका है। इस व्हीकल के तैयार होने पर दुर्गम स्थलों पर तेजी से लाइट व्हीकल पहुंच कर रसद की आपूर्ति बेहतर तरीके से कर सकेंगे। अति दुर्गम स्थलों में अब भी रसद हैलीकाप्टर से ही पहुंचाई जा रही है।  सूत्रों की माने तो व्हीकल फैक्टरी को ऐसे वाहन तैयार करने की डिमांड सेना से मिली है, इसको लेकर काफी समय से गहन तैयारी चल रही है। ये लाइट व्हीकल वर्तमान में सेना के लिए तैयार हो रहे एलपीटीए तथा स्टालियन से भी हल्के चाहिए। इन वाहनों का स्वरूप कैसा होगा, उसमें कितने एचपी का इंजिन होगा तथा कितना बडेÞ आकार का होगा इसको फिलहाल पूरी तरह गोपनीय रखा गया है। एलएसव्ही की कागज में डिजाइन तैयार की गई है।  उल्लेखनीय है कि व्हीकल फैक्टरी में सेना के लिए वाहन उत्पादन के कार्य में काफी पिछड़ चुकी है। यहां वर्तमान सेना मारूति कंपनी की जिप्सी तथा टाटा कंपनी की 407 व्हीकल को उपयोग व्यापक पैमाने में करती है। जिप्सी एवं टाटा 407 को बुलेट प्रूफ बनाने का काम व्हीकल फैक्टरी के पास है। इसे आर्मड बनाने के लिए फैक्टरी इसका वजन काफी बढ़ा देती है लेकिन वहान के इंजन की क्षमता बेहतर होने के कारण आर्मड जिप्सी एवं टाटा 407 काफी सफल वाहनों की श्रेणी में हैं। इन वाहनों का इस्तेमान सेना गश्ती तथा सोल्जर के परिवहन के लिए  भी करती है लेकिन सेना को ऐसे हल्के वाहनों की आवश्यकता है जो दुर्गम स्थानों में तेज गति से पहुंच सके। इसके लिए न्यू डिजाइन तैयार की जा रही है और इसको तैयार करना भी व्हीएफजे ने प्रस्तावित किया है।  -------------------------------- ये होना नए मॉडल की विशेषता   * 5-6 सैनिकों को ले जाने की क्षमता * सैनिक न होने पर रसद परिवहन * गश्ती में उपयोगी होना चाहिए * सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर  * गुणवत्ता के अंतराष्ट्रीय मापदण्ड के अनुरूप   ---------------------------- सुलगते जीवन में इंद्रधुनषी रंग बिखरने प्रयास  बेसहारा बालिकाओं का जीवन संवारने ‘ इंद्रधनुष- आओ रंग बिखेरे’ योजना शुरू जबलपुर। जबलपुर में  पुलिस महानिरीक्षक महिला प्रकोष्ठ कार्यालय द्वारा ‘ इन्द्र धनुष -आओ रंग बिखेरे योजना ’ शुरू की गई है। इस योजना के नाम से जाहिर होता है  कि इन्द्र धनुष की तरह  सुन्दर और सभी रंग से खूबसूरत रचना बनाने संबंधी योजना है। जी हां समाज की एक ऐसी बालिका जिसके माता पिता नहीं है  बेसहारा है, के जीवन में खुशियों के रंग बिखेरने की योजना है। प्रदेश में समुदायिक पुलिसिंग के तहत पुलिस महिला प्रकोष्ठ द्वारा ये योजना प्रारंभ की गई है।  शहर में ऐसी बालिकाएं जो भीख मांग रही है या कहीं मजदूरी करके पेट  की बाग बुझा रही है। उसका बपचन कहीं गुम है। बाला अवस्था सुलगता जीवन बना है और  कू्रर समाज उस पर गिद्ध की तरह  भूखी नजर गढाए है , उसको नोचने और खाने के लिए  तैयार बैठा है,उसकी पहचान कर उसका भवष्यि सुरक्षित करने की पहल नगर में प्रारंभ की गई है। योजना के तहत इस बेसहारा बालिका के जीवन में खुशियों के रंग भरने के लिए उसके लिए एक परिपालक की भी तलाश की जाएगी। इस परिपालक का बालिका को सहारा मिलने से वह भविष्य में सबल आत्मनिर्भर नारी बनकर पुरूष प्रधान  समाज में सम्मान के साथ जीवन जी सकेगी।  इस   योजना का उद्देश्य है कि बालिका के जीवन में  खुशियों के रंग भर जाए लेकिन वर्तमान व्यवस्था में  यह सम्भव प्रतीन नहीं होता  है  कानून या किसी शासकीय कार्यक्रम से गुमनाम  निराश्रित बालिका को सहारा मिल पाए।  इस तथ्य को ही ध्यान में रखते हुए आईजी महिला प्रकोष्ठ प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव एवं उनके अधीनस्थ इंस्पेक्टर सुरेखा परमार व अन्य  ने एक ऐसी योजना शुरू करने की कल्पना को सकार रूप दिया जिसमें समाज के हर वर्ग, समाज सेवी संस्थाएं और सहृदय लोग के सामुहित प्रयास से निरापद बालिकाओं को सहारा मिल सके। इसमें शासकीय तंत्र का भी सहयोग रहेगा। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह तो इस योजना का शुभारंभ करते वक्त बेहद भावुक हो उठे थे। बहरहाल जबलपुर में भविष्य की एक  बड़ी योजना का बीजारोपण गत शुक्रवार को हो गया।  योजना के संबंध में महिला इंस्पेक्टर सुरेखा परमार ने बताया कि बालकों एवं किशोरों/किशोरियों  को संरक्षण  देने के लिए कानूनी प्रावधान है। उनके लिए सेल्टर हाउस भी है। कई एनजीओ एवं समाजसेवी संस्थाएं कार्य भी कर रही है  लेकिन इसके बावजूद इस दिशा में विशेष गति से कार्य नहीं हो पाए  हैं। अनेक मामले में देखा गया कि ऐसी निराश्रित बालिकाओं को इनके किशोर होने के साथ ही 12-13 वर्ष की उम्र में ही बेंच दिया जाता है अथवा देह व्यापार के घिनौने काम में उतार दिया जाता है। अंधेरी दुनिया में ऐसी अनगिनत बालिकाएं मौजूद  हैं। इस हालत में पहुंचने के पहले ही उन्हें आश्रय देने की जरूरत है। जबलपुर की समाज सेवी संस्थाओं को साथ लेकर निराश्रित बालिकाओं के संरक्षक या प्रतिपालक बनाए जाने का काम सौंपा गया है। दरअसल ये गोद लेने से थोड़ी भिन्न प्रक्रिया है। इसमें बालिकाआें के प्रति उनके संरक्षकों या प्रतिपालकों के दायित्व तय है। वे व्यक्ति अथवा संस्थाएं हो सकते हैं। इसके तहत उनके सुरक्षित आवासीय व्यवस्था, शिक्षा, भरणपोषण एवं स्वास्थ्य का दायित्व सौंपा गया है।  वर्जन   समाज में निराश्रित बालिकाओं को चिंहिंत किया जा रहा है। इसकेअतिरिक्त प्रतिपालक बनने वालों के आवेदन लिए जा रहे हैं तथा उनका पुलिस सत्यापन के उपरांत नोडल अधिकारी के टीम की मौजूदगी में उन्हें जवाबदारी दी जाएगी। निश्चित ही आने वाले समय में यह योजना से लाभांवित होने वाली बालिकाओं की संख्या बढ़ेगी। इसके अतिरिक्त ये योजना अन्य जिलों में भी लागू की जाएगी। योजना के तहत भविष्य में  बेसहारा बालक को भी इसी तरह  से संरक्षण प्रदान करने का विचार है।  फिलहाल प्रदेश में सिर्फ जबलपुर में ये पहला  प्रयास है।   श्रीमती प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव  आईजी महिला प्रकोष्ठ प्रारंभिक चरण की स्थिति एक नजर में  प्रतिपालक बालिकाएं  मप्रवि महिला मंडल - 2 वनवासी चेतना आश्रम -1 एमपी सिंह, कंपनी कमांडर - 2 इंस्पेक्टर सुरेखा परमार -1 श्रीराम शर्मा एसएएफ -1 एमके पांडे -2 मनु खेत्रपाल -1 संध्या विनोदिया -2 सुजाता सिंह -1 गिरीश बिल् लौरे -1  रजनीश सिंह -1  -दावे-आपत्तियों के निराकरण में बरतें सतकर्ता --------------------------------------------------------------- - बांधवगढ़ में बसंत फिल्मांकन की रहेगी होड़ बीबीसी से तीन साल का करार  जबलपुर। बांधवगढ़ में बसंत के महीने जहां पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी। इसके साथ ही यहां फोटोग्राफी भी जमकर होगी। बांधवगढ़ की बसंत फिल्मांकन में अच्छी कमाई होने वाली है। एक वर्ष में बांधवगढ नेशनल पार्क ने करीब एक करोड़ रूपए से अधिक फिल्मांकन में कमाए है।  प्राप्त जानकारी के अनुसार बांधवगढ़ में देशी एवं विदेशी पर्यटकों द्वारा की जाने वाली छायांकन पार्क की बड़ी कमाई का जरिया रहता है। यहां देशी फोटोग्राफर से फिल्मांकन के प्रतिदिन 20 हजार प्रतिदिन तथा 40 हजार रूपए विदेशी फोटोग्राफर से प्रतिदिन लिए जाते है। इसके अतिरिक्त फिल्मांकन के लिए यदि हाथी उपलब्ध कराने के लिए 12 हजार रूपए प्रतिदिन लिया जाता है। फोटो ग्राफरों को जंगल के बसंत फिल्मांकन पर बेहद रूचि रहती है। यूं तो अन्य सीजन में भी फोटाग्राफी चलती है लेकिन बसंत में ज्यादा फिल्मांकन होता है।  फिल्मांकन के लिए अनुमति  पार्क में लम्बी सूटिंग के लिए बकायदा नेशनल पार्क अर्थाटी से अनुमति लेनी पड़ती है। सूत्रों की माने तो हॉल ही में बीबीसी को 100 दिन की सूटिंग की अनुमति मिली है। पार्क में बारिश के सीजन जून से अक्टूबर तक बंद रहता है। पार्क में सावन-भादों का फिल्मांकन एवं फोटो ग्राफी के लिए पूर्व में भी कई आवेदन आ चुके है लेकिन यहां बारिश में प्रवेश बंद रहता है जिसके कारण अधिकांश फोटोग्राफर बसंत का सीजन ही फोटोग्राफी के लिए पसंद करते है। इस सीजन में जंगल में जीवन खिल उठता है।   बीबीसी से करार  बीसीसी ने बांधवगढ़ में सौ दिन की शूटिंग की अनुमति मिल गई है। करार के तहत ये शूटिंग तीन साल चलेगी। बारिश में शूटिंग की अनुमति नहीं मिली है। मार्च महिने में 30 दिन बीबीसी बांधवगढ़ की शूटिंग करेगी। इसके बाद  वर्ष 2016 तथा 2015 में भी मार्च माह में ही शूटिंग होगी। ये शूटिंग हाथी के साथ जिप्सी से की जाना है। हिडैन कैमरे का उपयोग होना है। ऐसी भी संभावना है कि रैनी सीजन के दस दिनों की शूटिंग की विशेष अनुमति बीबीसी को मिल सकती है।  तीन साल होगी शूटिंग  बीबीस ने इस वर्ष मार्च माह में शूटिंग करने का एडवांस भुगतान करीब 44 लाख रूपए कर   दिया है। पार्क में पिछले वर्ष एक करोड़ से अधिक रूपए फिल्मांकन से अर्जित किए थे। इसके पूर्व भी पार्क में शूटिंग हो चुकी है।  सीएच मुरली कृष्ण  फील्ड डायरेक्टर बांधवगढ़ नेशनल पार्क   दो वर्ष अगले दो वर्ष डेढ़ करोड़ रूपए में बसंत फिल्म --------------------------------------------------- दक्षिण भारत में भी बिकने लगी आदिवासी बालाएं  डिंडौरी में लड़कियां बेंचने वाले दलाल ने खोला राज  जबलपुर। आदिवासी जिले डिंडौरी और मंडला में आदिवासी बालाओं की तस्करी का कारोबार थम नहीं रहा है। यहां आदिवासी बालाओं को दिल्ली नोयड़ा और उत्तराखंड में बेचे जाने का अवैध कारोबार धडल्ले से चल रहा है। कई गिरोह पकड़े भी जा चुके है लेकिन गत 20 जनवरी को डिंडौरी पुलिस ने जब मानव दुर्व्यापार में जुड़े दो दलालों को पकड़ा तो पहली बार यह राज खुला कि आदिवासी बालाएं दक्षिण भारत में भी बिक रही है।   दरअसल अपराधी बालाओं को मजदूरी के बहाने दूसरे राज्यों में ले जाकर बेंच रहे हैं, जिससे काफी समय तक पुलिस की निगाह में नहीं आते है। हाल ही में डिंडौरी जिले में चौकाने वाला मामला प्रकाश में आया जिसमें एक आदिवासी युवती को केरल में बेचने ले जाया जा रहा था जिसको पुलिस ने पकड़ा। पुलिस मामले की अब भी गहन जांच पड़ताल में जुटी है।   जबलपुर के पड़ोसी जिले मंडला और डिडौंरी में मानव व्यापार का अवैध कारोबार पिछले एक दसक से चल रहा है। पुलिस के आला अफसरों का भी मानना है कि इस कारोबार पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। दूर- दराज के आदिवासी गांवों में बालाओं को काम धंधे में लगाने के बहाने उनके अभिभावकों को रकम देने के बाद दलाल ले जाते है और ये बालाएं बंधुआ मजदूर बना ली जाती है। इतना ही नहीं इनका दैहिक-शोषण भी होता है।  तीन अपराध दर्ज  डिंडौरी जिलें में बीते वर्ष आदिवासी युवतियों को बेचे जाने के तीन मामले पंजीबद्ध किए गए है। इसमें आरोपी भी पकड़े गए। इसी तरह मंडला जिले में दो मामले दर्ज हुए जबकि जबलपुर में मानव व्यापार का एक भी मामला दर्ज नहंी है जबकि यहां भी युवतियां छतरपुर एवं राजस्थान में बेची जाने की घटनाएं वर्ष 2014 में प्रकाश में आई है।  विवाह के नाम पर अपहरण डिंडौरी में ही गत 20 जनवरी को समनापुर थाना में दो दलाल द्वारा मिलकर एक आदिवासी बाला को केरल बेंचने के लिए ले जा रहे थे जिन्हें पुलिस ने सुनियोजित तरीके से दबोचा। समनापुर पुलिस के अनुसार रामसहाय नामक दलाल जो कि लम्बे अर्से से आदिवासी बालाओं के बेंचने के मामले में संदिग्ध है। वह अपने साथी भले सिंह के सम्पर्क में आया। उसके साथी ने  ने एक युवती का विवाह राम सहाय से कराने का झांसा दिया और उसको विवाह के बहाने डिडौंरी लेकर पहुंचा था तथा वहां से केरल ले जाकर बेचने की योजना थी लेकिन इसके पहले ही पुलिस ने दोनों को दबोच लिया। पुलिस ने इस मामले में अपहरण का मामला दर्ज किया है। केरल गई है टीम सूत्रों के अनुसार पुलिस को चौकाने वाली जानकारी आरोरियों से मिली है। उसके अनुसार डिंडौरी के अतिरिक्त मंडला से भी कई आदिवासी बालाएं केरल में बेंची जा चुकी है। केरल में आदिवासी बालाओं को खरीद कर दक्षिण भारत के बड़े शहरों में सप्लाई करने वाला गिरोह सक्रिय है। इस गिरोह की तलाश के लिए टीम केरल गई है। पुलिस इस मामले में संजीदगी से पड़ताल करे तो एक बड़ा नेटवर्क सामने आ सकता है।  पुलिस मामले की जांच पड़ताल कर रही है। केरल भी पुलिस दल रवाना किया गया है। दरअसल मजदूरी के बहाने अधिकांश लड़कियों को बाहर ले जाया जाता है जिसके कारण उनके अपहरण की भी रिपोर्ट नहंी होती है। आदिवासी क्षेत्र में बालाओं को बेचे जाने कुप्रथा जैसे है। इसके लिए व्यापक सर्वे की जरूरत है लेकिन पुलिस की सख्ती के कारण काफी समय से ऐसी बड़ी घटना प्रकाश में नहीं आई है।  मोहम्मद यूसूफ  पुलिस अधीक्षक डिंडौरी   ................................................................................................ समाज सेवा में समर्पित दंपत्ति  दीपंकर और मिताली बैनर्जी ने दी शहर को विकलांग सेवा की नई राह जबलपुर। गैर सरकारी संगठन विकलांग सेवा भारतीय संस्था से जुड़ कर समाज के विकलांग बच्चों के कल्याण के लिए काम करने रही बैनर्जी दंपत्ति ने सिर्फ नि:शक्त बच्चों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का समाज सेवी कार्य भर नहीं किया बल्कि इनके कार्य के प्रति लगन एवं सेवा भाव से समाज प्रेमी और लोगों को प्रेरणा मिली और जबलपुर में विकलांगों की सेवा क्षेत्र में एक क्रांति ने जन्म लिया। यही वजह है कि आज दर्जनों लोग इस क्षेत्र में सेवाभाव से कार्य कर रहे हैें।  यदि विकलांग सेवा भारतीय संस्था की बात की जाए तो संस्था 1960 से मान्यता प्राप्त है। जबलपुर में सन् 1991 से ही सही मायने में समाज के  सामने आई। जबलपुर में मानसिक रूप से मंद तथा मूक-बधिर बालक-बालिकाओं के लिए संस्था कार्यरत है। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 14 जनवरी 1991 में विकलांग सेवा भारती ने दो बच्चों के साथ काम करना शुरू किया। सन् 1994 से पूर्व सांसद जयश्री बैनजी के सुपुत्र दीपांकर बैनर्जी इस संस्था से जुड़ कर समाज के नि:शक्त बच्चों की सेवा कार्य में जुड़े तो संस्था ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और विकलांग बच्चों की सेवा के लिए बकायदा दो स्कूल  संचालित होने लगे।   वर्तमान में संस्था में लगभग 150 बच्चे हैं। इन विकलांग बच्चों को इस तरह संस्था में सक्षम बनाया जा रहा है कि यहां से पढ़ने एवं प्रशिक्षण पाने वाले अब सामान्य जीवन में स्वालम्बी बन चुके है। स्वयं का रोजगार कर रहे हैं या फिर किसी संस्था में पूरी जिम्मेदारी से नौकरी कर रहे है।  संस्था को अपने उद्देश्यों में सफलता तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान दीपांकर बैनर्जी का है। दीपांकर बैनर्जी ने सिर्फ जबलपुर ही नहीं बल्कि प्रदेश में विकलांग बच्चों के कल्याण के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। श्री बैनजी सन 2007 से लेकर 2014 तक आयुक्त नि:शक्तजन के पद पर रहे तथा नि:शक्तों के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए।  श्री बैनर्जी ने बताया कि मुझे बेहद खुशी मिलती है नि:शक्त बालक बालिकाओं के कल्याण के लिए कार्य करने में। मुझे इसके लिए अपनी माताजी का आर्शिवाद प्राप्त है। सर्वाधिक खुशी की बात है कि जबलपुर से हर बार दो-तीन विकलांग बालक बालिकाएं  विकलांगों के लिए आयोजित ओलम्पिंक में भाग लेते है। इस वर्ष भी दो विकलांगों का जबलपुर से चयन हुआ है। संस्था के पुलिस लाइन तथा जार्ज टाउन स्कूल में दो प्रशिक्षण संस्थाएं संचालित की जा रही है।  मिताली बैनजी का सहयोग अपने पति दीपांकर बैनर्जी के साथ समाज सेवा के कार्य में हमेशा उनकी धर्मपत्नी मिताली बैनर्जी का सहयोग रहा है। परिवारिक कामकाज के बाद जब भी समय निकलता है वे समाज सेवा के पुनीत कार्य में अपनी आहूति देती रही है। विकलांगों की सेवा में समर्पित उनके कार्य के चलते उसको विकलांग सेवा भारतीय संस्था में महत्वपूर्ण एवं जिम्मेदारी का सचिव पद सौंपा गया है। आज उनके नेतृत्व में विकलांग सेवा भारतीय संस्था उत्तरोत्तर प्रगति कर रही है और नित नए आयाम दिशा में स्थापित कर रही है। विकलांग सेवा भारतीय संस्थान के बालक बालिकाओं द्वारा उत्पादित सामग्री को लेकर मेला एवं  कार्यक्रमों में लगने वाले स्टॉल में लोगों की भीड़ स्वयं बयान कर देती है कि उनको उच्च्चकोटी का और प्रतिस्पर्धा में खरे उतरने वाला प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे विकलांग समाज की मुख्यधारा में जुड़ने के बाद स्पर्धा में अव्वल रहें।  .................................................................................................... 7771837888 शहर के आटो चालक स्मैक की गिरफ्त में  स्मैक के अवैध कारोबार का मकड़जाल फैला जबलपुर। शहर में स्मैक का मकड़जाल जबदस्त तरीके से फैलता जा रहा है। स्मैक  बढ़त

