जबलपुर। नेताजी सुभाष चंद्र बोस केन्द्रीय जेल में बंदियों को सिर्फ कारावास की सजा काटने भर के लिए नहीं रखा जाता है। नेता जी सुभाष चंद्र बोस को बंदी के तौर पर रखने वाली इस जेल को काफी हद तक सुधारगृह में तब्दील कर लिया गया है। बंदियों के वेलफेयर के लिए पूरा एक विभाग कार्यरत है। बंदियों की सजा जब पूरी हो जाए और वे जेल से रिहा होकर समाज में पहुंचे तो उन्हें समाज की मुख्यधारा में जुड़ने कोई परेशानी न होए। इसके लिए केन्द्रीय जेल जबलपुर में बंदी कल्याण के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही है। यहां हॉल ही में बंदियों को ड्रायविंग प्रशिक्षण प्रदान करने का काम शुरू किया गया है और उन्हें आरटीओ से ड्रायविंग लायसेंस भी मिल रहे है। जेल से जब वे रिहा होंगे तो उनके हाथों में हुनर होगा और पुर्नवास में कोई समस्या नही आएगी। केन्द्रीय जेल जबलपुर में ड्रायविंग के शौकीन बंदियों को बकायदा जेल ड्रायवरों द्वारा ड्रायविंग का कड़ा प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उनके प्रशिक्षण की गुणवत्ता शहर के अनेक ड्रायविंग स्कूल से काफी उच्च कोटी की रहती है। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले बंदी जेल वैन को लेकर शहर में आते और जाते भी है। अनेक बाद जेल ड्रायवर के छुट्टी पर होने पर ये ही बंदी केन्द्रीय जेल से बंदियों को वैन में लेकर कोर्ट जाते और उन्हें वहां से लेकर आते है। जेल में ड्रायवरों की कमी का भी निराकरण हो चुका है। अबतक लगभग पौने दो दर्जन से अधिक बंदियों को हैवी ड्रायविंग लायसेंस मिल चुके है। ड्रायविंग सीखने वाले बंदी बेहद खुश है उनके पास ड्रायविंग लायसेंस है। उन्हें उम्मीद है कि जेल से रिहा होने के बाद उनके पास एक हुनर होगा और उन्हें ईमानदारी और मेहनत से रोजी रोटी चलाने का जरिया मिल जाएगा। केन्द्रीय जेल में अब तक 40 बंदियों को ड्रायविंग का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। जेल में अन्य प्रशिक्षण कार्यक्रम उपक्रम - बंदी संख्या साबुन फैम्टरी- 50 बुनाई हाथकरघा- 150 लोहारी, बेल्डिंग- 30 कारपेंट्री -150 प्रिंट प्रेस- 50 ललित कला- 25 अमरेन्द्र सिंह ---------------------------------------------------------- जबलपुर। राज्य सेवा के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह अपनी नेत्रत्व क्षमता और कुशल कार्यप्रणाली के लिए पुलिस मोहकमें में पहचाने जाते है। सन 2001 बैच के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह भोपाल, इंदौर और शिवपुरी जिले में पदस्थ रह चुके हैं। जबलपुर जिले में सीएसपी रांझी और वर्तमान में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर के पद पर हैं तथा शहर के पुलिस बल को उनका कुशल नेतृत्व प्रदान कर रहें हैं। अनेक विषम परिस्थितियों में उन्होंने पुलिस बल का मनोबल उंचा बनाए रखा और अपनी कप्तानी का लोहा मनवाने में कामयाब रहें। यहां हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं के उग्र आंदोलन में पथराव के दौरान पुलिस बल का संयमित एवं नियंत्रण में रखा और एक बड़े फसाद को टालने में कामयाब हुए। भरतीपुर में दो बार सम्प्रदायिक तनाव के माहौल में कम बल की मौजूदगी के बावजूद स्थिति नियंत्रण में बनाए रखी। उनकी सूझबूझ, निडरता और मिलसार गुण का पुलिस पुलिस मोहकमें को लाभ है। अनेक अनसुलझे हत्याकांड के खुलासा करने और बड़े फरार अपराधियों को पकड़वाले का श्रेय भी उनके खाते में जा चुका है। उनसे संवाददाता दीपक परोहा की बातचीत के अंश निम्न हैं- * पुलिस में क्या कमी आप महसूस करतें हैं? ** यदि देखा जाए तो पुलिस अब भी संसाधनों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई है। अपराधी हाईटेक हो चुके है और आधुनीकि तकनीकी और संसाधन अपना रहे है। जहां पुलिस में संसाधनों की कमी है और उपर से पुलिस बल भी क्षेत्र की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति की तुलना में बेहद कम है। इस कमी को दूर करने शासन स्तर पर प्रयास चल रहे है। * पुलिस संसाधनों में पिछड़ी है फिर भी उसे आम आदमी की जानमाल की हिफाजत करनी है,ये उसकी ड््यटी का हिस्सा है? ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? ** पुलिस संसाधन कम होने पर सुनियोजित पुलिसिंग पूरी दक्षता से कराई जा रही है, जिससे हम शहर में अमनचैन कायम कर रखे हैं। व्यवस्थिति पुलिसिंग के कारण लोगों की जानमाल की हिफाजत करने में भी सफल है। अपराध होने पर अपराधियों को पकड़ कर उन्हें सजा दिलवा रहे है जिससे अपराध दर नियंत्रण में है। * एक अच्छे पुलिस अधिकारी के क्या गुण होने चाहिए, आप में वैसी खूबी मौजूद है? ** एक पुलिस अधिकारी का मुख्य गुण अपनी फोर्स का मनोबल हमेशा उंचा रखना होता है। अपने अधिनस्त और सहयोगी अधिकारियों के बीच तालमेल बनाकर पूरी टीम भावना से काम करना और करवाना आना चाहिए। वह जब फील्ड में मौजूद हो तो उसे जमीनी हकीकत मालूम होनी चाहिए। सूचना तंत्र उसका जबदस्त मजबूत होना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो मैने अब तक कुशलता के साथ इन्ही गुणों के कारण पुलिस को नेतृत्व करते आ रहा हूं। * आम जनता पुलिस के नाम से डरती है, और आज अपराधियों पर पुलिस का खौफ कम हो रहा है, ये बदलती सामाजिक व्यवस्था पुलिस के लिए कहां तक उचित है? ** हमेशा पुलिस कर्मचारियों की मीटिंग में मुख्य विषय यही होता है कि आम जनता के बीच पुलिस की छबि बेहतर रहे। जनता और पुलिस के बीच सतत संवाद की स्थिति बनी रहे। इससे उनका सूचना तंत्र मजबूत होगा और पुलिसिंग के लिए बेहद उपयोगी रहेगा। जनता में पुलिस का खौफ नहीं अपराधियों में होना चाहिए। इसके लिए हमारा हमेशा प्रयास रहता है कि कोई भी वारदात होने पर पुलिस तत्काल एक्शन पर आ जाए, अपराधी को पकड़ा जाए और उसे सजा दिलाई जाए। इससे अपराधियों में पुलिस और कानून का खौफ पैदा होगा। लाठी भांजने मात्र से पुलिस का खौफ अपराधियों पर नहीं पड़ेगा। * आपका कोई यादगार मामला? ** जबलपुर में हुआ बहुचर्चित आरोही हत्याकांड एक यादगार केस है जिसमें हमें बेहद अधिक मेहनत करनी पड़ी और सफलता भी मिली। इसी तरह इंदौर में दोहरे और तिहरे हत्याकांड है जिसमें तीन आरोपियों को फांसी की सजा हुई। ******************************************** ***अमरेन्द्र सिंह ---------------------------------------------------------- जबलपुर। राज्य सेवा के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह अपनी नेत्रत्व क्षमता और कुशल कार्यप्रणाली के लिए पुलिस मोहकमें में पहचाने जाते है। सन 2001 बैच के अधिकारी अमरेन्द्र सिंह भोपाल, इंदौर और शिवपुरी जिले में पदस्थ रह चुके हैं। जबलपुर जिले में सीएसपी रांझी और वर्तमान में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर के पद पर हैं तथा शहर के पुलिस बल को उनका कुशल नेतृत्व प्रदान कर रहें हैं। अनेक विषम परिस्थितियों में उन्होंने पुलिस बल का मनोबल उंचा बनाए रखा और अपनी कप्तानी का लोहा मनवाने में कामयाब रहें। यहां हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं के उग्र आंदोलन में पथराव के दौरान पुलिस बल का संयमित एवं नियंत्रण में रखा और एक बड़े फसाद को टालने में कामयाब हुए। भरतीपुर में दो बार सम्प्रदायिक तनाव के माहौल में कम बल की मौजूदगी के बावजूद स्थिति नियंत्रण में बनाए रखी। उनकी सूझबूझ, निडरता और मिलसार गुण का पुलिस पुलिस मोहकमें को लाभ है। अनेक अनसुलझे हत्याकांड के खुलासा करने और बड़े फरार अपराधियों को पकड़वाले का श्रेय भी उनके खाते में जा चुका है। उनसे संवाददाता दीपक परोहा की बातचीत के अंश निम्न हैं- * पुलिस में क्या कमी आप महसूस करतें हैं? ** यदि देखा जाए तो पुलिस अब भी संसाधनों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई है। अपराधी हाईटेक हो चुके है और आधुनीकि तकनीकी और संसाधन अपना रहे है। जहां पुलिस में संसाधनों की कमी है और उपर से पुलिस बल भी क्षेत्र की जनसंख्या और भौगोलिक स्थिति की तुलना में बेहद कम है। इस कमी को दूर करने शासन स्तर पर प्रयास चल रहे है। * पुलिस संसाधनों में पिछड़ी है फिर भी उसे आम आदमी की जानमाल की हिफाजत करनी है,ये उसकी ड््यटी का हिस्सा है? ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? ** पुलिस संसाधन कम होने पर सुनियोजित पुलिसिंग पूरी दक्षता से कराई जा रही है, जिससे हम शहर में अमनचैन कायम कर रखे हैं। व्यवस्थिति पुलिसिंग के कारण लोगों की जानमाल की हिफाजत करने में भी सफल है। अपराध होने पर अपराधियों को पकड़ कर उन्हें सजा दिलवा रहे है जिससे अपराध दर नियंत्रण में है। * एक अच्छे पुलिस अधिकारी के क्या गुण होने चाहिए, आप में वैसी खूबी मौजूद है? ** एक पुलिस अधिकारी का मुख्य गुण अपनी फोर्स का मनोबल हमेशा उंचा रखना होता है। अपने अधिनस्त और सहयोगी अधिकारियों के बीच तालमेल बनाकर पूरी टीम भावना से काम करना और करवाना आना चाहिए। वह जब फील्ड में मौजूद हो तो उसे जमीनी हकीकत मालूम होनी चाहिए। सूचना तंत्र उसका जबदस्त मजबूत होना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो मैने अब तक कुशलता के साथ इन्ही गुणों के कारण पुलिस को नेतृत्व करते आ रहा हूं। * आम जनता पुलिस के नाम से डरती है, और आज अपराधियों पर पुलिस का खौफ कम हो रहा है, ये बदलती सामाजिक व्यवस्था पुलिस के लिए कहां तक उचित है? ** हमेशा पुलिस कर्मचारियों की मीटिंग में मुख्य विषय यही होता है कि आम जनता के बीच पुलिस की छबि बेहतर रहे। जनता और पुलिस के बीच सतत संवाद की स्थिति बनी रहे। इससे उनका सूचना तंत्र मजबूत होगा और पुलिसिंग के लिए बेहद उपयोगी रहेगा। जनता में पुलिस का खौफ नहीं अपराधियों में होना चाहिए। इसके लिए हमारा हमेशा प्रयास रहता है कि कोई भी वारदात होने पर पुलिस तत्काल एक्शन पर आ जाए, अपराधी को पकड़ा जाए और उसे सजा दिलाई जाए। इससे अपराधियों में पुलिस और कानून का खौफ पैदा होगा। लाठी भांजने मात्र से पुलिस का खौफ अपराधियों पर नहीं पड़ेगा। * आपका कोई यादगार मामला? ** जबलपुर में हुआ बहुचर्चित आरोही हत्याकांड एक यादगार केस है जिसमें हमें बेहद अधिक मेहनत करनी पड़ी और सफलता भी मिली। इसी तरह इंदौर में