Wednesday, 30 September 2015

सिहोदा की बदली तस्वीर


 जबलपुर। आजादी के प्रणेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जानते थे भारत की आत्मा गांवों में वास करती है। उन्होंने भारतीय गांवों की जो स्वदेशी कल्पना की थी, उनकी कल्पना के विपरीत आजादी के बाद गांव विकसित हुए। यूं कहा जाए कि गांव शहर बनने की होड़ पर दौडने लगे और शहरी बुराइयां गावों में घर कर गई। शराब और नशा खोरी, जुआ-सट्टा, आर्थिक अपराध ,धोखाधड़ी और चोरियां सब कुछ गांवों में होने लगे  लेकिन जबलपुर के भेड़ाघाट क्षेत्रांतर्गत सिहोरा ग्राम के लोगों अब बापू के सपने को साकार कर रहे है।
 करीब 3 हजार की आबादी वाले इस गांव के लोगों ने शराब का सेवन बंद कर दिया है। सट्आ और जुआ खेलना बंद कर दिया गया है। गांव को लगभग अपराध मुक्त बनाया गया है लेकिन यह पुलिसिया डंडे के जोर पर नहीं बल्कि  स्वप्रेरणा से हो रहा है। गांव की महिलाओं ने इसकी शुरूआत की।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आव्हान किया है कि प्रत्येक सांसद एक गांव को गोद  ले और उसे एक आदर्श गांव बनाए। इसी नक्शेकदम में चलते हुए  जबलपुर पुलिस ने भेड़ाघाट के सिहोदा गांव को गोद लिया।इस गांव को शराब एवं मादक पदार्थों की लत से मुक्त बनाने के लिए दर्जनों सभाएं की।लोगों  के  घर घर पुलिस  पहुंची। ग्रामीणों ने भी रूचि ली और एक दूसरे को प्रेरित करते  चले गए। पिछले जनवरी माह से सतत प्रयास चलते रहे और करीब 8 माह में गांव की तस्वीर बदल गई है।
महिलाओं ने ली रूचि
भेड़ाघाट टीआई एमडी नगौतिया बताते हैं कि पर्यटन स्थल भेड़ाघाट के निकट इस गांव में शहरी लोगों की दखल थी। गांव में अवैध शराब की खूब बिक्री होती थी। गांव के गरीब परिवार के पुरूष नशे के आदी हो रहे थे। घर के युवा के भी नशे की गिरफ्त में जा रहे थे। पुरूषों की कमाई का बड़ा हिस्सा नशा खोरी मेंं जा रहा था। ऐसे में गांव की महिलाएं एकत्र होकर पुलिस के पास पहुंची और अपने मर्दो के लिए कुछ करने की अपील की। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, वर्तमान में एसपी ग्वालिर हरिनारायण चारी मिश्र ने विशेष रूचि दिखाई और भेड़ाघाट थाने को गांव गोद लााो के निर्देश दिए।
सुखदुख में भागीदार बनी
पुलिस ने गांव के लोगों के सुखदुख में भागीदार बन बनी, विभिन्न एनजीओ तथा अन्य संस्थाओं की मदद से ग्रामीणों को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें रोजगारोन्मुखी किया गया।महिलाओं को सिलाई मशीने दी गई और पेटीकोट, ब्लाउज आदि सिलने लगे। पुरूषों को सायकिल दी गई और वे फेरी लगाकर उन्हें बेंचने लगे। इसी तरह चटाई बुनाई, झाडू बनाने आदि के प्रशिक्षण दिए। इससे गांव के लोगों स्थिति में सुधार आया और गांव में आवारगर्दी युवाओं में बंद हुई। अपराध भी घट गए।
स्वच्छता का महत्व जाना
गांव के लोगों के बार बार बीमार पड़ने, कैद दस्त जैसी बीमारी फैलने पर पुलिस के सहयोग से नियमित स्वास्थ्य कैम्प के आयोजन हुए। चिकित्सकों एवं  वालेंटियर्स ने स्वच्छता के महत्व को समझाया। गांव के लोग अब अपने गांव को स्वच्छ रखने लगे है।
पंचायतों में होते है निर्णय
इस ग्राम के लोग छुटपुट झगड़े एवं विवाद पर पुलिस थाने और कोर्ट कचहरी में जाने बजाए अपने विवाद चौपाल में सुलझाने लगे है। झगड़ों में पुलिस की प्रेरणा पर राजीनामा हो रहे है जिससे लगभग अपराध मुक्त हो गया है सिहोदा।