ब्रिटिश हुकुमत की यादगार टॉउन हॉल गांधी प्रतिमा अनावरण के साथ बन गया गांधी भवन

  जबलपुर। भारतीय इतिहास में ईस्ट इंडिया कम्पनी की लूट खसोट एवं भारतीय राजवाड़ों को हड़पे जाने से उपजे 1857 के विद्रोह बाद भारत में ब्रिटिश हुकुमत ेकी यादगार है टॉउन हॉल। दरअसल ब्रिटेश की महारानी विक्टोरिया के जुबली वर्ष पर उनकी चिरकालीन स्मृति में जबलपुर के राजा   गोकुलदास राय बहादुर बल्लभ दास सेठ ने 30 हजार रूपए की लागत से भवन बनाकर ब्रिटिश कमिश्नर को 1890 में सौंपा था। इसका भवन को जनता के उपयोग के लिए बनाया गया था बाद में इसका संचालन नगर निगम के हाथों में आ गया।  आजादी पूर्व के नगर पालिका इस भवन को नगर में होने वाले उत्सव एवं कार्यक्रमों के लिए उपयोग करती रही है। वर्षो तक इस ऐतिहासिक इमारत का नाम टाउन हाल रहा है। ये नाम देश प्रेमियों को ब्रिटिश हुकुमत की यादगार दिलाता रहा  है। जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को तो भी भी हाउन हाल नाम पसंद नहीं आया।  ये इमारत ब्रिटिश साम्राज्ञी की स्मृति पर बनी जरूर लेकिन इस दौर में भवन कला का ये बेजोड नमूना रही है। फारसी और भारतीय स्थापत्य कला का मिला जुला नमूना है। भारतीय शैली से पत्थर की नींव तथा फारसी इंजीनियरिंग के आधार पर बेस स्थापित किया गया। इसकी दीवारे डेढ़ से दो फुट मोटी पक्के ईटों की थी। ईटों के बीच चूना और रेत की जुड़ाई तथा इसी का प्लास्टर है जो अब भी मौजूद है। बाहरी तथा भीतरी वास्तु सज्जा में  फारसी गुम्बद, झरोके तथा आर्च का बहुतायत से उपयोग किया गया है। सिलालेख में उल्लेख है कि 1890 में तैयार हुए इस भवन की कीमत 30 हजार रूपए थी।  1962 में हुआ गांधी भवन  इस ऐतिहासिक इमारत में आजादी के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की गतिविधियां शुरू हो गई थी। इसको ब्रिटिश शाासन की यादगार के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद और स्मृति से जोड़नें की बात उठने लगी। तत्कालीन महापौर रामेश्वर प्रसाद गुरू ने भवन का कायाकल्प कराते हुए यहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित की गई। इस प्रतिमा का अनावरण  गांधीवादी तथा भू दान आंदोलन के महा नायक जय प्रकाश नारायण ने किया।  जबलपुर का टाउन हाूॅल गांधी भवन हो गया। यहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वाचनालय तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संघ को एक रूम आवंटित है। इसके अतिरिक्त गांधी भवन को नगर निगम का वाचनालय स्थापित है। इसमें एतिहासिक गजट, एतिहासिक समाचार पत्र एवं पुस्तकों के भरमार है। यह वाचनालय जबलपुर एतिहास की अनमोल धरोहर है जिसमें ब्रिटिश हुकुमत के दौरान जारी होने वाले कई आदेश तथा गजट का व्यौरा मिलता है।  वर्तमान हालत गांधी भवन के सामने खुले मैदान में महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित है जिसपर गांधी जयंती तथा 30 जनवरी को कांग्रेसी तथा गांधी विचारधारा के लोग श्रद्धासुमन अर्पित करने आते है। पार्क की दीवार जर्जर हालत हो चली है। फुहारा तथा उसकी टंगी की हालत जर्जर है। टाउन हाल के चारों तरफ जबदस्त गंदगी व्याप्त है।  गांधी की छत्रछाया में नशाखोरी विक्टोरिया अस्पताल के बाजू से स्थित टाउन हाल में गांधी की प्रतिमा तले उनकी छत्रछाया में जबदस्त तरीके से नशाखोरी चलती है। एविल तथा अन्य नशीले इंजेक्शन लगाने वाले तत्वों ने यहां  डेरा जमाए रहते है। वाचनालय के रात्रि 8 बजे बंद हो जाने के बाद परिसर की दीवार कूंद कर नशेलची अपना डेरा जमा लेते हैं।  

समाज से उपेक्षित बंदियों का रहनुमा

 
 राजनीति से हटकर कार्य
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दीपक परोहा
9424514521
 जबलपुर। कमलेश अग्रवाल वर्तमान में नगर निगम में पार्षद एवं मेयर इन काउंसिल सदस्य हैं और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ताओं में शुमार हैं। राजनीति से हटकर समाज सेवा भी कमलेश अग्रवाल अग्रवाल के जीवन का एक हिस्सा है लेकिन इसे चर्चा और सुर्खियों में रखने पर भरोसा नहीं करते हैं। समाज सेवा के क्षेत्र में कमलेश अग्रवाल ने एक अनूठा कार्य कर रहे है जिसपर किसी का ध्यान नहीं जाता है।
वे अपने इस कार्य से केन्द्रीय जेल जबलपुर में वर्षो से सजा काट रहे और अपने समाज और परिवार से उपेक्षित बंदियों के रहनुमा बन गए हैं। दरअसल जबलपुर केन्द्रीय जेल ही नहीं प्रदेश भर के जेल में सैकड़ों की संख्या में ऐसे बंदी हैं जिनकी सजा खत्म हो जाती है लेकिन आर्थिक परेशानियों ओर परिवार व अपने समाज की उपेक्षा के कारण अपना अर्थदण्ड जमा नहीं कर पाते हैं जिससे उन्हें सश्रम कारावास पूरा भुगतने के बाद भी अर्थदण्ड जमा न कर पाने के कारण कारवास भोगना पड़ता है। खासतौर पर जीवन कारवास की सजा प्राप्त बंदी इनमें शामिल हैं जिन्होंने 14 साल की सजा पूरी कर ली और आजाद होने का स्वप्न संजोए है लेकिन आर्थिक तंगी के कारण काल कोठरी में मुक्ति नहीं मिल पाती है। कैद के दिन बढ़ जाते है ऐसे में एक-एक घंटे उन्हें वर्ष समान लगते है। ऐसे बंदियों का अर्थदण्ड जमा करने का काम पिछले पांच साल से कमलेश अग्रवाल कर रहे है। इसके इस कार्य में उनके मित्र एवं परिवार का सहयोग मिलता है।
 15 अगस्त को होती है थोक में रिहाई

कमलेश अग्रवाल जेल के अधिकारियों से संपर्क करके उन बंदियों के सम्बंध में पतासाजी करते हैं जिनको उनके परिवार वाले उपेक्षित कर चुके है। उनका सामाजिक बहिष्कार लगभग हो चुका है। उनसे मिलने जुलने कोई नाते रिश्तेदार नहीं आते हैं और वे अर्थदण्ड भरने की स्थिति में नहंी है। उनकी कुछ महीने या दिनों की सजा भी 15 अगस्त के मौके पर माफ करती है उन बंदियों का अर्थदण्ड श्री अग्रवाल स्वयं भरते हैं, और 15 अगस्त को थोक में रिहाई होती है। यूं तो प्रदेश भर के जेलों में ऐसे बंदियों की भरमार हैं लेकिन व्यक्ति की अपनी सीमाएं होती है। कमलेश अग्रवाल अपने सामर्थ के हिसाब से केन्द्रीय जेल जबलपुर के बंदियों को रिहा कराने में अपना योगदान देतें हैं। ये बंदी जबलपुर के कम बाहरी जिलों के ज्यादा होते है। उनकी रिहाई से कमलेश को राजनैतिक लाभ तो नहीं मिलता है लेकन मन में किसी को आजादी दिलाने का जो सकून महसूस करते हैं उसे वे अनमोल मानते है। कमलेश अग्रवाल की अपेक्षा है कि और शहर ही नहीं प्रदेश के भी और लोग इस तरह के कार्य के लिए आगे आए, जिससे धन के कारण कोई बेवजह एक दिन की भी सजा न काटे।
4 सौ से अधिक को रिहा कराया
श्री अग्रवाल ने अब तक 400 से अर्थिक बंदियों को रिहा करा चुके हैं।  स्वयं एवं परिवार के सहयोग से करीब 4 लाख रूपए का अर्थदण्ड इन बंदियों के बदले भर चुके है। बंदियों को रिहा कराने के अतिरिक्त प्रतिवर्ष वे एक रक्तदान शिविर करते है जिसमें दो से तीन सौ लोग रक्तदान करते है। वे प्रतिवर्ष 31 दिसम्बर को वृद्धजनों के लिए भंडारे का आयोजन करते हैं। उन्होंने छात्र राजनीति से अपना राजनैतिक कैरियर शुरू किया। 45 वर्षीय श्री अग्रवाल 20 साल से सक्रिय राजनीति में है तथा दूसरी बार मेयर इन काउंसिल सदस्य नगर निगम में बने है। इसके अतिरिक्त भाजयुमों में विभिन्न पदों में रह चुके हैं।  