दोहरे और तिहरे हत्याकांड है जिसमें तीन आरोपियों को फांसी की सजा हुई। ******************************************** ********************************************* ****************************************** ----------------------------------------------------------- वन्य पक्षियों की अवैध फार्मिग और कारोबार वन विभाग कर रहा जांच, किस लिए बिकते है ये भी पता नहीं जबलपुर। दुर्लभ वन्य पक्षी की अवैध फार्मिंग एवं उनके अवैध विक्रय के कारोबार की वन विभाग को काफी अर्से से सूचना मिलती रही है लेकिन अब तक पक्षियों का अवैध कारोबार करने वाला बड़ा गिरोह पुलिस के हाथ नहीं लगा। अलबत्ता गुरंदी तथा अन्य क्षेत्र में विक्रय के लिए आने वाले तोते तथा लव वर्ड सहित अन्य कुछ प्रजाति के पंछियों को जब्त कर उन्हें खुले आसमान में छोड़ने की वन विभाग ने कार्रवाई की लेकिन इस पक्षियों को पकड़ने, उनकी अवैध फार्मिग करने वाले गिरोह व उसके नेटवर्क को उजागर नहीं कर पाया गया। अलबत्ता गत गुरूवार को ऐसा एक संदिग्ध गिरोह वन विभाग के हाथ लगा है लेकिन कानूनी दांवपेंच के चलते गिरोह पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। अलबत्ता एंटी पोचिंग टीम ने मामला जांच पड़ताल में ले लिया है। सूत्रों के अनुसार जबलपुर के आसपास जंगली क्षेत्रों में पक्षियों के अवैध कारोबारी के जबलपुर आने की खबर पर वन विभाग के अमले ने फूटाताल क्षेत्र वन विभाग ने दबिश देकर पक्षियों के व्यापारियों को पकड़ा । उनके पास दुर्लभ शुतुरमुर्ग की तरह के पक्षी मिले लेकिन उनके पास जो पक्षी मिले उसको देखकर वन विभाग भी चौक गए। ये शुतुरमुर्ग नहीं थे। पक्षी के व्यापारियों ने उन्हे एमओ नामक पक्षी बताया और कहा कि यह पालतू पक्षी के श्रेणी का है। वन विभाग कानूनी दांव पेंच के चलते पक्षी को जब्त नहंी कर पाया लेकिन उनकी तस्वीरें उतार कर तथा व्यापारियों की आईडी और पता ठिकाना लेकर उन्हें छोड़ दिया। मामले की जांच पड़ताल प्रारंभ कर दी है। वन विभाग इन पक्षियों को लेकर संशय में है। उन्हें नहीं मालूम ये किस नस्ल के पक्षी हैं और वे वन्य प्राणी है अथवा नहीं ? इनका क्या उपयोग है? क्यो पाले जाते है? इस सब से वन विभाग अनभिज्ञ है। फिलहाल वन विभाग ने मामला जांच में लिया है। पक्षियों का कारोबार करने वाले नागपुर से आए थे। ऐसा समझा जा रहा है कि नागपुर से लगे प्रदेश के जिलों में इन पक्षियों की व्यापक पैमाने में फार्मिग हो रही है। अंडे की खातिर चलता है कारोबार सूत्रों की माने तो शुतुरमुर्ग के अंडे बेहद कीमती होते है। विदेशों में शुतुरमुर्ग की फार्मिंग भी होती है और उसके अंडे बिकते हैैं लेकिन वन विभाग सुतुरमुर्ग पालने की अनुमति नहीं देता है जिसके परिणाम स्वरूप उसके वर्णशंकर का अवैध कारोबार जमकर फैल रहा है। वर्जन शुतुरमुर्ग की तरह पक्षी मिले थे लेकिन वे शुतुरमुर्ग नहीं थे। ऐसा समझा जाता है कि पक्षी का अवैध कारोबार करने वाले ग्राहक को शुतुरमुर्ग बताकर बेचने का कारोबार करते है। वन विभाग मामले की जांच पड़ताल कर रही है। आरके पांडे डीएफओ, एन्टी पेचिंग स्क्वाड
Sunday, 20 September 2015
अबोध बच्ची सलोनी का दुश्मन पिता
अबोध बच्ची सलोनी का दुश्मन पिता
हंसती खेलती बेटी को बेटे की चाहत पर उतारा मौत के घाट
जबलपुर। आखिर अबोध बच्ची सलोनी का दुश्मन कौन है, उसने किसी का क्या बिगाड़ा है जो हंसती खेलती सलोनी को मार डाला? जब मृत हालत में मां ने बेटी को देखा तो ये विचार आए। मां का लाड़ली की मौत से दिल भर था आंखों से आंसूे थे। बेटी के पिता में किसी तरह के गम के भाव नजर नहीं आ रहे थे। ऐसे में मां को सलोनी के पिता का ही खयाल आया जो सलोनी के पैदा होने से बेहद नाखुश था। आए दिन उससे मारपीट करता था। सलोनी का हत्यारा उसका पिता ही है। यह विचार आने पर इस मां ने अपने शौहर के खिलाफ थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस जांच पड़ताल कर रही है ।
आज सरकार भले ही लड़ली लक्ष्मी और लक्ष्मी सम्मान जैसी योजना चला रही है लेकिन समाज में अब भी बेटी को सहजता से स्वीकार नहीं है। बेटे की चाहत में एक पिता ने अपनी लाड़ली को पटक पटक कर मार डाला। यह घटना छिंदवाड़ा जिला के समीपी गांव कचरिया की है। गत शुक्रवार को ऋषि पंचमी की रात शंकर सूर्यवंशी की ढाई साल की बेटी सलोनी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। पत्नी पिंकी अपनी लाड़ली को हंसती-खेलती हुई घर पर छोड़कर ऋषि पंचमी का पूजन करने के लिए मंदिर गई थी। वह जब मंदिर से लौटी तो देखा उसकी हंसती-खेलती बेटी सलोनी हमेशा के लिए मौत की नींद सो चुकी थी। सलोनी का पिता ने गोलमोल जवाब दिए।
पत्नी का आरोप है कि बेटे की चाहत के कारण पति ने उसकी ढाई साल की बेटी की हत्या कर दी है। जबकि पति का कहना है कि सोफे से गिरने के कारण मासूम की मौत हुई है। इसको लेकर पति-पत्नी के बीच रात में जमकर विवाद हुआ। गांव के लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। शनिवार सुबह पुलिस शंकर के घर पहुंची और बच्ची के शव को पोटमार्टम के लिए ले गई। पुलिस ने पत्नी पिंकी के बयान दर्ज कर लिए हैं। पिंकी ने पुलिस को बताया कि पति शंकर बेटे की चाहत में उसके साथ मारपीट करता रहता था। पत्नी ने पति के खिलाफ प्रताड़ना की शिकायत पूर्व में भी की थी, जो न्यायालय में विचाराधीन है। पत् िा पत्नी के बीच विवाद की शुरूआत ही बेटी के जन्म से हुई थी जब ढाई साल पहले जब पति शंकर ने बेटी होने की खबर सुनी तब से बेटी को शंकर पंसद नहीं करता था और उसकी मां को भी प्रताड़ित करने लगा था।
नहीं चाहते थे पीएम कराना
जिला अस्पताल के मरचुरी रूम में रखे मासूम के शव के पोस्ट मार्टम न कराए जाने को लेकर भी शंकर ने जमकर हंगामा किया। शंकर एवं शंकर की मां नहीं चाहते थे कि पीएम कराया जाए जबकि मासूम की मां की चाहती थी कि पीएम कराया जाए जिससे मौत का कारण सामने आए और दोषियों को सजा मिले। इस बात को लेकर दोनो पक्षों के बीच करीब आधा घंटे तक जमकर वाद विवाद भी चला अंतत: पुलिस ने शव का पीएम कराया।
बेटी से नहीं था स्नेह
अपनी नम आंखों से मीडिया को मासूम की मां पिंकी ने बताया कि पति शंकर के अलावा ससुराल वालों को बेटे की चाह थी। बेटी होने के बाद से पति नाराज रहता था और मारपीट करता था। साथ ही उसे बेटी के प्रति किसी तरह का कोई प्रेम नहीं था। अक्सर बेटे न होने को लेकर मारपीट करता रहता था।
वर्जन
आरोपी शंकर को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त होने पर हत्या का मामला दर्ज किया जाएगा। प्रथम दृष्टि शंकर ही हत्या का संदेही बना है।
मिथलेश शुक्ला
पुलिस अधीक्षक छिंदवाड़ा
हंसती खेलती बेटी को बेटे की चाहत पर उतारा मौत के घाट
जबलपुर। आखिर अबोध बच्ची सलोनी का दुश्मन कौन है, उसने किसी का क्या बिगाड़ा है जो हंसती खेलती सलोनी को मार डाला? जब मृत हालत में मां ने बेटी को देखा तो ये विचार आए। मां का लाड़ली की मौत से दिल भर था आंखों से आंसूे थे। बेटी के पिता में किसी तरह के गम के भाव नजर नहीं आ रहे थे। ऐसे में मां को सलोनी के पिता का ही खयाल आया जो सलोनी के पैदा होने से बेहद नाखुश था। आए दिन उससे मारपीट करता था। सलोनी का हत्यारा उसका पिता ही है। यह विचार आने पर इस मां ने अपने शौहर के खिलाफ थाने में जाकर एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस जांच पड़ताल कर रही है ।
आज सरकार भले ही लड़ली लक्ष्मी और लक्ष्मी सम्मान जैसी योजना चला रही है लेकिन समाज में अब भी बेटी को सहजता से स्वीकार नहीं है। बेटे की चाहत में एक पिता ने अपनी लाड़ली को पटक पटक कर मार डाला। यह घटना छिंदवाड़ा जिला के समीपी गांव कचरिया की है। गत शुक्रवार को ऋषि पंचमी की रात शंकर सूर्यवंशी की ढाई साल की बेटी सलोनी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। पत्नी पिंकी अपनी लाड़ली को हंसती-खेलती हुई घर पर छोड़कर ऋषि पंचमी का पूजन करने के लिए मंदिर गई थी। वह जब मंदिर से लौटी तो देखा उसकी हंसती-खेलती बेटी सलोनी हमेशा के लिए मौत की नींद सो चुकी थी। सलोनी का पिता ने गोलमोल जवाब दिए।
पत्नी का आरोप है कि बेटे की चाहत के कारण पति ने उसकी ढाई साल की बेटी की हत्या कर दी है। जबकि पति का कहना है कि सोफे से गिरने के कारण मासूम की मौत हुई है। इसको लेकर पति-पत्नी के बीच रात में जमकर विवाद हुआ। गांव के लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। शनिवार सुबह पुलिस शंकर के घर पहुंची और बच्ची के शव को पोटमार्टम के लिए ले गई। पुलिस ने पत्नी पिंकी के बयान दर्ज कर लिए हैं। पिंकी ने पुलिस को बताया कि पति शंकर बेटे की चाहत में उसके साथ मारपीट करता रहता था। पत्नी ने पति के खिलाफ प्रताड़ना की शिकायत पूर्व में भी की थी, जो न्यायालय में विचाराधीन है। पत् िा पत्नी के बीच विवाद की शुरूआत ही बेटी के जन्म से हुई थी जब ढाई साल पहले जब पति शंकर ने बेटी होने की खबर सुनी तब से बेटी को शंकर पंसद नहीं करता था और उसकी मां को भी प्रताड़ित करने लगा था।
नहीं चाहते थे पीएम कराना
जिला अस्पताल के मरचुरी रूम में रखे मासूम के शव के पोस्ट मार्टम न कराए जाने को लेकर भी शंकर ने जमकर हंगामा किया। शंकर एवं शंकर की मां नहीं चाहते थे कि पीएम कराया जाए जबकि मासूम की मां की चाहती थी कि पीएम कराया जाए जिससे मौत का कारण सामने आए और दोषियों को सजा मिले। इस बात को लेकर दोनो पक्षों के बीच करीब आधा घंटे तक जमकर वाद विवाद भी चला अंतत: पुलिस ने शव का पीएम कराया।
बेटी से नहीं था स्नेह
अपनी नम आंखों से मीडिया को मासूम की मां पिंकी ने बताया कि पति शंकर के अलावा ससुराल वालों को बेटे की चाह थी। बेटी होने के बाद से पति नाराज रहता था और मारपीट करता था। साथ ही उसे बेटी के प्रति किसी तरह का कोई प्रेम नहीं था। अक्सर बेटे न होने को लेकर मारपीट करता रहता था।
वर्जन
आरोपी शंकर को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त होने पर हत्या का मामला दर्ज किया जाएगा। प्रथम दृष्टि शंकर ही हत्या का संदेही बना है।
मिथलेश शुक्ला
पुलिस अधीक्षक छिंदवाड़ा
Monday, 31 August 2015
Pawan sthapak
रोते हुए युवती ने जब डॉ स्थापक को बताया तो वे भी आश्चर्य मे
10 साल बाद मेरी आंख लौट आई ...