 सिहोदा गांव पुलिस के प्रयास से नशा मुक्त गांव बना है। यह आदर्श गांव बनने जा रहा है। इसके लिए लगातार गांव की मानीटरिंग अब भी चल रही है।
संजय साहू,
एएसपी ग्रामीण जबलपुर

ऐसे बची रागनी की जान


करीब विगत माह रागनी जैन (काल्पनिक नाम)  आत्महत्या करने घर से निकली और इस दौरान उसने अपने पति को मोबाइल पर सूचना थी कि मै मरने जा रही हूं। महिला काफी अवसाद में थी यह बात उसने पति भी जानते थे। इस दौरान वे कटनी में थे। संयोग से उन्हें संजीवनी हैल्प लाइन का ध्यान आया और तत्काल ही उन्होंने मोबाइल किया। हैल्पाइन से सूचना तत्कालीन एसएसपी ईशा पंत को दी गई। उन्होंने मदन महल पुलिस को महिला को तलाश कर उसे बचाने निर्देश दिए। आधे घंटे के भीतर रागनी को खोज निकाला गया और उसकी जान बचा ली गई।
तिलवार से छलांग लगाई
 छात्रा अनिता (काल्पनिक नाम) का अपने बॉय फ्रेड से विवाद हो गया और वह गुस्से में तिलवारा पुल से छलांग लगाने के लिए निकल गई। इस बीच उसने अपने परिचित को मोबाइल कर आत्महत्या करने करने जाने की जानकारी दी। उसने तत्काल पुलिस एवं हैल्प लाइन में सूचना दी। तिलवारा पुल पर पुलिस ने नाविकों को संजीवनी अभियान में जोड़ रखा है और युवती तिलवारा पुल से छलांग लगाने पर तत्काल ही उसे नदी से निकाल लिया गया  और मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां जान बच गई।
राजू को घर भेजा गया
तिलवारा पुल से कूद कर खुदकुशी करने राजू नामक ग्रामीण युवक पहुंचा था लेकिन वहां उसकी मनोदशा देखकर ड्यूटी में तैनात पुलिस वाले ने रोक कर पूछताछ की तथा उसे समझाइश दी जिससे उसने आत्महत्या का इरादा टाल दिया। इस तरह से करीब डेढ़ दर्जन लोगो की जाने संजीवनी हैल्प लाइन द्वारा बचाई जा चुकी है।
देश में अब्बल था शहर
तत्कालीन पुलिस अधीक्षक हरिनारायण चारी मिश्रा जो वर्तमान में ग्वालियर पुलिस अधीक्षक है का कहना है कि जबलपुर शहर में जनसंख्या के तुलनात्मक आत्महत्या की दर प्रदेश ही नहीं देश में नम्बर वन पर रही है। लगातार 5 साल आत्महत्या में नम्बर वन पर रहा है। संजीवनी अभियान के तहत लोगों में जागरूकता लाने सेमीनार आदि किए गए। सुसाइडल पाइंटों में बोर्ड आदि लगाए गए। वालेंटियर तैनात किए गए जिससे आत्महत्या की घटनाएं रूकी और प्रदेश में तीसरे स्थान पर 2014 को पहुंच गया था, यहां संजीवनी अभियान चलने की जरूरत हैे।जबलपुर में  वर्ष ं2012 में 572 लोगों ने आत्महत्या की।2013  में 577 लोगों ने खुदकुशी की जबकि 2014 में 470  मामले ही हुए है।
वर्जन
संजीवनी हैल्प लाइन को और गति प्रदान की जाएगी। सभी थानों को निर्देश है कि आत्महत्या संबंधी सूचना मिलने पर तत्काल कार्रवाई कर बचाव के प्रयास करें.
जीपी पराशर
एएसपी जबलपुर
आत्महत्याओं के मामले
वर्ष 2012
भोपाल -377
इंदौर -476
जबलपुर -572
ग्वालियर
जबलपुर -572
ग्वालियर - 287
वर्ष 2013
भोपाल - 560
इंदौर - 698
जबलपुर - 577
ग्वालियर - 299
वर्ष 2014