Sunday, 19 April 2015

यह चमत्कार है आधुनिक खेती का


बोरलॉग की 6 सौ एकड़ की फसल में 1 फीसदी नुकसान नहीं

जबलपुर। प्रदेश में इस वर्ष कई बार बारिश और ओले की मार से किसानों की हजारों करोड़ रूपए मूल्य की गेहूं की खड़ी फसलें बिछ गई। बारिश ,आंधी-तूफान और ओलों की मामूली मार ने ही फसलों को मिट्टी में मिला दिया लेकिन जबलपुर स्थित अंतराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र ‘बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया ’ ग्राम लखनवाड़ा की 600 एकड़ की फसल में एक प्रतिशत भी क्षति नहीं हुई, जबकि यहां 14 बार में 114 मिमी बारिश हुई। इस चमत्कार की पीछे कृषि संबंधी बेहद मामूली ज्ञान समझा जा रहा है। प्रदेश के किसान यदि कृषि संबंधी थोड़ी वैज्ञानिक सूझबूझ रखते तो बहुत से किसानों की फसलें बोरलॉग इंस्टीट्यूट की तरह बच जाती।
 देश में कृषि उत्पादन के अनुसंधान के लिए लुधियाना, जबलपुर और पटना में बोरलॉग इंस्टीट्यूट कार्यरत है। जबलपुर में करीब 600 एकड़ में बोरलॉग इंस्टीट्यूट द्वारा गेहूं , धान सहित अन्य उपज की अनुसंधान के उद्देश्य से खेती करता है। इस वर्ष मौसम किसानों के प्रतिकूल रहा है, बोरलॉग से लगे इलाके लखनवाड़ा, पनागर सहित अन्य क्षेत्रों में किसानों की करोड़ों रूपए की फसल पानी के कारण बर्वाद हुई।
आश्चर्य जनक परिणाम
मौसम के कहर से बोरलॉग इंंस्टीट्यूट की फसल पर क्या असर हुआ? इसका सर्वेक्षण फ्लांग डेटा रिकार्ड के माध्यम से  कृषि वैज्ञानिकों की मौजूदगी में हवाई सर्वे किया गया तो आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए कि एक प्रतिशत भी नुकसान नहीं हुआ है।
जड़ भी थी मजबूत
इस सर्वे के अध्ययन के बात वैज्ञानिक नतीजे पर पहुंचे है कि बोरलॉग प्रक्षेत्र में लगाई गई गेहूं की फसल में पौधे की जड़े मजबूत थी जिससे पानी और आंधी के बावजूद फसल खेत में नहीं बिछ पाई। बारिश का पानी फसल के लिए फायदे मंद साबित हुआ। इस वर्ष रिकार्ड उत्पादन की संभावना है।
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वर्जन .....
किसान करते है गलती
किसान बिना जरूरत के यूरिया का छिड़काव कर देते है। इस पर उपज को पानी मिलने पर पौधे में विशेष ग्रोथ मिल जाती है जबकि उसकी जड़ को ग्रोथ नहीं मिलती है। बारिश, आंधी और ओले की मार से जड़ जमीन छोड़ देती है और फसल नष्ट हो जाती है।  बोरलॉक में मृदा परीक्षण के उपरांत यूरिया, फास्फेट एवं व अन्य खाद  का संतुुलित तरीके से छिडकाव किया गया था।  फोटास एवं फॉस्फे ट से जड़ें भी मजबूत हुई थी। संतुलित यूरिया के कारण पौधे में अनावश्यक ग्रोथ भी नहीं होती है। इसी के कारण बोरलॉक में पानी के कारण फसल में नुकसान नहीं हुआ।
डॉ एसएस तोमर
संचालक डायरेक्टर बोरलॉग इंस्टीट्यूट
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खेत को न जलाए
किसान को रसायनिक खाद का उपयोग करने के पूर्व मृदा परीक्षण कराया  चाहिए और वैज्ञानिकों की सलाह पर संतुलित खाद का उपयोग करना चाहिए।  तभी फसलों को बचाया जा सकता है।  खेत की कटाई के बाद नरवाई को  जलाना नहीं चाहिए। यह धारणा गलत है कि खेत को जलाने से उपज अच्छी होती है दरअसल आग लगाने से जमीन में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु जो जड़ों की रक्षा करते है वे मर जाते है। मिट्टी भी कड़ी हो जाती है जिससे मिट्टी में जड़ों की पकड़ कमजोर होती है।
डॉ राज गुप्ता
कृषि वैज्ञानिक

ध्य प्रदेश के जंगलों में अब घुलेगी रक्त चंदन की खुशबू


राज्य वन अनुसंधान केन्द्र में लाल चंदन की रोपणी तैयार, हजारों वृक्ष विभिन्न जंगलों में लगाए
दीपक परोहा
7771837888
जबलपुर। सतपुला के घने सागौंन के जंगलों के में टेसू और पलाश के फूलदार एवं खुशबू वाले वृक्षों के साथ ही अब लाल चंदन की महक से जंगल महकेंगे। इसके लिए राज्स वन अनुसंधान केन्द्र को बड़ी सफलता मिल चुकी है। अत तक हजारों की संख्या में पौधे तैयार किए जा चुके है और उनका जंगलों में रौपण भी किया गया है। इनमें से कई पौधे काफी बड़े हो चुके है और कुछ अभी सरवाइव कर रहे है।
 कडप्पा के जंगल में होता है
दक्षिण भारत में कडप्पा के जंगल में ही सिर्फ रक्त चंदन के पौधे है। इस रक्त चंदन की लकड़ी इमारती लकड़ी के रूप में उपयोग होती है। इसके अतिरिक्त सेंट उद्योग, दवा उद्योग तथा कास्मेटिक्स आइटम व पूजन सामग्री में भारी मात्रा में उपयोग की जातीहै। एक 1000 रूपए  से 2000 हजार रूपए किलो तक की कीमत में बिकती है। लकड़ी की

डिमांड इतनी रहती है कि इसकी पूर्ति नहंी की जा सकती है। पत्ती को छोड़ पूरा पेड़ लाल रंग का होता है।
मध्य प्रदेश में रोपण
राज्यवन अनुसंधान केन्द्र में वर्ष 2002 से रक्त चंदन के पौधे तैयार करने का कार्य चल रहा है। अब तक अमरकंटक से लेकर होशंगाबाद तक नर्मदा नदी के किनारे रक्त चंदन के पौधे रोप जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त बैतूल, होशंगाबाद, सिवनी, बालाघाट तथा मंडला एवं छत्तीसगढ़ के जंगल में रक्त चंदन के पौधे रोपे गए है। इनमें से कुछ बड़े भी हो गए। आने वाले समय में सतपुला के जंगल लाल चंदन की खुबबू से महकने लगेंगे। इस  करोड़ो रूपए की वन संपदा का इजाफा भी होगा।
वर्जन
रक्त चंदन के बीच कड्प्पा से  मंगाकर उससे प्लांट अनुसंधान केन्द्र में तैयार किए जा रहे है। पौध पूजापाठ के भी काम में आते है। वन विभाग को पौधे बेचे जाते  है। इसके अतिरिक्त कुछ संख्या में प्रायवेट व्यक्तियों को भी पौधे

बेचे जाते है। अनुसंधान से यह हम इस  नतीजे पर  पहुंच है कि मध्य प्रदेश के लगभग सभी जंगलों का पर्यावरण एवं जलवायु इस तरह की है कि यहां रक्त चंदन के पौधे पनप सकते है। धीरे-धीरे कर रक्त चंदन प्रदेश के लगभग सभी जंगलों में लगाए  जाएंगे।
डॉ परवेज जलील
पौधा विशेषज्ञ एवं  नर्सरी हैड
राज्य वन अनुसंधान केन्द्र

मोदी का संदेश से नहीं, संस्कार मिला है स्वच्छता का




 जबलपुर के एक मोहल्ला आनंदकुंज गढ़ा में तड़के कोई सेवा निवृत सहकारी निरीक्षक नर्मदा प्रसाद का पता - ठिकाना खोजते हुए पहुंचे और वहां मौजूद किसी से पूछे तो उसे जवाब मिलेगा ... वो देखो जो व्यक्ति पट्टे वाली चड्डी और बनियान पहनकर झाडू लगा रहें हैं वही हंै नर्मदा प्रसाद दुबे। इस वृद्धजन की दिनचर्या सफाई अभियान से ही शुरू होती है।
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इस देश को सबसे पहले स्वच्छता का संदेश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दिया था और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समग्र देश के भाजपा नेताओं , विभिन्न संगठनों व संस्थाओं सहित आला प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में झाडू थमवा दी । प्रधानमंत्री ने स्वच्छता का संदेश नए अंदाज से दिया है, किन्तु 76 वर्षीय आनंदकुंज, दुबे कालोनी गढ़ा निवासी नर्मदा प्रसाद दुबे के लिए ये संदेश कोई नया नहीं है। उनके संस्कार में रचा बसा है स्वच्छता का पुनीत कार्य। ब्राम्हण जाति के नर्मदा प्रसाद  प्रतिदिन झाडू लेकर मोहल्ले की सड़क साफ करते हैं और स्वयं फावड़े से गंदी नाली की सफाई करते हैं। इसमें उनको किसी तरह की लज्जा नहीं आती है। उनका कार्य नेताओं की तरह सिर्फ दिखावा और फोटो खिंचवाने तक सीमित नहीं रहता है। दरअसल वे वास्तव में सफाई करते हैं और इस कार्य में उन्हें आनंद की अनूभूत होती है। अकेले ही सही वे पिछले 60 साल से प्रतिदिन मोहल्ले की सफाई करते आ रहे है। यह जरूर है कि जीवन के लम्बे समय में उनके घर बदला, निवास स्थान बदला लेकिन जहां भी वे रहें, अपने मोहल्ले की नाली सड़क और स्वयं का घर को स्वच्छ रखा।
 76 वर्ष में भी गजब की उर्जा
नर्मदा प्रसाद दुबे 76 वर्ष के हो गए है लेकिन सुबह लगभग पूरी कॉलोनी में

झाडू लगाते है। यह काम 5-10 मिनिट का नहीं घंटो चलता है। सन 1978 से वे यहां रह रहें हैं। उनको इस कार्य की प्रेरणा कहे या संस्कार अपने पिता स्वर्गीय जगन्नाथ दुबे से मिले हैं जो मूलत: डिंडौरी के किसान थे। उनके पिता अपने घर, गौशाला तथा गांव की सड़क की सफाई करते थे। यही गुण उनके संस्कार में बचपन से आ गए ।
गजब के मेघावी
नर्मदा प्रसाद एक पिछड़े जिलें और ग्रामीण परिवेश के हैं लेकिन गजब के मेघावी बचपन से रहे हैं। गांव में स्कूल नहीं होने के कारण उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम की पढ़ाई जबलपुर में हॉस्टल में रखकर की तथा उनको राष्ट्रीय छात्रवृति 9 वीं से 12 वीं तक लगातार मिली। 12 वीं तक पढ़ाई करने के बाद तुरंत ही उनकी नौकरी हाईकोर्ट में बाबू के पद पर हो गई लेकिन यहां कुछ दिन ही नौकरी करने के बाद आगे पढ़ाई करने के लिए नौकरी छोड़ दी तथा बीए, एमए तथा एलएलबी की। दो बार पीएससी में पास हुए लेकिन जब वे साक्षात्कार के लिए पहुंचे थे और साक्षात्कार लेने वालों को पता चलता था कि किस परिवेश से वे हैं तो उन्हें साक्षात्कार में फेल कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सहकारिता विभाग में नौकरी कर ली और सहकारी  निरीक्षक के रूप में सेवानिवृत हुए।
 स्वच्छता मूल प्रवृति
नर्मदा प्रसाद दुबे का कहना है कि मानव ही नहीं जीवजन्तु में स्वच्छता मूल प्रवृति है। जानवर भी सफाई पसंद होता है किन्तु आदमी को स्वच्छता के लिए कार्य करने में लज्जा क्यों आती है? मेरे समझ में नहीं आता है।
नर्मदा प्रसाद दुबे