आंसू भरी आंखों से डॉ पवन स्थापक को पूरी श्रद्धा से देखते हुए अकोला से आई 17 वर्षीय वैशाली ने कहा सर मेरी आंखे दस वर्ष बाद लौट आई है। मुझे दस साल बाद पता चला कि रौशनी क्या होती है, दुनिया कितनी रंगीन है, ये चमत्कार आपन तीन इंजेक्शन लगाकर कर डाला। डॉ स्थापक की इस मरीज की बात सुनकर आश्चर्य चकित थे कि ये कैसा चमत्कार हो गया है। उन्होंने तो इस लाइलाज बीमारी पर सिर्फ एक्पेरिमेंट किया था। युवती की आंखों की नशे दस साल पहले ही टाइटफाइट इन्फैलोफैथी के कारण सूख चुकी थी और की रौशनी आने की कोई उम्मीद नहीं थी।
Ñजबलपुर के ख्यातिलब्ध नेत्र रोग चिकित्सक डॉ.पवन स्थापन जिन्होंने सड़क दुर्घटनाओं के मामले में लगभग फूट चुकी सैकड़ों आंखों की सर्जरी कर उसकी मरम्मत कर लोगों की आंख की रौशनी लौटाई। हजारों आंखों के क्षतिग्रस्त रेटीना और आई लैंस की आधुनिक मशीनों से मरम्मत की। आंख की जटिल एवं कठिन बीमारियों का निदान किया। करीब 60 से अधिक नेत्र प्रत्यारोपण किए है। लोगों की खोई हुई आंख की रौशनी लौटाई है। एक लाख से अधिक आई आपरेशन कर चुक है जिसमें 40 हजार आपरेशन नि:शुल्क भी शामिल है, लेकिन इस सबके बावजूद उनके जीवन का ये विलक्षण मामला था। डॉ पवन स्थापक सन 1992 से लगातार नेत्र चिकित्सा कर रहे।
इस प्रकरण के बाद उनकी स्वयं की धारणा बदल गई और अब उनका कहना है कि चिकित्सा जगह में असंभव कुछ भी नहीं है। मृत आदमी भी जिंदा हो जाता है। इसी तरह अनेक मामले ऐसे होते है जिसमें नेत्र रोग विशेषज्ञ मरीज को स्पष्ट कह देते है कि आपकी आंख की रौशनी चली गई है अब वह नहीं लौटेगी, चूंकि ये बाते हमे चिकित्सा के कोर्स में पढ़ाई गई है लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय है कि कोशिश अंत तक नहीं छोड़नी चाहिए । इस केस के बाद अनेक ऐसे मामले आए जिसमें लोग तमाम जगह से निराश हो गए थे लेकिन मैने प्रकरण हाथ में लिया। किसी में सफलता मिली और बहुत में असफल भी हुआ लेकिन कोशिश को विराम नहीं लगाया।
दस वर्ष बाद आंख की रौशनी लौटने के मामले के डॉ स्थापक ने बताया कि मेरे पास एक वृद्धजन इलाज के लिए आए थे। उनकी आंख में मोतिया बिंद हो गया था। जिसका आॅपरेशन किया गया और उसको साफ दिखाई देने लगा। ये मरीज कुछ महीना बाद उनके पास एक युवती को लेकर आए और कहा कि आप के हाथों में जादू है, आप इस लड़की का इलाज करें। आप इसको ठीक कर सकते है। वह युवती वृद्धजन की भतीजी थी जिसे वे अकोला महाराष्ट्र से लेकर आए थे। युवती के केस स्टडी पढ़ने पर पता चला कि दिल्ली , मुम्बई सहित भारत के कई शहरों के नामी डॉक्टर्स ने युवती को कोई भी इलाज होने से असमर्थता व्यक्त कर चुके थे। उसकी आंख की रौशनी सात साल की उम्र से जा चुकी थी।
नर्वस मृत हालत में
युवती को बचपन में टाइटफाइट हुआ था जिसके कारण उसके आंख की नर्व मृत हो चुके थे जिसे आंखो की नशे सूखना कहते है। उसकी आंख प्रकाश संबंधी संवेदना गृहण नहीं करती थी। वह दृष्टिबाधित हो चुकी थी और उसका कोई इलाज संभव नहीं था। किन्तु आगंतुक सज्जन पीछे पड़ गए थे आप को इसकी आंख की रौशनी लौटानी पड़ेगी, आप से बेहतर कोई डॉक्टर नहीं है। इस स्थिति में काफी अध्ययन करने के बाद एक प्रयोग करने का निर्णय लिया। वर्षो से बंद चिकित्सा पद्धति आंखों के पीछे इजैक्शन लगाने का निर्णय किया गया। रेटोवल यूटरारीम तथा एक अन्य दवाई को मिलाने के बाद तीन इंजेक्शन का कोर्स दिया गया। इसके बाद युवती को रवाना कर दिया गया।
चमत्कार हुआ
डॉ स्थापक के अनुसार कुछ दिनों बाद उनकी क्लीनिक में एक युवती आई और दण्डवत होकर उनके पैर छूए ओर वह रो रही थी। डॉ स्थापक के कहे अनुसार मै उसे पहचान नहीं पा रहा था लेकिन उसके पैर पड़ने से यह जाहिर हो रहा था कि वह बेहद प्रभावित है। उससे पूछा कि तुम कौन हो ,तो उसने बताया कि मै वैशाली हूं, अकोला से आई हूं। आपने मेरी आंखों में इंजेक्शन लगाया था इसे बाद अचानक अकोला में मुझे दिखाई देने लगा। दस साल बाद मेरी आंख लौट आई है।
Friday, 12 June 2015
Newsसफेद बाघ का नया घर
जबलपुर। दुनिया की दुर्लभ नस्ल में शामिल सफेद बाघ का नया घर अब जल्द ही विंध्य क्षेत्र के मुकुंदपुर में बनने जा रहा है। वाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर का काम लगभग कार्य पूर्ण हो गया। वन विभाग के इस बड़े प्रोजेक्ट को सिर्फ चिड़ियाघर प्राधिकरण से अनुमति मिलना भर शेष है और इसके साथ ही वाइट टाइगरों का जहां से उत्पत्ति हुई थी, वहीं उनका गांव बस जाएगा। एशिया के पहले सफेद बाघ जू का शुभारंभ करने के लिए देश के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के आने की संभावना है।
दुनिया में वाइट टाइगर की दुर्लभ नस्ल सबसे पहले रीवा में पाई गई थी तथा दुनिया के पहले सफेद बाघ मोहन को सीधी वन क्षेत्र में 1951 में रीवा नरेश राजा मार्तंड सिंह ने देखा था और रीवा नरेश के प्रयास से मोहन की संतानें दुनिया के प्रमुख जू की शोभा बनी। मोहन के साथ सफेद बाघों की नस्ल बढ़ी और सफेद बाघ ने रीवा से बाहर का सफर तय किया। वर्तमान में अब अपने उत्पत्ति स्थल में ही वे नहीं है। मध्य प्रदेश शासन ने विंध्य क्षेत्र में सफेद टाइगर की दहाड़ के लिए एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है।
प्रजजन केन्द्र होगा
दरअसल मुकुंदपुर वाइट टाइगर सफारी अथवा वाइट टाइगर जू के बजाए प्रजजन केन्द्र होगा। इसका विस्तार एवं विकास इस तरह से किया गया है कि वाइट टाइगर की फार्मिंग की जा सके। उनकी वंशवृद्धि की जाए। देश में जिन चिड़ियाघरों में सफेद टाइगर है। उनके पास टाइगर मुकुंदपुर के लिए टाइगर डोनेट करने पत्राचार हो चुका है। एक नर एवं दो मादा टाइगर यहां जल्द ही आ जाएंगे।
टाइगर सिफ्टिंग के लिए प्लान
वन अमला जल्द ही टाइगर सिफ्टिंग के लिए प्लान बना रहा है। हर हाल में पूर्ण सुरक्षित तरीके से टाइगर को यहां लाया जाना है। वन विभाग इस प्रोजेक्ट का जल्द शुरू करने की तैयारी में जुटा है, चूंकि सफेद टाइगर के स्थानांतरण काफी चुनौती पूर्ण होता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1979 में सफेद टाइगर दिल्ली स्थानांतरण के बाद अपने घर में नए घर में सामान्य जीवन नहीं जी पाया था और उसकी मौत हो गई थी।
बाड़ा कैसा होना चाहिए
सफेद टाइगर के लिए जो बाड़ा तैयार किए गए है। वे कैसे होने चाहिए, इसके लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई है जो करीब 400 पेज की है। यहां तक उसके बाड़ा में तीनों मौसम के अनुकूल उनके घर की प्राकृतिक वातावरण में तैयार किया गया है। इस जू में सफेद शेर के साथ अन्य वन्य प्राणी भी रखे जाएंगे। हॉल ही में भोपाल में चिडियाघर में सर्प के डंसने से एक सफेद शेर की मौत के बाद इस नई सफारी को चूहों एवं सर्प से मुक्त रखने की भी योजना शामिल की गई है।
इस बैठक में मिलेगी मंजूरी
मुकुंदपुर जू को अभी लायसेंस याने अनुमति पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से नहीं मिली है जबकि प्रस्ताव, लेआउट, बाड़ा सहित अन्य सबंधित विस्तृत रिपोर्ट के साथ 2010 को प्रस्ताव भेजा गया था और प्रस्ताव को स्वीकृत होने के बाद प्रोजेक्ट के तहत कार्य पूर्ण कर लिए है। जू अर्थाटी ने दौरान कर संतुष्ट भी हो चुका है। केंद्रीय चिडियाघर प्राधिकरण की अगली बैठक जैसे ही होगी, वैसे ही वाइट सफारी मुकुंदपुर अस्तित्व में आ जाएगा। अगले माह प्राधिकरण की बैठक होने जा रही है।
भूकम्प से प्रदेश को कोई खतरा नहीं
जबलपुर। नेपाल में 24 अप्रैल को आए विनाशकारी भूकम्प के बाद आॅफर शॉक का सिलसिला जारी है। हिमालय स्थित फाल्ट में दोपहर के बाद कुछ अंतराल में सात झटके आए। ये झटके बिहार तथा उत्तरांचल में महसूस किए गए जबकि मध्य प्रदेश में दो भूकम्प के झटके लोगों ने महसूस किए है। भूकम्प विशेषज्ञों की माने तो नेपाल हिमालय में शुरू हुई भूकम्प की श्रंखला से प्रदेश को कोई खतरा नहीं है लेकिन प्रदेश में नर्मदा एवं सोनघाटी क्षेत्र में 80 से अधिक फाल्ट मौजूद है जो भूकम्प संवेदी है। इन भूकम्प की श्रंखला से फिलहाल यहां खतरा नहीं है लेकिन भूकम्प की भविष्यवाणी आज भी संभव नहीं है।
भारतीय सर्वे आॅफ इंडिया के सेंट्रल मुख्यालय के डायरेक्टर, वरिष्ठ वैज्ञानिक के मुखोपाध्याय ने बताया कि नेपाल में 24 अप्रेल को जो विनाशकारी भूकम्प आया था, वह गौरी शंकर लिनियामेंट के करीब था। इस भूकम्प से इस लिनियामेंट की सक्रियता बढ़ गई है। इसके चलते गौरी शंकर लिनियामेंट से दूसरा भूकम्प आया है। इस भूकम्प एवं पूर्व में आए भूकम्प केन्द्र में अंतर है। पहले आए भूकम्प की गहराई 10 किलोमीटर थी जिससे उसका विनाशकारी प्रभाव ज्यादा रहा है, जबकि आज आया भूकम्प गहराई से आया था। करीब 19 किलोमीटर नीचे था जिससे विनाश कम हुआ है। तकनीकि तौर पर यह भूकम्प पूर्व भूकम्प का आॅफ्टर शॉॅक नहीं है लेकिन फिर भी इसे भू वैज्ञानिक आॅफ्टर शॉक की तरह आंकलन कर रहे है।
मात्र तीन भूकम्प महसूस हुए
बिहार तथा उत्तर भारत में तीन झटके महसूस किए गए है जबकि 4 मैग्नीट्यूट तीव्रता तक के सात भूकम्प दिन भर में आए है। इस भूकम्प से
मध्य प्रदेश के सोन एवं नर्मदा लीनियामेंट की प्लेट सक्रिय होने का खतरा नहीं है। उन्होंने बताया कि प्लेट अलग अलग गहराई पर स्थित होती है और उनके अपने कारण भूकम्प के रहते है लेकिन तीव्रता वाले भूकम्प के मददेनजर सावधानी रखना जरूरी है। कच्चे मकान खतरे का कारण यहां भी बन सकते है।
देश के अन्य हिस्सों के साथ मध्यप्रदेश प्रदेश के अनेक स्थलों में भूकम्प के झटके महसूस किए गए। पहला भूकम्प 7.3 मैग्नीट्यूट तीव्रता का12 बजकर 35 मिनिट 19 सेकेण्ड मं आया। इसका अक्षांस 86.0 डिग्री उत्तर तथा देशांतर 86.0डिग्री पूर्व था। ये भूकम्प 10 किलोमीटर की गहराई से था। इसी तरह दूसरा भूकम्प 1 बजकर 6 मिनट 54 सेकण्ड पर आया। इसका केन्द्र मामूली बदला है। दूसरे भूकम्प का केन्द्र 27.6 डिग्री अक्षांश उत्तर तथा देशांतर 86.1 डिग्र्री पूर्व रहा। इसके बाद कुछ कुछ अंतराल में 5 भूकम्प और दर्ज किए गए है, जो लगभग 4 मैग्नीट्यूट तक के थे। इन भूकम्पों के बाद आॅफटर शॉक दर्ज किए जा रहे हैं लेकिन उनकी तीव्रता कम है।
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वर्जन
मुताबिक शहडोल, उमरिया, कटनी, जबलपुर, नरसिंहपुर, हरदा, होशंगाबाद, खंडवा तथा खरगौन भूकम्प के प्रति संवेदनशील हैं। यहां ये नर्मदा एवं सोननदी के फाल्ट पर स्थित है। ये सिस्मिक जोन 4 में स्थित हैं। यहां मध्यम तीव्रता 6 मैग्नीटूयड एवं उससे के भूकम्प आते है। भारतीय उप महाद्वीप में भूकम की सक्रिया को देखते हुए सतर्क रहने की जरूरत है। नेपाल के भूकम्प से प्रदेश पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
डॉ अनुपम काश्यिपी
मौसम विभाग भोपाल
Newsप्रदेश के किसान सीख रहे एसडब्ल्यूआई खेती
जबलपुर। अमूमन एक एकड़ खेत में किसान को गेहूं की बोनी के लिए 70 से 80 किलो गेहंू के बीज का छिंडकाव करना पड़ता है। उपचारित और अच्छे बीज की कीमत रोज बढ़ रही है। ऐसे में किसानों को अब महा बचत का तरीका कृषि विभाग सिखा रहा है। खेत में फालतू बीज नहीं फेंकना पड़ेगा। अत्याधुनिक और रिसर्च पर आधारित गेहूं बोनी और उपज हासिल करने की पद्धति विकसित हुई है। इस पद्धति से मालवा अंचल तथा महाकौशल अंचल के अनेक किसानों को खेती कराई गई। अब जब उपज आई तो इस नई पद्धति एसडब्ल्यूआई के चमत्कार देखने मिले है। उपज कई गुना बढ़ी इसके साथ ही ओला और पानी की जबदस्त मार में भी फसल बच गई। कृषि विभाग इस रिजल्ट से बेहद आशान्वित है दूसरी तरफ किसानों में इसे सीखने जबदस्त उत्साह है।
कृषि विभाग के अनुसार सिस्टम आॅफ वीट इंटेन्सिफिकेशन (एसडब्ल्यूआई ) अत्याधुनिक गेहंू खेती का एक तरीका है। इसे जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय सहित देश के अन्य गेहूं एवं कृषि वैज्ञानिकों ने पद्धति विकसित है। जबलपुर संभाग के लगभग सभी जिलों में छोटे किसाने जिनके पास एक दो एकड़ जमीन है उन्हें चुनकर इस तरीके से खेती कराई गई। पाटन तहसील के ग्राम उड़ना में करीब आधा सैकड़ा किसानों ने इस तरीके से खेती सीखी और की। अब वे इतने परंगत हो गए हैं कि अन्य किसानों को भी आधुनिक खेती सिखा सकते है। जबलपुर के लगभग सभी जिलों में किसानों को एसडब्ल्यूआई पैटर्न सिखाया गया है। इस वर्ष इसका दायरा और अधिक बढ़ाया जाएगा।
क्या है तरीका
एसडब्ल्यूआई के तहत एक एकड़ में गेहूं की बोनी करने के लिए किसान को दस किलो बीज लेने के बाद हल्के गर्म पानी का बीज में छिडकाव कर उसे अंधेरे में रखा जाता है। उसमें अंकुर अच्छी तरह से आ जाने के बाद आठ -आठ इंच की दूरी में दो से तीन अंकुरित बीज को बोया जाता है। यह कुछ धान के रोपा लगाने की तरह होता है। इस तहर से बीज बोने से बीज की बचत होती है। 80 किलो की जगह मात्र दस किलो बीज लगता है।
क्या परिणाम मिले
इस तरके से खेती करने पर चौकाने वाले परिणाम आए। गेहूं के पौधों में दूरिया होने होने के कारण वे मजबत थे। अमूमन गेहूं में 10 से 15 कंसे फूटते है लेकिन इस तरीके से खेती करने पर 30 से 40 कसें फूटे। एक एकड़ में किसान जहां 10-15 क् िवंटल उपज लेता था, वहीं कम बीज में उसमें 25 से 30 क्विंटल तक गेहूं की उजप ली। परम्परागत पद्धति से पांच एकड़ जमीन में जितनी उपज होती थी, वह एक एकड़ में ली गई। सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिणाम यह आया कि इस तरह से बीजारोपण करने वाले किसानों की फसल ओला और भारी वर्षा में खड़ी रही। उनकी जड़े मजबूत होने के कारण प्राकृतिक आपदा में भी खड़ी रही और पेड नहीं गिरे।
वर्जन
एसडब्ल्यूआई से बीजारोपण करने के बेहत अच्छे परिणाम सामने आए है। कृषि विभाग द्वारा किस तरीके से खेती करने का कार्य युद्ध स्तर पर सिखाया जाएगा जिन किसानों ने इस तरीके से खेती की है, वे अन्य को भी सिखा सकते है। छोटे और कम जमीन वाले किसानों के लिए खेती फायदे का धंधा साबित होगी।
बीपी त्रिपाठी
संयुक्त संचालक कृषि
अमूमन होती है, उतनी उसने इसके तहत किसान को एक एकड़ के लिए दस किलो गेहूं के बीज लेकर उसको गर्म पानी की सहायाता से अंकुरित किया जाता है। अंकुर कुछ बड़ा होने पर
कमलेश कर रहे राजनीति से हटकर कार्य
दीपक परोहा
9424514521
जबलपुर। कमलेश अग्रवाल वर्तमान में नगर निगम में पार्षद एवं मेयर इन काउंसिल सदस्य हैं और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ताओं में हैं। राजनीति से हटकर समाज सेवा भी कमलेश अग्रवाल अग्रवाल के जीवन का एक हिस्सा है लेकिन इसे चर्चा और सुर्खियों में रखने पर भरोसा नहीं करते हैं। समाज सेवा के क्षेत्र में कमलेश अग्रवाल ने एक अनूठा कार्य कर रहे है जिसपर किसी का ध्यान नहीं जाता है।
वे अपने इस कार्य से केन्द्रीय जेल जबलपुर में वर्षो से सजा काट रहे और अपने समाज और परिवार से उपेक्षित बंदियों के रहनुमा बन गए हैं। दरअसल जबलपुर केन्द्रीय जेल ही नहीं प्रदेश भर के जेल में सैकड़ों की संख्या में ऐसे बंदी हैं जिनकी सजा खत्म हो जाती है लेकिन आर्थिक परेशानियों ओर परिवार व अपने समाज की उपेक्षा के कारण अपना अर्थदण्ड जमा नहीं कर पाते हैं जिससे उन्हें सश्रम कारावास पूरा भुगतने के बाद भी अर्थदण्ड जमा न कर पाने के कारण कारवास भोगना पड़ता है। खासतौर पर जीवन कारवास की सजा प्राप्त बंदी इनमें शामि हैं जिन्होंने 14 साल की सजा पूरी कर ली और आजाद होने का स्पप्न संजोए है लेकिन आर्थिक तंगी के कारण काल कोठरी में मुक्ति नहीं मिल पाती है। कैद के दिन बढ़ जाते है ऐसे में एक-एक घंटे उन्हें वर्ष समान लगते है। ऐसे बंदियों का अर्थदण्ड जमा करने का काम पिछले पांच साल से कमलेश अग्रवाल कर रहे है। इसके इस कार्य में उनके मित्र एवं परिवार का सहयोग मिलता है।
15 अगस्त को होती है थोक में रिहाई
कमलेश अग्रवाल जेल के अधिकारियों से संपर्क करके उन बंदियों के सम्बंध में पतासाजी करते हैं जिनको उनके परिवार वाले उपेक्षित कर चुके है। उनका सामाजिक बहिष्कार लगभग हो चुका है। उनसे मिलने जुलने कोई नाते रिश्तेदार नहीं आते हैं और वे अर्थदण्ड भरने की स्थिति में नहंी है। उनकी कुछ महीने या दिनों की सजा भी 15 अगस्त के मौके पर माफ करती है उन बंदियों का अर्थदण्ड श्री अग्रवाल स्वयं भरते हैं, और 15 अगस्त को थोक में रिहाई होती है। यूं तो प्रदेश भर के जेलों में ऐसे बंदियों की भरमार हैं लेकिन व्यकित की अपनी सीमाएं होती है। कमलेश अग्रवाल अपने सामर्थ के हिसाब से केन्द्रीय जेल जबलपुर के बंदियों को रिहा कराने में अपना योगदान देतें है। ये बंदी जबलपुर के कम बाहरी जिलों के ज्यादा होते है। उनकी रिहाई से कमलेश को राजनैतिक लाभ तो नहीं मिलता है लेकन मन में किसी को आजादी दिलाने का जो सकून महसूस करते हैं उसे वे अनमोल मानते है। कमलेश अग्रवाल की अपेक्षा है कि और शहर ही नहीं प्रदेश के भी और लोग इस तरह के कार्य के लिए आगे आए, जिससे धन के कारण कोई बेवजह एक दिन की भी सजा न काटे।
4 सौ से अधिक को रिहा कराया
श्री अग्रवाल ने अब तक 400 से अर्थिक बंदियों को रिहा करा चुके हैं। स्वयं एवं परिवार के सहयोग से करीब 4 लाख रूपए का अर्थदण्ड इन बंदियों के बदले भर चुके है। बंदियों को रिहा कराने के अतिरिक्त प्रतिवर्ष वे एक रक्तदान शिविर करते है जिसमें दो से तीन सौ लोग रक्तदान करते है। वे प्रतिवर्ष 31 दिसम्बर को वृद्धजनों के लिए भंडारे का आयोजन करते हैं। उन्होंने छात्र राजनीति से अपना राजनैतिक कैरियर शुरू किया। 45 वर्षीय श्री अग्रवाल 20 साल से सक्रिय राजनीति में है तथा दूसरी बार मेयर इन काउंसिल सदस्य नगर निगम में बने है। इसके अतिरिक्त भाजयुमों में विभिन्न पदों में रह चुके हैं।
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मुकुंदपुर
जबलपुर। दुनिया की दुर्लभ नस्ल में शामिल सफेद बाघ का नया घर अब जल्द ही विंध्य क्षेत्र के मुकुंदपुर में बनने जा रहा है। वाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर का काम लगभग कार्य पूर्ण हो गया। वन विभाग के इस बड़े प्रोजेक्ट को सिर्फ चिड़ियाघर प्राधिकरण से अनुमति मिलना भर शेष है और इसके साथ ही वाइट टाइगरों का जहां से उत्पत्ति हुई थी, वहीं उनका गांव बस जाएगा। एशिया के पहले सफेद बाघ जू का शुभारंभ करने के लिए देश के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के आने की संभावना है।