गीली माटी में पाया जीवन का आनंद और रोटी


  कला की साधना में गुजरा जीवन
जबलपुर। मानव सभ्यता और जीवन इस माटी की ही देन है। सदियों से इस मिट्टी ने लोगों को रोजगार और पेट भरने का साधन दिया है और जीवन अंत में मिट्टी में मिल जाता है। इसी मिट्टी से जन्म लेती है मूर्तिकला। सोनाबाई ने अपने जीवन में इसी मिट्टी के सहारे आनंद पाया, कला की साधना की और गरीबी में ही सही पूरे परिवार की परवरिस इसी के सहारे की।  युगो से धरती में कलाकार जन्म लेते रहे है और उनकी साधना का नतीजा है कि मूर्तिकला शिखर पर है। जबलपुर में भी मूर्तिकला को एक मुकाम में पहुंचाया है सोनाबाई राजपूत ने। उम्र 7 बर्ष से जो मूर्तियां बनाना शुरू की वह 82 वर्ष की आयु होने के बाद भी नहीं थमा है।
 नटराज कला मंदिर फूटाताल निवासी सोनाबाई कहती है कि हर आदमी के जीवन में अलग-अलग परिस्थितियां एवं हालत निर्मित होते है और उसमें बिना हार माने लगन और साधना के साथ कार्य किया जाए तो कांटों भरा जीवन भी आनंद देता है। सोनाबाई ने कुछ ऐसे ही जीवन जीया है। उसने जीवन का सुख और आनंद गीली मिट्टी में तलाश की। सोनाबाई के पिता गणेश प्रताप परिहार मूर्मिकार थे। वे अंग्रेज के काल के मूर्तिकार थे। लोकमान्य तिलक ने जब सार्वजनिक गणेश प्रतिमाएं रखने की शुरूआत की उसके बाद जबलपुर में गणेश जी और दुर्गा की प्रतिमा गणेश प्रताप सिंह ने बनाई। होलिका रखने की प्रतिमा भी बनाना शुरू किया। सोनाबाई ने 7 वर्ष की उम्र में मिट्टी की प्रतिमा बनाने की शुरूआत की तो सन 1941 में गढ़ा फाटक की पहली प्रतिमा सोनाबाई के नाम से बनी।
अपनी दम पर चलाई गृहस्थी
सोनाबाई का विवाह कन्हैया लाल राजपूत से हुआ लेकिन पति की मौत तब हो गई जब उनकी गृहस्थी कच्ची थी। तीन लड़के एवं 4 बेटियों जो अवश्यक थी, उनकी जवाबदारी सोना बाई पर हो गई। मिट्टी की गणेश एवं दुर्गा की प्रतिमा बनाकर बेचना शुरू किया। त्यौहार के समय मूर्तियां बनती थी और

  बिकती थी जिससे साल भर खर्चा चलता था। बेहद गरीबी के बाजवूद मूर्तियां बनाना जारी रखा, आज सभी बच्चों का विवाह कर अपने सभी दायित्व निर्वाह कर जीवन के अंतिम पड़ाव पर है।
 कलात्मकता का का ट्रेंड दिया
 अपनी  मूर्तिकारी के लिए उन्हें प्रदेश एवं केन्द्र सरकार से इनाम मिल चुके है। मिट्टी मूर्ति के साथ ही कल्चर मार्बल एवं पत्थर की मूर्तिया भी बनाई। सोनाबाई द्वारा महापुरूषों की कल्चर मार्बल की बनाई गई अनेक मूूर्तियां शहर में स्थापित है। सोनाबाई की शहर में मूर्तिकला में विशेष योगदान यह है कि उन्होंने दुर्गा प्रतिमाओं में कलात्मकता का पुट ज्यादा डाला। इसके चलते देवी द्वारा बड़े बड़े दैत्यों को मारने वाली प्रतिमाओं का चलन कम हुआ। कलात्मक प्रतिमाओं का ट्रेड चल पड़ा है। इसी तरह गणेश जी की प्रतिमाओं में भी कला का ट्रेंड शुरू करने वाली सोनाबाई ही है। प्रतिमाओं को रंगने एवं सजाने के लिए कलर और कोटिंग के नए नद प्रयोग उनके द्वारा ही किए गए जो बाद में अन्य कलाकारों ने भी इस्तेमान किया।

Saturday, 18 April 2015

धनगांव में नारियल के जीवाश्म

  डला जिले के धनगांव में नारियल के जीवाश्म मिले हैं। जिले के वनस्पति वैज्ञानिक इसे करीब 6.5 करोड़ वर्ष प्राचीन बता रहे हैं। इस जीवाश्म की खोज पुरातत्व और पुरा वनस्पति में 20 साल से कार्यरत शिक्षक प्रशान्त श्रीवास्तव एवं पुरषोत्तम विश्वकर्मा ने की है। धनगांव में मिल रहे जीवाश्म मुख्यत: ताड़ वृक्षों और द्विबीजपत्री पौधों के है। अन्य जीवाश्मीकृत पौधों में खजूर,जंगली केला (सीडिड बनाना) रुद्राक्ष, जामुन आदि के हैं। इनमें से अधिकांश पौधे नमी पसंद है। शिक्षकों का दावा है कि इससे पता चलता है कि छ: करोड़ वर्ष पहले मंडला आज से कहीं अधिक नम क्षेत्र था और यहां दो हजार मिलीमीटर से अधिक वर्षा होती थी। बता दें कि मंडला पुरातत्व संग्रहालय के जनक डॉ धर्मेन्द्र प्रसाद ने यूकेलिप्टिस के जीवाश्म की खोज की थी। उनके नाम पर बीरबल साहनी पुरा वनस्पति संस्थान लखनऊ ने एक जीवाश्म का नाम यूकेलिप्टिस धर्मेन्द्री किया।

यह चमत्कार है आधुनिक खेती का

  थोड़ी सूझबूझ से बच सकती थी हजारों करोड़ की फसल बर्बाद होने से   बोरलॉग की 6 सौ एकड़ की फसल में 1 फीसदी नुकसान नहीं
   दीपक परोहा
 जबलपुर। प्रदेश में इस वर्ष कई बार बारिश और ओले की मार से किसानों की हजारों करोड़ रूपए मूल्य की गेहूं की खड़ी फसलें बिछ गई। बारिश ,आंधी-तूफान और ओलों की मामूली मार ने ही फसलों को मिट्टी में मिला दिया लेकिन जबलपुर स्थित अंतराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र ‘बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया ’ ग्राम लखनवाड़ा की 600 एकड़ की फसल में एक प्रतिशत भी क्षति नहीं हुई, जबकि यहां 14 बार में 114 मिमी बारिश हुई। इस चमत्कार की पीछे कृषि संबंधी बेहद मामूली ज्ञान समझा जा रहा है। प्रदेश के किसान यदि कृषि संबंधी थोड़ी वैज्ञानिक सूझबूझ रखते तो बहुत से किसानों की फसलें बोरलॉग इंस्टीट्यूट की तरह बच जाती।    देश में कृषि उत्पादन के अनुसंधान के लिए लुधियाना, जबलपुर और पटना में बोरलॉग इंस्टीट्यूट कार्यरत है। जबलपुर में करीब 600 एकड़ में बोरलॉग इंस्टीट्यूट द्वारा गेहूं , धान सहित अन्य उपज की अनुसंधान के उद्देश्य से खेती करता है। इस वर्ष मौसम किसानों के प्रतिकूल रहा है, बोरलॉग से लगे इलाके लखनवाड़ा, पनागर सहित अन्य क्षेत्रों में किसानों की करोड़ों रूपए की फसल पानी के कारण बर्वाद हुई।  आश्चर्य जनक परिणाम  मौसम के कहर से बोरलॉग इंंस्टीट्यूट की फसल पर क्या असर हुआ? इसका सर्वेक्षण फ्लांग डेटा रिकार्ड के माध्यम से  कृषि वैज्ञानिकों की मौजूदगी में हवाई सर्वे किया गया तो आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए कि एक प्रतिशत भी नुकसान नहीं हुआ है।  जड़ भी थी मजबूत इस सर्वे के अध्ययन के बात वैज्ञानिक नतीजे पर पहुंचे है कि बोरलॉग प्रक्षेत्र में लगाई गई गेहूं की फसल में पौधे की जड़े मजबूत थी जिससे पानी और आंधी के बावजूद फसल खेत में नहीं बिछ पाई। बारिश का पानी फसल के लिए फायदे मंद साबित हुआ। इस वर्ष रिकार्ड उत्पादन की संभावना है।  --------------------------------- वर्जन ..... किसान करते है गलती किसान बिना जरूरत के यूरिया का छिड़काव कर देते है। इस पर उपज को पानी मिलने पर पौधे में विशेष ग्रोथ मिल जाती है जबकि उसकी जड़ को ग्रोथ नहीं मिलती है। बारिश, आंधी और ओले की मार से जड़ जमीन छोड़ देती है और फसल नष्ट हो जाती है।  बोरलॉक में मृदा परीक्षण के उपरांत यूरिया, फास्फेट एवं व अन्य खाद  का संतुुलित तरीके से छिडकाव किया गया था।  फोटास एवं फॉस्फे ट से जड़ें भी मजबूत हुई थी। संतुलित यूरिया के कारण पौधे में अनावश्यक ग्रोथ भी नहीं होती है। इसी के कारण बोरलॉक में पानी के कारण फसल में नुकसान नहीं हुआ।  डॉ एसएस तोमर संचालक डायरेक्टर बोरलॉग इंस्टीट्यूट --------------------------- खेत को न जलाए किसान को रसायनिक खाद का उपयोग करने के पूर्व मृदा परीक्षण कराया  चाहिए और वैज्ञानिकों की सलाह पर संतुलित खाद का उपयोग करना चाहिए।  तभी फसलों को बचाया जा सकता है।  खेत की कटाई के बाद नरवाई को  जलाना नहीं चाहिए। यह धारणा गलत है कि खेत को जलाने से उपज अच्छी होती है दरअसल आग लगाने से जमीन में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु जो जड़ों की रक्षा करते है वे मर जाते है। मिट्टी भी कड़ी हो जाती है जिससे मिट्टी में जड़ों की पकड़ कमजोर होती है।   डॉ राज गुप्ता  कृषि वैज्ञानिक   