दुनिया में वाइट टाइगर की दुर्लभ नस्ल सबसे पहले रीवा में पाई गई थी तथा दुनिया के पहले सफेद बाघ मोहन को सीधी वन क्षेत्र में 1951 में रीवा नरेश राजा मार्तंड सिंह ने देखा था और रीवा नरेश के प्रयास से मोहन की संतानें दुनिया के प्रमुख जू की शोभा बनी। मोहन के साथ सफेद बाघों की नस्ल बढ़ी और सफेद बाघ ने रीवा से बाहर का सफर तय किया। वर्तमान में अब अपने उत्पत्ति स्थल में ही वे नहीं है। मध्य प्रदेश शासन ने विंध्य क्षेत्र में सफेद टाइगर की दहाड़ के लिए एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है।
प्रजजन केन्द्र होगा
दरअसल मुकुंदपुर वाइट टाइगर सफारी अथवा वाइट टाइगर जू के बजाए प्रजजन केन्द्र होगा। इसका विस्तार एवं विकास इस तरह से किया गया है कि वाइट टाइगर की फार्मिंग की जा सके। उनकी वंशवृद्धि की जाए। देश में जिन चिड़ियाघरों में सफेद टाइगर है। उनके पास टाइगर मुकुंदपुर के लिए टाइगर डोनेट करने पत्राचार हो चुका है। एक नर एवं दो मादा टाइगर यहां जल्द ही आ जाएंगे।
टाइगर सिफ्टिंग के लिए प्लान
वन अमला जल्द ही टाइगर सिफ्टिंग के लिए प्लान बना रहा है। हर हाल में पूर्ण सुरक्षित तरीके से टाइगर को यहां लाया जाना है। वन विभाग इस प्रोजेक्ट का जल्द शुरू करने की तैयारी में जुटा है, चूंकि सफेद टाइगर के स्थानांतरण काफी चुनौती पूर्ण होता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1979 में सफेद टाइगर दिल्ली स्थानांतरण के बाद अपने घर में नए घर में सामान्य जीवन नहीं जी पाया था और उसकी मौत हो गई थी।
बाड़ा कैसा होना चाहिए
सफेद टाइगर के लिए जो बाड़ा तैयार किए गए है। वे कैसे होने चाहिए, इसके लिए विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई है जो करीब 400 पेज की है। यहां तक उसके बाड़ा में तीनों मौसम के अनुकूल उनके घर की प्राकृतिक वातावरण में तैयार किया गया है। इस जू में सफेद शेर के साथ अन्य वन्य प्राणी भी रखे जाएंगे। हॉल ही में भोपाल में चिडियाघर में सर्प के डंसने से एक सफेद शेर की मौत के बाद इस नई सफारी को चूहों एवं सर्प से मुक्त रखने की भी योजना शामिल की गई है।
इस बैठक में मिलेगी मंजूरी
मुकुंदपुर जू को अभी लायसेंस याने अनुमति पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से नहीं मिली है जबकि प्रस्ताव, लेआउट, बाड़ा सहित अन्य सबंधित विस्तृत रिपोर्ट के साथ 2010 को प्रस्ताव भेजा गया था और प्रस्ताव को स्वीकृत होने के बाद प्रोजेक्ट के तहत कार्य पूर्ण कर लिए है। जू अर्थाटी ने दौरान कर संतुष्ट भी हो चुका है। केंद्रीय चिडियाघर प्राधिकरण की अगली बैठक जैसे ही होगी, वैसे ही वाइट सफारी मुकुंदपुर अस्तित्व में आ जाएगा। अगले माह प्राधिकरण की बैठक होने जा रही है।
बजट के अभाव में क्रोकोडायल हुए लावारिस
जबलपुर। परियट नदी मगरमच्छ का प्राकृतिक घर होने के कारण जबलपुर में सन 2009 से क्रोकोडायल कम्यूनिटी रिसर्च प्रोजेक्ट को यूएनडीपी के सहयोग से प्रारंभ हुुआ लेकिन क्रोकोडायल के संरक्षण के प्रति जानकार लोगों की कमी और फिजूलखर्ची के चलते प्रोजेक्ट बंद हो गया है। इस प्रोजेक्ट को वन विभाग अपने बलबूते चलाने पर विचार कर रहा है लेकिन बजट के अभाव में क्रोकोडायल लावारिस हो गए है। बहरहाल वन रक्षा समिति तथा स्थानीय प्राणी विशेषज्ञों के बलबूते मगरमच्छ का संरक्षण का कार्य जबलपुर में चल रहा है। गर्मियों के कारण परियट नदी जगह जगह सूखने के कारण भी मगरमच्छ को अपने स्थान बदलने पड़ रहे है। जबलपुर में एक अच्छी बात ये है कि यहां मगरमच्छ के शिकार की अब तक एक भी घटनाएं नहीं हुई है। यहां स्थित परियट जलाशय से लेकर खमरिया तक फैल परियट नदी और इस नदी के सहायक नालें मगरमच्छ के घर है किन्तु प्रतिवर्ष बारिश को नाले तथा परियट में आने वाली बाढ़Þ के परिणाम स्वरूप मगर के बच्चे फल्ड के पानी में बहकर समीपस्थ ग्राम के खेतों में चले जाते थे। इसमें से कुछ ही जीवित बचते रहे हैं। वहीं मगर भी नदी स्थित अपने घर छोड़ कर गांव की ओर पहुंच कर हादसे का शिकार होते रहे है जिससे इनकी संख्या बेहद कम हो गई थी।मगरमच्छ संरक्षण के के लिए वर्ष 2009 से क्रोकोडायल कम्यूनिटी प्रोजेक्ट शुरू किया गया। इस प्रोजेक्ट के लिए यूएनडीपी से करीब 30 लाख की राशि स्वीकूत हुई। इसके तहत परियट से झुरझुर तक मगर का प्राकृतिक आवास विकसित करना था, लेकिन वह आज तक विकिसत नहीं हो पाया अलबत्ता प्रोजेक्ट ही बंद हो गया है।अब वन विभाग अपने बलबूते उनका घर आबाद करने कबायद कर रहा है लेकिन बजट के अभाव में मगरमच्छ लावारिस हो गए हैं। फिजूलखर्ची हुई प्रोजेक्ट में जानकारों का कहना है कि मगरमच्छ का कैसे और किस तरह संरक्षण करना है इसकी तननीकि जानकारी के अभाव में प्रोजेक्ट में फिजूल खर्ची ज्यादा कर दी गई। इसकी तुलना में मगरमच्छ को संरक्षण का लाभ नहीं मिला। यही प्रोजेक्ट बंद होने का मुख्य कारण बना। परियट से मगरमच्छ बाहर न आए इसके लिए फैसिंग की गई थी लेकिन वह भी चोरी चली गई है। नदी -नाले के पाट उंचे करने थे बताया गया कि मगरमच्छों के प्राकृतिक आवास विकसित करने नदी एवं नाले के पाटों को उंचा करना था जिससे फ्लड में वे बहें न और नदी छोड़कर भी न जाए लेकिन तमाम कार्य अधूरे पड़े है और अब भी बारिश में मगरमच्छ पर मुसीबत आती है। जानकारी के अनुसार अभी परियट में करीब 60 से अधिक क्रोकोडायल है। ------------ परियट में क्रोकोडायल के संरक्षण के लिए वन रक्षा समिति एवं ग्रामीणों के सहयोग से लगातार कार्य चल रहा है। वन विभाग अपने स्त्रोत से क्रोकोडायल संरक्षण के लिए कार्य कर रहा है। आरएस पांडे एसडीओ जबलपुर ---------------------------------------------------------- जिस क्षेत्र में प्रोजेक्टर चल रहा था, वह वन्य क्षेद्ध नहीं है , किन्तु प्रोजेक्ट के लिए नोडल विभाग वन विभाग ही था। करीब 8 किलोमीटर एरिया में मगर एवं आम ग्रामीणों के सह अस्तिव को लेकर प्रोजेक्ट शुरू हुआ था लेकिन वन विभाग की उपेक्षा के कारण प्राजेक्ट बंद हो गया है इसे फिर शुरू करना आवश्यक है। मनीष कुलेश्रेष्ठ वन्य प्राणी विशेषज्ञ -------
एक गरीब मां की होनहार बेटी मीना मेहरा
दीपक परोहा
9424514521
जबलपुर। ‘एक गरीब माँ रात भर पत्थर उबालती रही...बच्चे पानी पीकर सो गए ...’ किसी कवि की ये पंक्तियां तहसीलदार मीना मेहरा के जीवन में सटीक उतरती है। मीना मेहरा और उसकी बहनों व भाइयों का बचपन बेहद गरीबी और फांकेहाली की स्थिति में गुजरा था। उनकी मां कई बार बेर की झाड़ी से बेरी तोड़कर बच्च्चों को खिलाकर उन्हें सुला देती थी और कई बार वे कहती थी कि आज बेर का भी जुगाड़ नहीं है। सिवनी जिले में पदस्थ मीना मेहरा से जब उनके एजूकेशन और स्कूल के दिनों के बारे में पूछा गया तो अपने उन दिनों की याद आने पर आंखें भर आई है।
तहसीलदार मीरा मेहरा का जीवन संघर्ष भरा जरूर रहा लेकिन उन्होंने विभाग में अपनी मेहनत लगन से वो नाम अर्जित किया है जो कम ही लोग होता है। अपने जीवन में मीरा मेहरा को जो फांकाहाली का सामना करना पड़ा है उससे वे भूखे रहने का पीड़ा जानती है, उनके घर से कोई भी गरीब व्यक्ति भूखा नहीं जाता है।
पिता खाली हाथ लौटते थे रोज
मीना मेहरा के पिता कमल सिंह नरसिंहपुर जिले से जबलपुर काम की तलाश में आए थे, प्रिंटग प्रेस का काम जानते थे। प्रतिदिन घर से काम के लिए निकलते थे लेकिन कई -कई दिन काम नहीं मिलता था। ऐसे में खाली हाथ की अक्सर घर लौटते थे। उनकी मां श्रीमती सरोज सिंह सिलाई कढ़ाई कर किसी तरह परिवार को गुजरबसर करती रही।
दुकानदार देता था उधार में किताब
मीना मेहरा और उसके परिवार की मॉली हालत जानकर बस स्टेंड में एक स्टेशनरी वाला कापी किताब उधार में दे दिया करता था, मीना मेहरा बताती है कि अब न जाने कहां किताब वाला चला गया है, उसकी उधारी चुकानी है।
डिप्टी कलेक्टर बन सकती थी
मीरा मेहरा ने पीएससी की परीक्षा दी तो उन्होंने प्रथम वरियता नायब तहसीलदार के लिए भरा लेकिन जब परीक्षा परिणाम निकला तो उन्हें इंटरव्यू में बताया गया कि उनका प्रावीण्य सूची में स्थान है यदि आप डिप्टी कलेक्टर के लिए फार्म में प्रथम वरियता भरती तो डिप्टी कलेक्टर के लिए चयन किया जाता। वर्तमान में अपने कार्य के प्रति वे संतुष्ट हैं और उनका प्रयास रहता है कि गरीबों का उत्थान हो और उनके क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति भूखे पेट न सोए। वर्तमान में मीरा मेहरा धनौरा जिला सिवनी में तहसीलदार है। उनसे बड़ी बहन श्रीमती माया दास महिला बाल विकास अधिकारी, बड़े भाई अमर सिंह एसबीआई में अधिकारी तथा छोटा भाई राजेन्द्र सिह स्पोर्ट आफिसर इंजीनियरिंग कालेज में हैं।
Sunday, 31 May 2015
ट्रांजिट हाउस उपलब्ध नहीं संसाधन
जबलपुर। पशु चिकित्सा महाविद्यालय में स्थापित वन्य प्राणी केन्द्र सिर्फ नाम का रह गया है। यहां शाकाहारी एवं मांसाहारी वन प्राणियों को उपचार के दौरान रखने के लिए ट्रांजिट हाउस तक नहीं है। बांधवगढ़, पन्ना, पेंच तथा कान्हा नेशनल पार्क के मध्य स्थित जबलपुर स्थित वन प्राणी केन्द्र से वन विभाग के बड़ी आशाएं थीं लेकिन जबलपुर में नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय हो जाने के बावजूद यहां ट्रांजिट हाउस तक नहीं बन पाया है जिसके परिणाम स्वरूप घायल और बीमार वन्य प्राणियों को अकाल मौत के मुंह में जाना पड़ता है। सिर्फ पशुचिकित्सालय महाविद्यालय ही नहीं वन अमने के पास भी ट्रांजिट हाउस नहीं है। केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के नियमों के अनुसार चिड़िया को रखने के लिए तैयार होने वाले ट्रांजिट रूम के लिए 20 फुट लम्बा, चौड़ा और उंचा बाड़ा होना चाहिए। इसमें घायल परिंदे अथवा उसके असहाय बच्चों को तब तक रखा जा सकता है जब तक वह स्वयं प्राकृतिक वातावरण में जीवित रहने लायक न हो जाए। इसी तरह शाकाहारी प्राणी, हिरन, बारहसिंघा आदि के लिए 10 गुणित 10 फुट का बाड़ा होना चहिए। इसी प्रकार मांसाहारी जीव के लिए 20 गुणित 20 फुट का बाड़ा होना चाहिए। पशुचिकित्सा महाविद्यालय में ट्रांजिट हाउस की जगह कुछ पिंजरे भर मौजूद हैं। बकरी के साथ हिरन का बच्चा बरगी के जंगल में चरने गई बकरी के साथ पूर्व में हिरन का बच्चा आ गया था। इस नवजात हिरन के बच्चे को रखने एवं उपचार की बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी। जबलपुर में अनेक बार लकड़बग्घा, हिरन, बारहसिंघा जैसे प्राणी घायल अवस्था मिल चुके हैं। इसके उपचार के लिए कम से कम महीना रखना आवश्यक था लेकिन आनन-फानन उन्हें बिना घाव भरे ही जंगल में छोड़ना पड़ा है। बाघ का इलाज संभव नहीं वन्य प्राणी केन्द्र में बाघ एवं तेन्दुए का इलाज हो सके इसके लिए वन विभाग ने कई करोड़ रुपए इस केन्द्र को दिए थे लेकिन यहां आज तक बाघ का इलाज संभव नहीं हो पाया है। दरअसल बाघ के उपचार के लिए उस पर शिकंजा कसने के लिए इस्क्यूंजर होना चाहिए लेकिन यह मशीन यहां नहीं है। यहां लाए जाने वाले बाघ को बेहद क्रूरतापूर्वक देशी शिकंजों से दबाकर रखा जाता है। बाहर जाते हैं उपचार के लिए हालत ये है कि नेशनल पार्क द्वारा अपने बाघ जैसे वन्य प्राणियों को उपचार के लिए यहां भेजना बंद कर दिया है। उनके उपचार के लिए चिकित्सकों को जंगल ही बुलाया जा रहा है। हाल ही में बांधवगढ़ में एक बाघिन को कॉलर आईडी के कारण गहरा जख्म हो गया था। उसकी प्लास्टिक सर्जरी जबलपुर के पशु चिकित्सकों ने जाकर की थी। वर्जन पशु चिकित्सा महाविद्यालय में वन्य प्राणी केन्द्र स्थापित हैं लेकिन ट्रांजिट हाउस नहीं हैं किन्तु उपचार के लिए वन्य प्राणियों को रखने के लिए व्यवस्थाएं और बेहतर करने की योजना हैं। वन विभाग का वन्य प्राणी ट्रांजिस्ट रूम जबलपुर में होना चाहिए। इससे वन प्राणियों को लम्बे समय तक रखकर उस पर अध्ययन एवं अनुसंधान किया जा सकेगा। एबी श्रीवास्तव , डायरेक्टर वन्य प्राणी केन्द्र पशु चिकित्सा महाविद्यालय वर्जन मेरे द्वारा जबलपुर पशु चिकित्सा महाविद्यालय में ट्रांजिट हाउस तैयार करने की अनेक बार मांग की जा चुकी है लेकिन विभाग अनसुनी कर देता है। जबलपुर सहित समीपस्थ जिलों में आए दिन वन्य प्राणी वाहनों, खदान, नहर तथा अन्य कारण से गंभीर जख्मी हो जाते हैं, लेकिन इन जख्मी जानवर को रखने कोई व्यवस्था नहीं है। इसी तरह प्राणियों के बच्चों को भी संरक्षण प्रदान करने व्यवस्था नहीं है। मनीष कुलश्रेष्ठ, वन्य प्राणी विशेषज्ञ ---------------------------------------------------------- सेना को दुर्गम इलाके में रसद पहुंचाने तैयार होंगे एलएसव्ही जबलपुर। भारतीय सेना को ऊंचे पहाड़ी और दुर्गम स्थानों पर रसद पहुंचाने के लिए लाइट स्पेस्लिस्ट व्हीकल(एलएसव्ही) की जरूरत महसूस की जा रही है। व्हीकल फैक्टरी द्वारा एलएसव्ही तैयार करने प्रस्ताव तैयार किया है। इसको लेकर सहयोगी कंपनियों को भी आमंत्रित किया जा चुका है। इस व्हीकल के तैयार होने पर दुर्गम स्थलों पर तेजी से लाइट व्हीकल पहुंच कर रसद की आपूर्ति बेहतर तरीके से कर सकेंगे। अति दुर्गम स्थलों में अब भी रसद हैलीकाप्टर से ही पहुंचाई जा रही है। सूत्रों की माने तो व्हीकल फैक्टरी को ऐसे वाहन तैयार करने की डिमांड सेना से मिली है, इसको लेकर काफी समय से गहन तैयारी चल रही है। ये लाइट व्हीकल वर्तमान में सेना के लिए तैयार हो रहे एलपीटीए तथा स्टालियन से भी हल्के चाहिए। इन वाहनों का स्वरूप कैसा होगा, उसमें कितने एचपी का इंजिन होगा तथा कितना बडेÞ आकार का होगा इसको फिलहाल पूरी तरह गोपनीय रखा गया है। एलएसव्ही की कागज में डिजाइन तैयार की गई है। उल्लेखनीय है कि व्हीकल फैक्टरी में सेना के लिए वाहन उत्पादन के कार्य में काफी पिछड़ चुकी है। यहां वर्तमान सेना मारूति कंपनी की जिप्सी तथा टाटा कंपनी की 407 व्हीकल को उपयोग व्यापक पैमाने में करती है। जिप्सी एवं टाटा 407 को बुलेट प्रूफ बनाने का काम व्हीकल फैक्टरी के पास है। इसे आर्मड बनाने के लिए फैक्टरी इसका वजन काफी बढ़ा देती है लेकिन वहान के इंजन की क्षमता बेहतर होने के कारण आर्मड जिप्सी एवं टाटा 407 काफी सफल वाहनों की श्रेणी में हैं। इन वाहनों का इस्तेमान सेना गश्ती तथा सोल्जर के परिवहन के लिए भी करती है लेकिन सेना को ऐसे हल्के वाहनों की आवश्यकता है जो दुर्गम स्थानों में तेज गति से पहुंच सके। इसके लिए न्यू डिजाइन तैयार की जा रही है और इसको तैयार करना भी व्हीएफजे ने प्रस्तावित किया है। -------------------------------- ये होना नए मॉडल की विशेषता * 5-6 सैनिकों को ले जाने की क्षमता * सैनिक न होने पर रसद परिवहन * गश्ती में उपयोगी होना चाहिए * सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर * गुणवत्ता के अंतराष्ट्रीय मापदण्ड के अनुरूप ---------------------------- सुलगते जीवन में इंद्रधुनषी रंग बिखरने प्रयास बेसहारा बालिकाओं का जीवन संवारने ‘ इंद्रधनुष- आओ रंग बिखेरे’ योजना शुरू जबलपुर। जबलपुर में पुलिस महानिरीक्षक महिला प्रकोष्ठ कार्यालय द्वारा ‘ इन्द्र धनुष -आओ रंग बिखेरे योजना ’ शुरू की गई है। इस योजना के नाम से जाहिर होता है कि इन्द्र धनुष की तरह सुन्दर और सभी रंग से खूबसूरत रचना बनाने संबंधी योजना है। जी हां समाज की एक ऐसी बालिका जिसके माता पिता नहीं है बेसहारा है, के जीवन में खुशियों के रंग बिखेरने की योजना है। प्रदेश में समुदायिक पुलिसिंग के तहत पुलिस महिला प्रकोष्ठ द्वारा ये योजना प्रारंभ की गई है। शहर में ऐसी बालिकाएं जो भीख मांग रही है या कहीं मजदूरी करके पेट की बाग बुझा रही है। उसका बपचन कहीं गुम है। बाला अवस्था सुलगता जीवन बना है और कू्रर समाज उस पर गिद्ध की तरह भूखी नजर गढाए है , उसको नोचने और खाने के लिए तैयार बैठा है,उसकी पहचान कर उसका भवष्यि सुरक्षित करने की पहल नगर में प्रारंभ की गई है। योजना के तहत इस बेसहारा बालिका के जीवन में खुशियों के रंग भरने के लिए उसके लिए एक परिपालक की भी तलाश की जाएगी। इस परिपालक का बालिका को सहारा मिलने से वह भविष्य में सबल आत्मनिर्भर नारी बनकर पुरूष प्रधान समाज में सम्मान के साथ जीवन जी सकेगी। इस योजना का उद्देश्य है कि बालिका के जीवन में खुशियों के रंग भर जाए लेकिन वर्तमान व्यवस्था में यह सम्भव प्रतीन नहीं होता है कानून या किसी शासकीय कार्यक्रम से गुमनाम निराश्रित बालिका को सहारा मिल पाए। इस तथ्य को ही ध्यान में रखते हुए आईजी महिला प्रकोष्ठ प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव एवं उनके अधीनस्थ इंस्पेक्टर सुरेखा परमार व अन्य ने एक ऐसी योजना शुरू करने की कल्पना को सकार रूप दिया जिसमें समाज के हर वर्ग, समाज सेवी संस्थाएं और सहृदय लोग के सामुहित प्रयास से निरापद बालिकाओं को सहारा मिल सके। इसमें शासकीय तंत्र का भी सहयोग रहेगा। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह तो इस योजना का शुभारंभ करते वक्त बेहद भावुक हो उठे थे। बहरहाल जबलपुर में भविष्य की एक बड़ी योजना का बीजारोपण गत शुक्रवार को हो गया। योजना के संबंध में महिला इंस्पेक्टर सुरेखा परमार ने बताया कि बालकों एवं किशोरों/किशोरियों को संरक्षण देने के लिए कानूनी प्रावधान है। उनके लिए सेल्टर हाउस भी है। कई एनजीओ एवं समाजसेवी संस्थाएं कार्य भी कर रही है लेकिन इसके बावजूद इस दिशा में विशेष गति से कार्य नहीं हो पाए हैं। अनेक मामले में देखा गया कि ऐसी निराश्रित बालिकाओं को इनके किशोर होने के साथ ही 12-13 वर्ष की उम्र में ही बेंच दिया जाता है अथवा देह व्यापार के घिनौने काम में उतार दिया जाता है। अंधेरी दुनिया में ऐसी अनगिनत बालिकाएं मौजूद हैं। इस हालत में पहुंचने के पहले ही उन्हें आश्रय देने की जरूरत है। जबलपुर की समाज सेवी संस्थाओं को साथ लेकर निराश्रित बालिकाओं के संरक्षक या प्रतिपालक बनाए जाने का काम सौंपा गया है। दरअसल ये गोद लेने से थोड़ी भिन्न प्रक्रिया है। इसमें बालिकाआें के प्रति उनके संरक्षकों या प्रतिपालकों के दायित्व तय है। वे व्यक्ति अथवा संस्थाएं हो सकते हैं। इसके तहत उनके सुरक्षित आवासीय व्यवस्था, शिक्षा, भरणपोषण एवं स्वास्थ्य का दायित्व सौंपा गया है। वर्जन समाज में निराश्रित बालिकाओं को चिंहिंत किया जा रहा है। इसकेअतिरिक्त प्रतिपालक बनने वालों के आवेदन लिए जा रहे हैं तथा उनका पुलिस सत्यापन के उपरांत नोडल अधिकारी के टीम की मौजूदगी में उन्हें जवाबदारी दी जाएगी। निश्चित ही आने वाले समय में यह योजना से