कचरा निष्पादन के लिए जबलपुर नगर निगम की विशेष पहल

   कचरा से बनेगी 10 मेगावाट बिजली  जबलपुर। जबलपुर सहित देश के अधिकांश महानगरों में कचरा निष्पादन एक बड़ी समस्या बन चुकी है और ये कचरा पर्यावरण के लिए बेहद घातक साबित होता रहा है। कचरे से बिजली बनाने के प्लांट दिल्ली जैसे महानगरों में वर्षो पहले लगे थे लेकिन वे भी लगभग बंद हालत में है। देश में अब तक बिजली उत्पादन के लिए जितने इंसीनेरेटर हैं, उसके धूआ ही बड़े पर्यावरण प्रदूषण का कारण बना है लेकिन जबलपुर में कचरे से बिजली उत्पादन की यूनिट डाल रही कंपनी का दावा है कि प्रदूषण नियंत्रण के पूरे मापदंडों के अनुरूप यूनिट कार्य करेगी। करीब 175 करोड़ की लागत से तैयार होने जा रहा इंसीनेरेटर दुनिया की आधुनिक तकनीकी इस्तेमाल की जा रहा है।  जापान सहित अन्य देशों में कचरे से बिजली उत्पादन की अनेक यूनिटें एस्सेल ग्रुप द्वारा चलाए जा रहे हैं।  एस्सेल गु्रप एवं नगर निगम के बीच वर्ष 2013 मे तीन वर्ष का अनुबंध हो चुका है। नगर निगम ने कठौंदा में दस एकड़ भूमि प्लांट बनाने तथा कचरा निष्पादन के लिए लीज पर कंपनी को दी है। यह प्रोजेक्ट की सफलता जबलपुर के साथ प्रदेश के लिए कचरा निष्पादन के लिए एक बड़ी दिशा तय करेगा। दरअसल कचरा निष्पादन के अब तक जो भी तरीके अपनाए जाते रहे हैं। हरके तकनीकियों में अनेक खामिया रही है और वे पूर्णत: कारगर सबित नहीं हुई। महानगरों में बढ़ती डिस्पोजन संस्कृति ने कचरा की खपत कई गुना बढ़ा दी है।  अब तक कचरा निष्पादन की दुनिया में जितनी भी विधियां चल रही है उसमें सर्वाधिक उपयोगी कचरा को जलाने की समझी गई है लेकिन इसके लिए सवाधानी बेहद जरूरी है। कचरा जलाने से जबदस्त वायु प्रदूषण का खतरा  रहता है लेकिन इसको नियंत्रित सीमा में  आधुनिक तकनीकी से रखा जा रहा है जबलपुर में स्थापित होने वाले कचराघर से बिजली उत्पादन में उक्त तकनीकियों का इस्तेमान होना है।   कई कंपनियां कर रही काम  यूनिट तैयार करने का मशीनरी वर्क हिटैची कंपनी को दिया गया है जिसने यूनिट के लिए मशीने बनाने का काम अपने वर्कशाप में प्रारंभ कर दिया है। इसी तरह मुजफ्फर नगर की जगदम्बा एण्ड कंपनी को सिविल वर्क का काम सौंपा गया है। सिविल वर्क का काम तेजी से चल रहा है। फरवरी 2013 में एग्रीमेंट होने के बाद से सिविल वर्क प्रारंभ हो गया है। कंपनी सूत्रों का दावा है कि 65-70 प्रतिशत कार्य हो चुका है और दिसम्बर 2015 तक कार्य पूर्ण कर लिया जाएगा और यूनिट भी प्रारंभ हो जाएगी। इसी तरह बिजली की लाइन लगाने का काम भी चल रहा है।  चार टन कचरा की खपत  जबलपुर शहर में प्रतिदिन 3-4 कचरा प्रतिदिन एकत्र होता है। यूनिट में प्रतिदिन 3-4 सौ टन कचरे की डिमांड रहेगी, जबकि यूनिट की क्षमता 6 सौ टन प्रतिदिन की है। साढेÞ चार सौ टन कचरा प्रतिदिन मिलता रहा तो यूनिट साढेÞ 10 मेगावाट तक बिजली उत्पादन करेगी। कंपनी को बिजली विभाग से करार हो चुका है जो बिजली कंपनी से खरीदेगी।  50मीटर उंची हो चिमनी  इस यूनिट को तैयार करते वक्त प्रदूषण का ध्यान में रखते हुए 50 मीटर उंची चिमनी तैयार की जाएगी, जिससे वायु मंडल में कम दबाव की स्थिति में धूआ नीचे न जमा होए।  20 रूपए टन खरीदेगी कचरा नगर निगम से कचरे को लेकर कंपनी के करार के तहत कंपनी के डम्पिंग  पिट तक कचरा पहुंचाने का काम नगर निगम का होगा। कंपनी 20 रूपए टन के भाव से कचरा खरीदेगी। इस कचरे में बिल्डिंग मटैरियल एवं अस्पतालों का कचरा नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही मैटेलिक कचरा तथा नाले नालियों की सिल्ट नहीं होनी चाहिए।  यूनिट इसी वर्ष होगी शुरू कंपनी के चेयर मैन का जबलपुर दौरा हो चुका है। कंपनी दिसम्बर तक यूनिट प्रारंभ कर देगी। कचरे की कमी कंपनी को नहीं आएगी। छावनी परिषद ने भी नगर निगम को कचरा देने की पेशकश की है।  आशीष पाटकर  प्राजेक्ट मैनेजर, कंसल्टेंट कंपनी    डम्पिंग सेंटर की खामियां * डम्पिंग कचरों के कारण कचरे के पहाड़ खड़ें हो रहे हैं।  * डम्पिंग सेंटर की जगह भविष्य के लिए खराब हो जाती है।  * डम्पिंग सेंटर में पड़े कचरे को बाद में हटाने से जहरीली और पर्यावरण के लिए घातक गैस रिलीज होती हैं * कचरे से होकर भूमि में जाने वाला पानी स्वाइल एवं नेचरल वाटर को दूषित करता है।  ------------------------------------------------------------ बायोट्रीटमेंट भी असफल * कचरा को जैविक ट्रीटमेंट के तहत मिट्टी एवं खाद में बनाना कठिन कार्य है।  * वनस्पति एवं फूड के कचरा तो बायोट्रीटमेंट े दुरूस्त हो जाता है लेकिन  कैमिकल्स, पेट्रोलियम पदार्थ और पॉलीथीन विनष्ट नहीं होते है और यही पदार्थ प्रदूषण पैदा करते हैं।  ------------------------------------------

गुलाबी गैंग जल्द दिखेगी जबलपुर

  महिला लठैतों की गुलाबी गैंग जल्द दिखेगी जबलपुर मेेंं  बाहुबलियों, अन्यायी पुरूष समाज के खिलाफ बढ़ाई जाऐगी नारी शक्ति  जबलपुर। महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार, सरकारी तंत्र में बढ़ते भ्रष्टाचार के बीच जल्द ही महिलाओं की लठैत गैंग दखल देगी। संस्कारधानी की 200 महिलाएं गुलाबी परिधान में नजर आएंगी और महिला सशक्तीकरण की अलख भी जगाएंगी। गुलाबी गैंग की तैयारी पूरी है और जिस दिन भी इसकी राष्ट्रीय मुखिया संपत पाल देवी यहां आ पहुंची, उसी दिन गैंग काम करना शुरू कर देगी। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के बुन्देल खंड एवं विन्ध्य क्षेत्र में एक दशक से गुलाबी गैंग न सिर्फ नारी शक्ति का प्रतीक बनी हुई है बल्कि समाज को न्याय दिलाने का जरिया भी बन गई है। इन क्षेत्रों के करीब दो दर्जन से अधिक जिलों में गुलाबी गैंग से टक्कर लेने की अत्याचारी या अन्य कोई भी बाहुबली हिम्मत नहीं जुटा पाता है। लाठियों से लैस महिला गैंग की क्षेत्र में जबर्दस्त प्रतिष्ठा स्थापित है। आपसी विवाद सुलझाने से लेकर महिला उत्थान एवं दलित शोषित महिला वर्ग के लिए  यह गैंग एनजीओ की तरह  कार्य कर रही है। जल्द ही जबलपुर के ग्वारीघाट क्षेत्र में गुलाबी गैंग का गठन होने जा रहा है। इसको लेकर सम्मत पाल  के करीबी से बातचीत चल रही है। ग्वारीघाट क्षेत्र निवासी शकुंतला कुंभारे, सरिता पटैल एवं वंदना चौधरी  नामक महिलाओं ने 200 से अधिक महिलाओं का संगठन बना लिया है।  कई पुरस्कार भी मिल चुके गुलाबी गैंग की स्थापना, 4 थी तक पढ़ी बांदा जिले के चित्रकूट रामघाट की 50 वर्षीय सम्पत पाल देवी ने प्रारंभिक तौर पर समाज के अन्यायी पुरूषों से लड़ने के लिए एक छोटे से संगठन के रूप में की थी। सम्पत उर्फ संपतिया बाई की सहयोगी महिलाएं गुलाबी साड़ियां पहना करती थीं, जिसके कारण महिला संगठन का नाम क्षेत्र में गुलाबी गैंग पड़ गया। आज यह गैंग समूचे देश के साथ विदेशों में भी चर्चित है। सम्पत को अनेक  पुरूस्कार भी मिल चुके हंै। अब इस गैंग में हजारों की संख्या में महिलाएं मौजूद हैं और बेहद तेजी से नए सदस्य बनते जा रहे हैं। गैंग के कार्यक्रम में गुलाबी साड़ी, गुलाबी बिन्दी, चूड़ियां सहित पूर्ण  गुलाबी डेÑस कोड में महिलाएं हाथों में लट्ठ थामें नजर आती है। 

मध्य प्रदेश में किसी भी टाइगर में नहीं टीबी कई साल से चल रहा रिसर्च, करोड़ो खर्च

जबलपुर। जंगली जानवारों खासतौर पर टाइगरों की मौत को लेकर उठने वाले सवालों को लेकर उनकी मौत के कारणों की खोजबीन के लिए वन विभाग द्वारा करीब 40 करोड़ की लागत से पशु चिकित्सा महाविद्यालय में पैथोलेब एवं  बल्ड एनालाइजर जैसी कीमती मशीन स्थापित की। प्रदेश के नेशनल पार्क से टाइगर सहित अन्य जानवरों के सैम्पल भेजे गए लेकिन गहन रिसर्च के बावजूद एक भी नेशनल पार्क सहित फारेस्ट के एक भी टाइगर में टीबी की बीमारी नहीं आई है। इसके बाद जू के टाइगरों पर भी रिसर्च चल रहा है लेकिन यहां टीवी के लक्षण पाए गए है लेकिन रिपोर्ट पॉजेटिव नहीं आई है। करोड़ों रूपए खर्च करने के बावजूद रिसर्च बे नतीजा है।  उल्लेखनीय है कि नेशनल पार्क में वर्ष 2000 में हुई टाइगर की मौत के बाद जब लिम्प ग्लैड में सूजन एवं जख्म पाए गए तो उसको टीवी से जोड़ लिया गया। जू में कई शाकाहारी जानवर चीतल आदि में टीवी के वैक्टेरिया की मौजूदगी पाई गई। इससे यह नतीजा निकाला गया कि चीतल और शाम्भर में यदि टीवी पाई जाती है तो टाइगर इनके शिकार के दौरान टीवी के इंफैक्शन का शिकार हो सकता है। इसके साथ ही जबलपुर के वन्य प्राणी चिकित्सक एबी श्रीवास्तव एवं उनकी टीम ने रिसर्च का दायित्व सौंपा गया। पूर्व में पिछले कुछ साल तक नेशनल पार्क में टाइगर की संदिग्ध मौत पर उनको पीएम के लिए जबलपुर भेजा जाता रहा है लेकिन अब नेशनल पार्क के चिकित्सक स्वयं ही मौके पर पीएम करके टाइगर के शव का दाह संस्कार करवा देते है।  बिसरा रिपोर्ट आ रही है नेशनल पार्क से जानवरों की संदिग्ध मौत को लेकर बिसरा रिपोर्ट पशु चिकित्सालय स्थित वन्य प्राणी रिसर्च केन्द्र एवं फारेंसिक लैब में पहुंच रही है। इसके अतिरिक्त अन्य बीमारियों के सैम्पल भी पहुंच रहे है। सूत्रों का कहना है कि अब तक 400 से अधिक रिपोर्ट भेजी जा चुकी है लेकिन उनमें से मात्र 10 प्रतिशत जांच की रिपोर्ट ही वन विभाग को मिली है।  मशीनें बेकार पड़ी  वन्य प्राणियों की फारेंसिक लैब के नाम पर उंची कीमतों में मशीनों की खरीदी की गई है लेकिन यहां लैब टैक्निशियन तक पर्याप्त संख्या में नहीं है। दरअसल यह विभाग सफेद हाथी बन चुका है। इसको लेकर वन मंत्रालय ने पत्र व्यवहार भी किया है। दूसरी तरफ नेशनल पार्क प्रशासन ने रिपोर्ट न भेजने को लेकर पत्र व्यवहार भी किया है।  मानव से जानवरों को नहीं फिलहाल यह माना जा रहा है कि मानव से पालतू जानवर एवं जंगली जानवरों तक टीवी की बीमारी पहुंच गई है। अनुसंधान कर रहे चिकित्सकों का मानना है कि जू के कई जानवरों में टीबी के लक्षण देखे गए है लेकिन टेस्ट रिपोर्ट में यह साबित नहीं कर पाए है कि जू के टाइगर में टीबी है।  डॉ एबी श्रीवास्तव से सीधी बातचीत प्रश्न- डॉ एबी श्रीवास्तव जी नमस्कार, आप कहां है?  जवाब- मै देहरादूज के जंगल में रिसर्च के लिए गया हूं।  प्रश्न -  आप एवं आपकी टीम रिसर्च कर रही थी, टाइगर में टीवी के  विषय में, कितने टाइगरों में टीबी पाई गई?  जवाब- यह आंकड़ा तो फिलहाल उपब्ध नहीं है?  प्रश्न- ठीक हैं, लेकिन यह तो बताए कि जंगल में रहने वाले किसी शेर के सैम्पल में टीबी पॉजेटिव पाई गई।  जवाब - जी नहीं । प्रश्न- तो क्या जू के टाइगर्स में टीबी पाई गई?  जवाब- टीबी तो नहीं पाई गई लेकिन लक्षण मिले है।  प्रश्न - रिसर्च का नतीजा ? जवाब- अभी नहीं निकला।  ---------------------------------------------------------------- प्रदेश के किसी भी नेशनल पार्क में टीवी से पीड़ित शेर नहीं मिले है, शाकाहारी जानवरों में टीवी है कि नहीं यह भी हम नहीं कह सकते हैं। फारेंसिक लैब कैसा काम कर रही है ये मुझे नहीं मालूम लेकिन हम संदिग्ध बीमार जानवरों के सैम्पल टेस्ट के लिए भेज रहे हैं।  नरेन्द्र कुमार , पीसीसीएफ   ---------------------------------------------------------------  केन्द्रीय जेल के बंदी सीख रहे ड्रायविंग     सजा पूरी कर समाज की    मुख्यधारा से जोड़ने योजनाएं   जबलपुर। नेताजी सुभाष चंद्र बोस केन्द्रीय जेल में बंदियों को सिर्फ कारावास की सजा काटने भर के लिए नहीं रखा जाता है। नेता जी सुभाष चंद्र बोस को बंदी के तौर पर रखने वाली इस जेल को काफी हद तक सुधारगृह में तब्दील कर लिया गया है।  बंदियों के वेलफेयर के लिए पूरा एक विभाग कार्यरत है। बंदियों की सजा जब पूरी हो जाए और वे जेल से रिहा होकर समाज में पहुंचे तो उन्हें समाज की मुख्यधारा में जुड़ने कोई  परेशानी न होए। इसके लिए केन्द्रीय जेल जबलपुर में बंदी कल्याण के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही है। यहां हॉल ही में बंदियों को ड्रायविंग प्रशिक्षण प्रदान करने का काम शुरू किया  गया है और उन्हें आरटीओ से ड्रायविंग लायसेंस भी मिल रहे है। जेल से जब वे रिहा होंगे तो उनके हाथों में हुनर होगा और पुर्नवास में कोई समस्या नही आएगी।  केन्द्रीय जेल जबलपुर में ड्रायविंग के शौकीन बंदियों को बकायदा जेल ड्रायवरों द्वारा ड्रायविंग का कड़ा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उनके प्रशिक्षण की गुणवत्ता शहर के अनेक ड्रायविंग स्कूल से काफी उच्च कोटी की रहती है। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले बंदी जेल वैन को लेकर शहर में आते और जाते भी है। अनेक बाद जेल ड्रायवर के छुट्टी पर   होने पर ये ही बंदी केन्द्रीय जेल से बंदियों को वैन में लेकर कोर्ट जाते और उन्हें वहां से लेकर आते है। जेल में ड्रायवरों की कमी का भी निराकरण हो चुका है। अबतक लगभग पौने दो दर्जन से अधिक बंदियों को हैवी ड्रायविंग लायसेंस मिल चुके है। ड्रायविंग सीखने वाले बंदी बेहद खुश है उनके पास ड्रायविंग लायसेंस है। उन्हें उम्मीद है कि जेल से रिहा होने के बाद उनके पास एक हुनर होगा और उन्हें ईमानदारी और मेहनत से रोजी रोटी चलाने का जरिया मिल जाएगा। केन्द्रीय जेल में अब तक 40 बंदियों को ड्रायविंग का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।  जेल में अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम  उपक्रम - बंदी संख्या साबुन फैम्टरी- 50 बुनाई हाथकरघा- 150 लोहारी, बेल्डिंग-  30 कारपेंट्री -150 प्रिंट प्रेस- 50  ललित कला- 25 अमरेन्द्र सिंह  ---------------------------------------------------------- जबलपुर। राज्य सेवा  के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह अपनी नेत्रत्व क्षमता और कुशल कार्यप्रणाली के लिए पुलिस मोहकमें में पहचाने जाते है। सन 2001 बैच के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह भोपाल, इंदौर और शिवपुरी जिले में पदस्थ रह चुके हैं। जबलपुर जिले में सीएसपी रांझी और वर्तमान में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर के पद पर हैं तथा शहर के पुलिस बल को उनका कुशल नेतृत्व प्रदान कर रहें हैं। अनेक विषम परिस्थितियों में उन्होंने पुलिस बल का मनोबल उंचा बनाए रखा और अपनी कप्तानी का लोहा मनवाने में कामयाब रहें। यहां हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं के उग्र आंदोलन में पथराव के दौरान  पुलिस बल का संयमित एवं नियंत्रण में रखा और एक बड़े फसाद को टालने में कामयाब हुए। भरतीपुर में दो बार सम्प्रदायिक तनाव के माहौल में कम बल की मौजूदगी के बावजूद स्थिति नियंत्रण में बनाए रखी। उनकी सूझबूझ, निडरता और मिलसार गुण का पुलिस पुलिस मोहकमें को लाभ है। अनेक अनसुलझे हत्याकांड के खुलासा करने और बड़े फरार अपराधियों को पकड़वाले का श्रेय भी उनके खाते में जा चुका है। उनसे संवाददाता दीपक परोहा की बातचीत के अंश निम्न हैं-  * पुलिस में क्या कमी आप महसूस करतें हैं?  ** यदि देखा जाए तो पुलिस अब भी संसाधनों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई है। अपराधी हाईटेक हो चुके है और आधुनीकि तकनीकी और संसाधन अपना रहे है। जहां पुलिस में संसाधनों की कमी है और उपर से पुलिस बल भी क्षेत्र की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति की तुलना में बेहद कम  है। इस कमी को दूर करने शासन स्तर पर प्रयास चल रहे है।  * पुलिस संसाधनों में पिछड़ी है फिर भी उसे आम आदमी की जानमाल की हिफाजत करनी है,ये उसकी ड््यटी का हिस्सा है? ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? ** पुलिस संसाधन कम होने पर सुनियोजित पुलिसिंग पूरी दक्षता से कराई जा रही है, जिससे हम शहर में अमनचैन कायम कर रखे हैं। व्यवस्थिति पुलिसिंग  के कारण लोगों की जानमाल की हिफाजत करने में भी सफल है। अपराध होने पर अपराधियों को पकड़ कर उन्हें सजा दिलवा रहे है जिससे अपराध दर नियंत्रण में है।  * एक अच्छे पुलिस अधिकारी के क्या गुण होने चाहिए, आप में वैसी खूबी मौजूद है?  ** एक पुलिस अधिकारी का मुख्य गुण अपनी फोर्स का मनोबल हमेशा उंचा रखना होता है। अपने अधिनस्त और सहयोगी अधिकारियों के बीच तालमेल बनाकर पूरी टीम भावना से काम करना और करवाना आना चाहिए। वह जब फील्ड में मौजूद हो तो उसे जमीनी हकीकत मालूम होनी चाहिए। सूचना तंत्र उसका जबदस्त मजबूत होना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो मैने अब तक कुशलता के साथ इन्ही गुणों के कारण पुलिस को नेतृत्व करते आ रहा हूं।  * आम जनता पुलिस के नाम से डरती है, और आज अपराधियों पर पुलिस का खौफ कम हो रहा है, ये बदलती सामाजिक व्यवस्था पुलिस के लिए  कहां तक उचित है?  ** हमेशा पुलिस कर्मचारियों की मीटिंग में मुख्य विषय यही होता है कि आम जनता के बीच पुलिस की छबि बेहतर रहे। जनता और पुलिस के बीच सतत संवाद की स्थिति बनी रहे। इससे उनका सूचना तंत्र मजबूत होगा और पुलिसिंग के लिए बेहद उपयोगी रहेगा। जनता में पुलिस का खौफ नहीं अपराधियों में होना चाहिए। इसके लिए हमारा हमेशा प्रयास रहता है कि कोई भी वारदात होने पर पुलिस तत्काल एक्शन पर आ जाए, अपराधी को पकड़ा जाए और उसे सजा दिलाई जाए। इससे अपराधियों में पुलिस और कानून का खौफ पैदा होगा। लाठी भांजने मात्र से पुलिस का खौफ अपराधियों पर नहीं पड़ेगा।  * आपका कोई यादगार मामला? **  जबलपुर में हुआ बहुचर्चित आरोही हत्याकांड एक यादगार केस है  जिसमें हमें बेहद अधिक मेहनत करनी पड़ी और सफलता भी मिली। इसी तरह इंदौर में दोहरे और तिहरे हत्याकांड है जिसमें तीन आरोपियों को फांसी की सजा हुई।   ********************************************   ***अमरेन्द्र सिंह  ---------------------------------------------------------- जबलपुर। राज्य सेवा  के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह अपनी नेत्रत्व क्षमता और कुशल कार्यप्रणाली के लिए पुलिस मोहकमें में पहचाने जाते है। सन 2001 बैच के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह भोपाल, इंदौर और शिवपुरी जिले में पदस्थ रह चुके हैं। जबलपुर जिले में सीएसपी रांझी और वर्तमान में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर के पद पर हैं तथा शहर के पुलिस बल को उनका कुशल नेतृत्व प्रदान कर रहें हैं। अनेक विषम परिस्थितियों में उन्होंने   पुलिस बल का मनोबल उंचा बनाए रखा और अपनी कप्तानी का लोहा मनवाने में कामयाब रहें। यहां हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं के उग्र आंदोलन में पथराव के दौरान  पुलिस बल का संयमित एवं नियंत्रण में रखा और एक बड़े फसाद को टालने में कामयाब हुए। भरतीपुर में दो बार सम्प्रदायिक तनाव के माहौल में कम बल की मौजूदगी के बावजूद स्थिति नियंत्रण में बनाए रखी। उनकी सूझबूझ, निडरता और मिलसार गुण का पुलिस पुलिस मोहकमें को लाभ है। अनेक अनसुलझे हत्याकांड के खुलासा करने और बड़े फरार अपराधियों को पकड़वाले का श्रेय भी उनके खाते में जा चुका है। उनसे संवाददाता दीपक परोहा की बातचीत के अंश निम्न हैं-  * पुलिस में क्या कमी आप महसूस करतें हैं?  ** यदि देखा जाए तो पुलिस अब भी संसाधनों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई है। अपराधी हाईटेक हो चुके है और आधुनीकि तकनीकी और संसाधन अपना रहे है। जहां पुलिस में संसाधनों की कमी है और उपर से पुलिस बल भी क्षेत्र की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति की तुलना में बेहद कम  है। इस कमी को दूर करने शासन स्तर पर प्रयास चल रहे है।  * पुलिस संसाधनों में पिछड़ी है फिर भी उसे आम आदमी की जानमाल की हिफाजत करनी है,ये उसकी ड््यटी का हिस्सा है? ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? ** पुलिस संसाधन कम होने पर सुनियोजित पुलिसिंग पूरी दक्षता से कराई जा रही है, जिससे हम शहर में अमनचैन कायम कर रखे हैं। व्यवस्थिति पुलिसिंग  के कारण लोगों की जानमाल की हिफाजत करने में भी सफल है। अपराध होने पर अपराधियों को पकड़ कर उन्हें सजा दिलवा रहे है जिससे अपराध दर नियंत्रण में है।  * एक अच्छे पुलिस अधिकारी के क्या गुण होने चाहिए, आप में वैसी खूबी मौजूद है?  ** एक पुलिस अधिकारी का मुख्य गुण अपनी फोर्स का मनोबल हमेशा उंचा रखना होता है। अपने अधिनस्त और सहयोगी अधिकारियों के बीच तालमेल बनाकर पूरी टीम भावना से काम करना और करवाना आना चाहिए। वह जब फील्ड में मौजूद हो तो उसे जमीनी हकीकत मालूम होनी चाहिए। सूचना तंत्र उसका जबदस्त मजबूत होना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो मैने अब तक कुशलता के साथ इन्ही गुणों के कारण पुलिस को नेतृत्व करते आ रहा हूं।  * आम जनता पुलिस के नाम से डरती है, और आज अपराधियों पर पुलिस का खौफ कम हो रहा है, ये बदलती सामाजिक व्यवस्था पुलिस के लिए  कहां तक उचित है?  ** हमेशा पुलिस कर्मचारियों की मीटिंग में मुख्य विषय यही होता है कि आम जनता के बीच पुलिस की छबि बेहतर रहे। जनता और पुलिस के बीच सतत संवाद की स्थिति बनी रहे। इससे उनका सूचना तंत्र मजबूत होगा और पुलिसिंग के लिए बेहद उपयोगी रहेगा। जनता में पुलिस का खौफ नहीं अपराधियों में होना चाहिए। इसके लिए हमारा हमेशा प्रयास रहता है कि कोई भी वारदात होने पर पुलिस तत्काल एक्शन पर आ जाए, अपराधी को पकड़ा जाए और उसे सजा दिलाई जाए। इससे अपराधियों में पुलिस और कानून का खौफ पैदा होगा। लाठी भांजने मात्र से पुलिस का खौफ अपराधियों पर नहीं पड़ेगा।  * आपका कोई यादगार मामला? **  जबलपुर में हुआ बहुचर्चित आरोही हत्याकांड एक यादगार केस है  जिसमें हमें बेहद अधिक मेहनत करनी पड़ी और सफलता भी मिली। इसी तरह इंदौर में दोहरे और तिहरे हत्याकांड है जिसमें तीन आरोपियों को फांसी की सजा हुई।   ********************************************   *********************************************   ******************************************    ----------------------------------------------------------- वन्य पक्षियों की अवैध फार्मिग और कारोबार   वन विभाग कर रहा जांच, किस लिए बिकते है ये भी पता नहीं  जबलपुर। दुर्लभ वन्य पक्षी की अवैध फार्मिंग एवं उनके अवैध विक्रय के  कारोबार की वन विभाग को काफी अर्से से सूचना मिलती रही है लेकिन अब तक पक्षियों का अवैध कारोबार करने वाला बड़ा गिरोह पुलिस के हाथ नहीं लगा। अलबत्ता गुरंदी तथा अन्य क्षेत्र में विक्रय के लिए आने वाले तोते तथा लव वर्ड सहित अन्य  कुछ प्रजाति के पंछियों को जब्त कर उन्हें खुले आसमान में छोड़ने की वन विभाग ने कार्रवाई की लेकिन इस पक्षियों को पकड़ने, उनकी अवैध  फार्मिग करने वाले गिरोह व उसके नेटवर्क को उजागर नहीं कर पाया गया। अलबत्ता गत गुरूवार को ऐसा एक संदिग्ध गिरोह वन विभाग के हाथ लगा है लेकिन कानूनी दांवपेंच के चलते गिरोह पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। अलबत्ता एंटी पोचिंग टीम ने मामला जांच पड़ताल में ले लिया है।   सूत्रों के अनुसार  जबलपुर के आसपास जंगली क्षेत्रों में पक्षियों के अवैध कारोबारी के जबलपुर आने की खबर पर वन विभाग के अमले ने फूटाताल क्षेत्र  वन विभाग ने दबिश देकर पक्षियों के व्यापारियों को पकड़ा । उनके पास दुर्लभ शुतुरमुर्ग की तरह के पक्षी मिले लेकिन उनके पास जो पक्षी मिले उसको देखकर वन विभाग भी चौक गए। ये शुतुरमुर्ग नहीं थे। पक्षी के व्यापारियों ने उन्हे एमओ नामक पक्षी बताया और कहा कि यह पालतू पक्षी के श्रेणी का है। वन विभाग कानूनी दांव पेंच के चलते पक्षी को जब्त नहंी कर पाया लेकिन उनकी तस्वीरें उतार कर तथा व्यापारियों की आईडी और पता ठिकाना लेकर उन्हें छोड़ दिया। मामले की जांच पड़ताल प्रारंभ कर दी है। वन विभाग इन पक्षियों  को लेकर संशय में है। उन्हें नहीं मालूम   ये किस नस्ल के पक्षी हैं और वे वन्य प्राणी है अथवा नहीं ? इनका क्या उपयोग है? क्यो पाले जाते है? इस सब से वन विभाग अनभिज्ञ है। फिलहाल वन विभाग ने मामला जांच में लिया है। पक्षियों का कारोबार करने वाले नागपुर से आए थे। ऐसा समझा जा रहा है कि नागपुर से लगे प्रदेश के जिलों में इन पक्षियों की व्यापक पैमाने में फार्मिग हो रही है।  अंडे की खातिर चलता है कारोबार सूत्रों की माने तो शुतुरमुर्ग के अंडे बेहद कीमती होते है। विदेशों में शुतुरमुर्ग की फार्मिंग भी होती है और उसके अंडे बिकते हैैं लेकिन वन विभाग सुतुरमुर्ग पालने की अनुमति नहीं देता है जिसके परिणाम स्वरूप उसके वर्णशंकर का अवैध कारोबार जमकर फैल रहा है।   वर्जन शुतुरमुर्ग की तरह पक्षी मिले थे लेकिन वे शुतुरमुर्ग नहीं थे। ऐसा समझा जाता है कि पक्षी का अवैध कारोबार करने वाले ग्राहक को शुतुरमुर्ग बताकर बेचने का कारोबार करते है। वन विभाग मामले की जांच पड़ताल कर रही है।  आरके  पांडे  डीएफओ, एन्टी पेचिंग स्क्वाड 