लाभांवित होने वाली बालिकाओं की संख्या बढ़ेगी। इसके अतिरिक्त ये योजना अन्य जिलों में भी लागू की जाएगी। योजना के तहत भविष्य में बेसहारा बालक को भी इसी तरह से संरक्षण प्रदान करने का विचार है। फिलहाल प्रदेश में सिर्फ जबलपुर में ये पहला प्रयास है। श्रीमती प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव आईजी महिला प्रकोष्ठ प्रारंभिक चरण की स्थिति एक नजर में प्रतिपालक बालिकाएं मप्रवि महिला मंडल - 2 वनवासी चेतना आश्रम -1 एमपी सिंह, कंपनी कमांडर - 2 इंस्पेक्टर सुरेखा परमार -1 श्रीराम शर्मा एसएएफ -1 एमके पांडे -2 मनु खेत्रपाल -1 संध्या विनोदिया -2 सुजाता सिंह -1 गिरीश बिल् लौरे -1 रजनीश सिंह -1 -दावे-आपत्तियों के निराकरण में बरतें सतकर्ता --------------------------------------------------------------- - बांधवगढ़ में बसंत फिल्मांकन की रहेगी होड़ बीबीसी से तीन साल का करार जबलपुर। बांधवगढ़ में बसंत के महीने जहां पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी। इसके साथ ही यहां फोटोग्राफी भी जमकर होगी। बांधवगढ़ की बसंत फिल्मांकन में अच्छी कमाई होने वाली है। एक वर्ष में बांधवगढ नेशनल पार्क ने करीब एक करोड़ रूपए से अधिक फिल्मांकन में कमाए है। प्राप्त जानकारी के अनुसार बांधवगढ़ में देशी एवं विदेशी पर्यटकों द्वारा की जाने वाली छायांकन पार्क की बड़ी कमाई का जरिया रहता है। यहां देशी फोटोग्राफर से फिल्मांकन के प्रतिदिन 20 हजार प्रतिदिन तथा 40 हजार रूपए विदेशी फोटोग्राफर से प्रतिदिन लिए जाते है। इसके अतिरिक्त फिल्मांकन के लिए यदि हाथी उपलब्ध कराने के लिए 12 हजार रूपए प्रतिदिन लिया जाता है। फोटो ग्राफरों को जंगल के बसंत फिल्मांकन पर बेहद रूचि रहती है। यूं तो अन्य सीजन में भी फोटाग्राफी चलती है लेकिन बसंत में ज्यादा फिल्मांकन होता है। फिल्मांकन के लिए अनुमति पार्क में लम्बी सूटिंग के लिए बकायदा नेशनल पार्क अर्थाटी से अनुमति लेनी पड़ती है। सूत्रों की माने तो हॉल ही में बीबीसी को 100 दिन की सूटिंग की अनुमति मिली है। पार्क में बारिश के सीजन जून से अक्टूबर तक बंद रहता है। पार्क में सावन-भादों का फिल्मांकन एवं फोटो ग्राफी के लिए पूर्व में भी कई आवेदन आ चुके है लेकिन यहां बारिश में प्रवेश बंद रहता है जिसके कारण अधिकांश फोटोग्राफर बसंत का सीजन ही फोटोग्राफी के लिए पसंद करते है। इस सीजन में जंगल में जीवन खिल उठता है। बीबीसी से करार बीसीसी ने बांधवगढ़ में सौ दिन की शूटिंग की अनुमति मिल गई है। करार के तहत ये शूटिंग तीन साल चलेगी। बारिश में शूटिंग की अनुमति नहीं मिली है। मार्च महिने में 30 दिन बीबीसी बांधवगढ़ की शूटिंग करेगी। इसके बाद वर्ष 2016 तथा 2015 में भी मार्च माह में ही शूटिंग होगी। ये शूटिंग हाथी के साथ जिप्सी से की जाना है। हिडैन कैमरे का उपयोग होना है। ऐसी भी संभावना है कि रैनी सीजन के दस दिनों की शूटिंग की विशेष अनुमति बीबीसी को मिल सकती है। तीन साल होगी शूटिंग बीबीस ने इस वर्ष मार्च माह में शूटिंग करने का एडवांस भुगतान करीब 44 लाख रूपए कर दिया है। पार्क में पिछले वर्ष एक करोड़ से अधिक रूपए फिल्मांकन से अर्जित किए थे। इसके पूर्व भी पार्क में शूटिंग हो चुकी है। सीएच मुरली कृष्ण फील्ड डायरेक्टर बांधवगढ़ नेशनल पार्क दो वर्ष अगले दो वर्ष डेढ़ करोड़ रूपए में बसंत फिल्म --------------------------------------------------- दक्षिण भारत में भी बिकने लगी आदिवासी बालाएं डिंडौरी में लड़कियां बेंचने वाले दलाल ने खोला राज जबलपुर। आदिवासी जिले डिंडौरी और मंडला में आदिवासी बालाओं की तस्करी का कारोबार थम नहीं रहा है। यहां आदिवासी बालाओं को दिल्ली नोयड़ा और उत्तराखंड में बेचे जाने का अवैध कारोबार धडल्ले से चल रहा है। कई गिरोह पकड़े भी जा चुके है लेकिन गत 20 जनवरी को डिंडौरी पुलिस ने जब मानव दुर्व्यापार में जुड़े दो दलालों को पकड़ा तो पहली बार यह राज खुला कि आदिवासी बालाएं दक्षिण भारत में भी बिक रही है। दरअसल अपराधी बालाओं को मजदूरी के बहाने दूसरे राज्यों में ले जाकर बेंच रहे हैं, जिससे काफी समय तक पुलिस की निगाह में नहीं आते है। हाल ही में डिंडौरी जिले में चौकाने वाला मामला प्रकाश में आया जिसमें एक आदिवासी युवती को केरल में बेचने ले जाया जा रहा था जिसको पुलिस ने पकड़ा। पुलिस मामले की अब भी गहन जांच पड़ताल में जुटी है। जबलपुर के पड़ोसी जिले मंडला और डिडौंरी में मानव व्यापार का अवैध कारोबार पिछले एक दसक से चल रहा है। पुलिस के आला अफसरों का भी मानना है कि इस कारोबार पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। दूर- दराज के आदिवासी गांवों में बालाओं को काम धंधे में लगाने के बहाने उनके अभिभावकों को रकम देने के बाद दलाल ले जाते है और ये बालाएं बंधुआ मजदूर बना ली जाती है। इतना ही नहीं इनका दैहिक-शोषण भी होता है। तीन अपराध दर्ज डिंडौरी जिलें में बीते वर्ष आदिवासी युवतियों को बेचे जाने के तीन मामले पंजीबद्ध किए गए है। इसमें आरोपी भी पकड़े गए। इसी तरह मंडला जिले में दो मामले दर्ज हुए जबकि जबलपुर में मानव व्यापार का एक भी मामला दर्ज नहंी है जबकि यहां भी युवतियां छतरपुर एवं राजस्थान में बेची जाने की घटनाएं वर्ष 2014 में प्रकाश में आई है। विवाह के नाम पर अपहरण डिंडौरी में ही गत 20 जनवरी को समनापुर थाना में दो दलाल द्वारा मिलकर एक आदिवासी बाला को केरल बेंचने के लिए ले जा रहे थे जिन्हें पुलिस ने सुनियोजित तरीके से दबोचा। समनापुर पुलिस के अनुसार रामसहाय नामक दलाल जो कि लम्बे अर्से से आदिवासी बालाओं के बेंचने के मामले में संदिग्ध है। वह अपने साथी भले सिंह के सम्पर्क में आया। उसके साथी ने ने एक युवती का विवाह राम सहाय से कराने का झांसा दिया और उसको विवाह के बहाने डिडौंरी लेकर पहुंचा था तथा वहां से केरल ले जाकर बेचने की योजना थी लेकिन इसके पहले ही पुलिस ने दोनों को दबोच लिया। पुलिस ने इस मामले में अपहरण का मामला दर्ज किया है। केरल गई है टीम सूत्रों के अनुसार पुलिस को चौकाने वाली जानकारी आरोरियों से मिली है। उसके अनुसार डिंडौरी के अतिरिक्त मंडला से भी कई आदिवासी बालाएं केरल में बेंची जा चुकी है। केरल में आदिवासी बालाओं को खरीद कर दक्षिण भारत के बड़े शहरों में सप्लाई करने वाला गिरोह सक्रिय है। इस गिरोह की तलाश के लिए टीम केरल गई है। पुलिस इस मामले में संजीदगी से पड़ताल करे तो एक बड़ा नेटवर्क सामने आ सकता है। पुलिस मामले की जांच पड़ताल कर रही है। केरल भी पुलिस दल रवाना किया गया है। दरअसल मजदूरी के बहाने अधिकांश लड़कियों को बाहर ले जाया जाता है जिसके कारण उनके अपहरण की भी रिपोर्ट नहंी होती है। आदिवासी क्षेत्र में बालाओं को बेचे जाने कुप्रथा जैसे है। इसके लिए व्यापक सर्वे की जरूरत है लेकिन पुलिस की सख्ती के कारण काफी समय से ऐसी बड़ी घटना प्रकाश में नहीं आई है। मोहम्मद यूसूफ पुलिस अधीक्षक डिंडौरी ................................................................................................ समाज सेवा में समर्पित दंपत्ति दीपंकर और मिताली बैनर्जी ने दी शहर को विकलांग सेवा की नई राह जबलपुर। गैर सरकारी संगठन विकलांग सेवा भारतीय संस्था से जुड़ कर समाज के विकलांग बच्चों के कल्याण के लिए काम करने रही बैनर्जी दंपत्ति ने सिर्फ नि:शक्त बच्चों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का समाज सेवी कार्य भर नहीं किया बल्कि इनके कार्य के प्रति लगन एवं सेवा भाव से समाज प्रेमी और लोगों को प्रेरणा मिली और जबलपुर में विकलांगों की सेवा क्षेत्र में एक क्रांति ने जन्म लिया। यही वजह है कि आज दर्जनों लोग इस क्षेत्र में सेवाभाव से कार्य कर रहे हैें। यदि विकलांग सेवा भारतीय संस्था की बात की जाए तो संस्था 1960 से मान्यता प्राप्त है। जबलपुर में सन् 1991 से ही सही मायने में समाज के सामने आई। जबलपुर में मानसिक रूप से मंद तथा मूक-बधिर बालक-बालिकाओं के लिए संस्था कार्यरत है। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 14 जनवरी 1991 में विकलांग सेवा भारती ने दो बच्चों के साथ काम करना शुरू किया। सन् 1994 से पूर्व सांसद जयश्री बैनजी के सुपुत्र दीपांकर बैनर्जी इस संस्था से जुड़ कर समाज के नि:शक्त बच्चों की सेवा कार्य में जुड़े तो संस्था ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और विकलांग बच्चों की सेवा के लिए बकायदा दो स्कूल संचालित होने लगे। वर्तमान में संस्था में लगभग 150 बच्चे हैं। इन विकलांग बच्चों को इस तरह संस्था में सक्षम बनाया जा रहा है कि यहां से पढ़ने एवं प्रशिक्षण पाने वाले अब सामान्य जीवन में स्वालम्बी बन चुके है। स्वयं का रोजगार कर रहे हैं या फिर किसी संस्था में पूरी जिम्मेदारी से नौकरी कर रहे है। संस्था को अपने उद्देश्यों में सफलता तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान दीपांकर बैनर्जी का है। दीपांकर बैनर्जी ने सिर्फ जबलपुर ही नहीं बल्कि प्रदेश में विकलांग बच्चों के कल्याण के लिए अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। श्री बैनजी सन 2007 से लेकर 2014 तक आयुक्त नि:शक्तजन के पद पर रहे तथा नि:शक्तों के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए। श्री बैनर्जी ने बताया कि मुझे बेहद खुशी मिलती है नि:शक्त बालक बालिकाओं के कल्याण के लिए कार्य करने में। मुझे इसके लिए अपनी माताजी का आर्शिवाद प्राप्त है। सर्वाधिक खुशी की बात है कि जबलपुर से हर बार दो-तीन विकलांग बालक बालिकाएं विकलांगों के लिए आयोजित ओलम्पिंक में भाग लेते है। इस वर्ष भी दो विकलांगों का जबलपुर से चयन हुआ है। संस्था के पुलिस लाइन तथा जार्ज टाउन स्कूल में दो प्रशिक्षण संस्थाएं संचालित की जा रही है। मिताली बैनजी का सहयोग अपने पति दीपांकर बैनर्जी के साथ समाज सेवा के कार्य में हमेशा उनकी धर्मपत्नी मिताली बैनर्जी का सहयोग रहा है। परिवारिक कामकाज के बाद जब भी समय निकलता है वे समाज सेवा के पुनीत कार्य में अपनी आहूति देती रही है। विकलांगों की सेवा में समर्पित उनके कार्य के चलते उसको विकलांग सेवा भारतीय संस्था में महत्वपूर्ण एवं जिम्मेदारी का सचिव पद सौंपा गया है। आज उनके नेतृत्व में विकलांग सेवा भारतीय संस्था उत्तरोत्तर प्रगति कर रही है और नित नए आयाम दिशा में स्थापित कर रही है। विकलांग सेवा भारतीय संस्थान के बालक बालिकाओं द्वारा उत्पादित सामग्री को लेकर मेला एवं कार्यक्रमों में लगने वाले स्टॉल में लोगों की भीड़ स्वयं बयान कर देती है कि उनको उच्च्चकोटी का और प्रतिस्पर्धा में खरे उतरने वाला प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे विकलांग समाज की मुख्यधारा में जुड़ने के बाद स्पर्धा में अव्वल रहें। .................................................................................................... 7771837888 शहर के आटो चालक स्मैक की गिरफ्त में स्मैक के अवैध कारोबार का मकड़जाल फैला जबलपुर। शहर में स्मैक का मकड़जाल जबदस्त तरीके से फैलता जा रहा है। स्मैक बढ़त
ब्रिटिश हुकुमत की यादगार टॉउन हॉल गांधी प्रतिमा अनावरण के साथ बन गया गांधी भवन
जबलपुर। भारतीय इतिहास में ईस्ट इंडिया कम्पनी की लूट खसोट एवं भारतीय राजवाड़ों को हड़पे जाने से उपजे 1857 के विद्रोह बाद भारत में ब्रिटिश हुकुमत ेकी यादगार है टॉउन हॉल। दरअसल ब्रिटेश की महारानी विक्टोरिया के जुबली वर्ष पर उनकी चिरकालीन स्मृति में जबलपुर के राजा गोकुलदास राय बहादुर बल्लभ दास सेठ ने 30 हजार रूपए की लागत से भवन बनाकर ब्रिटिश कमिश्नर को 1890 में सौंपा था। इसका भवन को जनता के उपयोग के लिए बनाया गया था बाद में इसका संचालन नगर निगम के हाथों में आ गया। आजादी पूर्व के नगर पालिका इस भवन को नगर में होने वाले उत्सव एवं कार्यक्रमों के लिए उपयोग करती रही है। वर्षो तक इस ऐतिहासिक इमारत का नाम टाउन हाल रहा है। ये नाम देश प्रेमियों को ब्रिटिश हुकुमत की यादगार दिलाता रहा है। जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को तो भी भी हाउन हाल नाम पसंद नहीं आया। ये इमारत ब्रिटिश साम्राज्ञी की स्मृति पर बनी जरूर लेकिन इस दौर में भवन कला का ये बेजोड नमूना रही है। फारसी और भारतीय स्थापत्य कला का मिला जुला नमूना है। भारतीय शैली से पत्थर की नींव तथा फारसी इंजीनियरिंग के आधार पर बेस स्थापित किया गया। इसकी दीवारे डेढ़ से दो फुट मोटी पक्के ईटों की थी। ईटों के बीच चूना और रेत की जुड़ाई तथा इसी का प्लास्टर है जो अब भी मौजूद है। बाहरी तथा भीतरी वास्तु सज्जा में फारसी गुम्बद, झरोके तथा आर्च का बहुतायत से उपयोग किया गया है। सिलालेख में उल्लेख है कि 1890 में तैयार हुए इस भवन की कीमत 30 हजार रूपए थी। 1962 में हुआ गांधी भवन इस ऐतिहासिक इमारत में आजादी के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की गतिविधियां शुरू हो गई थी। इसको ब्रिटिश शाासन की यादगार के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद और स्मृति से जोड़नें की बात उठने लगी। तत्कालीन महापौर रामेश्वर प्रसाद गुरू ने भवन का कायाकल्प कराते हुए यहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित की गई। इस प्रतिमा का अनावरण गांधीवादी तथा भू दान आंदोलन के महा नायक जय प्रकाश नारायण ने किया। जबलपुर का टाउन हाूॅल गांधी भवन हो गया। यहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वाचनालय तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संघ को एक रूम आवंटित है। इसके अतिरिक्त गांधी भवन को नगर निगम का वाचनालय स्थापित है। इसमें एतिहासिक गजट, एतिहासिक समाचार पत्र एवं पुस्तकों के भरमार है। यह वाचनालय जबलपुर एतिहास की अनमोल धरोहर है जिसमें ब्रिटिश हुकुमत के दौरान जारी होने वाले कई आदेश तथा गजट का व्यौरा मिलता है। वर्तमान हालत गांधी भवन के सामने खुले मैदान में महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित है जिसपर गांधी जयंती तथा 30 जनवरी को कांग्रेसी तथा गांधी विचारधारा के लोग श्रद्धासुमन अर्पित करने आते है। पार्क की दीवार जर्जर हालत हो चली है। फुहारा तथा उसकी टंगी की हालत जर्जर है। टाउन हाल के चारों तरफ जबदस्त गंदगी व्याप्त है। गांधी की छत्रछाया में नशाखोरी विक्टोरिया अस्पताल के बाजू से स्थित टाउन हाल में गांधी की प्रतिमा तले उनकी छत्रछाया में जबदस्त तरीके से नशाखोरी चलती है। एविल तथा अन्य नशीले इंजेक्शन लगाने वाले तत्वों ने यहां डेरा जमाए रहते है। वाचनालय के रात्रि 8 बजे बंद हो जाने के बाद परिसर की दीवार कूंद कर नशेलची अपना डेरा जमा लेते हैं।
समाज से उपेक्षित बंदियों का रहनुमा
राजनीति से हटकर कार्य
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दीपक परोहा
9424514521
जबलपुर। कमलेश अग्रवाल वर्तमान में नगर निगम में पार्षद एवं मेयर इन काउंसिल सदस्य हैं और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ताओं में शुमार हैं। राजनीति से हटकर समाज सेवा भी कमलेश अग्रवाल अग्रवाल के जीवन का एक हिस्सा है लेकिन इसे चर्चा और सुर्खियों में रखने पर भरोसा नहीं करते हैं। समाज सेवा के क्षेत्र में कमलेश अग्रवाल ने एक अनूठा कार्य कर रहे है जिसपर किसी का ध्यान नहीं जाता है।
वे अपने इस कार्य से केन्द्रीय जेल जबलपुर में वर्षो से सजा काट रहे और अपने समाज और परिवार से उपेक्षित बंदियों के रहनुमा बन गए हैं। दरअसल जबलपुर केन्द्रीय जेल ही नहीं प्रदेश भर के जेल में सैकड़ों की संख्या में ऐसे बंदी हैं जिनकी सजा खत्म हो जाती है लेकिन आर्थिक परेशानियों ओर परिवार व अपने समाज की उपेक्षा के कारण अपना अर्थदण्ड जमा नहीं कर पाते हैं जिससे उन्हें सश्रम कारावास पूरा भुगतने के बाद भी अर्थदण्ड जमा न कर पाने के कारण कारवास भोगना पड़ता है। खासतौर पर जीवन कारवास की सजा प्राप्त बंदी इनमें शामिल हैं जिन्होंने 14 साल की सजा पूरी कर ली और आजाद होने का स्वप्न संजोए है लेकिन आर्थिक तंगी के कारण काल कोठरी में मुक्ति नहीं मिल पाती है। कैद के दिन बढ़ जाते है ऐसे में एक-एक घंटे उन्हें वर्ष समान लगते है। ऐसे बंदियों का अर्थदण्ड जमा करने का काम पिछले पांच साल से कमलेश अग्रवाल कर रहे है। इसके इस कार्य में उनके मित्र एवं परिवार का सहयोग मिलता है।
15 अगस्त को होती है थोक में रिहाई
कमलेश अग्रवाल जेल के अधिकारियों से संपर्क करके उन बंदियों के सम्बंध में पतासाजी करते हैं जिनको उनके परिवार वाले उपेक्षित कर चुके है। उनका सामाजिक बहिष्कार लगभग हो चुका है। उनसे मिलने जुलने कोई नाते रिश्तेदार नहीं आते हैं और वे अर्थदण्ड भरने की स्थिति में नहंी है। उनकी कुछ महीने या दिनों की सजा भी 15 अगस्त के मौके पर माफ करती है उन बंदियों का अर्थदण्ड श्री अग्रवाल स्वयं भरते हैं, और 15 अगस्त को थोक में रिहाई होती है। यूं तो प्रदेश भर के जेलों में ऐसे बंदियों की भरमार हैं लेकिन व्यक्ति की अपनी सीमाएं होती है। कमलेश अग्रवाल अपने सामर्थ के हिसाब से केन्द्रीय जेल जबलपुर के बंदियों को रिहा कराने में अपना योगदान देतें हैं। ये बंदी जबलपुर के कम बाहरी जिलों के ज्यादा होते है। उनकी रिहाई से कमलेश को राजनैतिक लाभ तो नहीं मिलता है लेकन मन में किसी को आजादी दिलाने का जो सकून महसूस करते हैं उसे वे अनमोल मानते है। कमलेश अग्रवाल की अपेक्षा है कि और शहर ही नहीं प्रदेश के भी और लोग इस तरह के कार्य के लिए आगे आए, जिससे धन के कारण कोई बेवजह एक दिन की भी सजा न काटे।
4 सौ से अधिक को रिहा कराया
श्री अग्रवाल ने अब तक 400 से अर्थिक बंदियों को रिहा करा चुके हैं। स्वयं एवं परिवार के सहयोग से करीब 4 लाख रूपए का अर्थदण्ड इन बंदियों के बदले भर चुके है। बंदियों को रिहा कराने के अतिरिक्त प्रतिवर्ष वे एक रक्तदान शिविर करते है जिसमें दो से तीन सौ लोग रक्तदान करते है। वे प्रतिवर्ष 31 दिसम्बर को वृद्धजनों के लिए भंडारे का आयोजन करते हैं। उन्होंने छात्र राजनीति से अपना राजनैतिक कैरियर शुरू किया। 45 वर्षीय श्री अग्रवाल 20 साल से सक्रिय राजनीति में है तथा दूसरी बार मेयर इन काउंसिल सदस्य नगर निगम में बने है। इसके अतिरिक्त भाजयुमों में विभिन्न पदों में रह चुके हैं।
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