Saturday, 1 October 2011

आदिवासी बालाओं की तस्करी


मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले मंडला और डिंडौरी से आदिवासी वालाओ की तस्करी करने वाला गिरोह अब भी अपना कारोबार चला रहा है। मानव तस्करी पिछले इस दसक से वनांचल में धडल्ले से चल रही है। दिल्ली मुम्बई और उत्तरांचल तक इन बालाओं को भेजा जाता है। दरअसल महानगरों में घरेलू नौकरानियों की खपत के कारण यह करोबार फल फूल रहा है। कई बालाओं को दैहिक शोषण एवं देह व्यापार के  कारोबार में उतरा जाता है। डिंडौरी पुलिस ने 29 सितम्बर को एक ऐसे ही गिरोह के चंगुल से 8 बालाओं को मुक्त कराया गया। बालाओं की ये खेप मुम्बई जा रही थी। गैंग की सरगना एक महिला है जो फरार है जबकि दो लोगों को पुलिस ने पकड़ा हे। डिंडौरी पुलिस अधीक्षक  पुरूषोत्तम शर्मा के मुताबिक पुलिस चौकी अमरपुर थाना अमरपुर ने गिरोह को पकड़ा है।  मुम्बई भेजे जाने के लिए बालाओं को एक गांव में एकत्र करके रखा गया था। दरअसल एक व्यक्ति ने पुलिस से शिकायत की थी कि उसकी 15 वर्षीय पुत्री को गैग ने जाल में फांस लिया है और वे उसे लालच देकर मुम्बई ले जाना चाहते है। बालाएं  सोन सिंह के घर में ठहराई गई थी। बरामद की गई आठ बालाएं नाबालिग हैं, जिनमें से पांच बालाएं मंडला जिले की हैं। दो युवतियों को मुम्बई ले जाया जा चुका है। बरामद बालाओं से बारीकी से पूछताछ करने पर पता चला कि मुम्बई की एक महिला, जो कई बार पूर्व में भी गांव आकर ठहरी थी। बालाओं तथा युवतियों को मजदूरी कराने एवं अच्छा वेतन और खाने पीने का लालच देकर उनके गांव से मुम्बई ले जाती है। मुम्बई ले जाकर आदिवासी लड़कियों को वेश्यावृत्ति के धन्धे में भी झोेंक दिया जाता है। जहां से उनका बाहर निकलना असंभव हो जाता है।