करोड़ों साल पुरानी पहाड़ियों का कत्लेआम



हाईकोर्ट के निदेर्शों की उड़ाई जा रही धज्जियां
जबलपुर। जबलपुर के पर्यावरण एवं प्राकृतिक धरोहर यहां की ग्रेनाइट निर्मित पहाड़ियां है जिसकी श्रंखला तिलवारा के निकट से रांझी तक फैली है। वहीं घमापुर से होकर महाराजपुर तक ग्रेनाइट की पहाड़ियां है। इसके संरक्षण के हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद पहाड़ियों का कत्लेआम हो रहा है।
 ग्रेनाइट रॉक्स एवं पहाड़ियों के संरक्षण के लिए हाईकोर्ट ने अलग-अलग जनहित याचिकाओं में आदेश दे चुके है लेकिन इसके बावजूद  अब भी खजिन विभाग पहाड़ियों को तोड़ने अनुमति दे रहा है। पहाड़ियों का कत्लेआम खनिज के लिए  नहीं वरन प्लाटिंग के लिए हो रहा है। इतना ही नहीं इसके बदले विभाग को कोई रॉयल्टी नहीं मिल रही है।  पहाड़ी को मिटाकर वहां आवासीय भूखंड तैयार किए जाने का खेल चल रहा है।
 हाल ही में एक मामला प्रकाश में है, जिसके तहत रांझी में बजरंग नगर से लगी करीब 5 एकड़ से अधिक निजी भूखंड जिसमें ग्रेनाइट की रॉक्ट प्रचुरता में मौजूद है। यह मदन महल से लेकर रांझी तक फैली पहाड़ी की श्रंखला का हिस्सा है। इस पर पिछले तीन साल से लगातर तोड़ाई का काम चल रहा है।
अचंभा का विषय यह है कि पहाड़ी को तोड़ने के लिए हैदराबाद से बड़े बड़े कटर मंगाए गए है। जेसीबी मशीन एवं हिटाची मशीन में अन्य मशीने फिट कर पहाड़ी और चट्टाने तोड़ी जा रही है। करीब एक साल से  यहां पहाड़ी तोड़े जाने का काम चलता रहा।
शिकायतों के बाद रोक
यहां पहाड़ी अवैध तौर से तोड़े जाने की शिकायत के बाद रोक लगाई गई तो भू स्वामी बिल्डर मेसर्स महाराजपुर को खनिज उत्खनन की अनुमति रॉयल्टी की शर्त पर दी गई। निरीक्षण में छेनी हथौड़ी का उपयोग किया जाना बताया गया। इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की गई। इसी बीच बिल्डर्स ने फिर खनन अवधि बढ़ाने मांग की तो क्षेत्रीय लोगों के विरोध में उस पर रोक लगा दी गई।

* अब भी तोड़ी जा रही पहाड़ी
इस मामले को लेकर खनिज विभाग में शिकायकर्ता े चंद्रिका प्रसाद सोनकर ने बताया कि खजिन विभाग की रोक के बावजूद सांठगांठ कर पहाड़ी तोड़ा  जाना जारी है। इस पहाड़ी के संरक्षण के लिए प्रशासन को भूमि अधिगृहण कर लेना चाहिए।
बिकने को तैयार है
इसी तरह बाजनामढ रोड पुरवा पर करीब 11 एकड़ की ग्रेनाइट पहाड़ी को भू स्वामी बिल्डरों के हाथों बेचने प्रयास रत है। इस पहाड़ी को तोड़ने एवं समतलीकरण के लिए खनिज विभाग से दो दफे अनुमति मिल गई है लेकिन संयोग से पहाड़ी बची हुई है लेकिन फिर भी धीरे धीरे कर अवैध तरीके से पहाड़ी का करीब डेढ़ दो एकड़ हिस्सा नष्ट किया जा चुका है।

*कई पहाड़ी नेस्तनाबूत
मदन महल क्षेत्र में शिमला हिल्स पहाड़ी जो निजी भूमि रही है, इसको तोड़कर समतल बनाकर लगभग खत्म की जा चुकी है। वहीं एक पहाड़ी को तोड़कर निजी इंजीनियरिंग कालेज तैयार किया गया है।  शारदा मंदिर के निकट दानबाबा पहाड़ी कत्लेआम जारी है। बेदीनगर से लगी पहाड़ी अब भी तोड़ी जा रही है।
*कोई नियम कानून नहीं
दरअसल राजस्व रिकार्ड में हुए अनेक मालगुजारी पहाड़िया निजी हाथों में आ गई और इसके बाद भू माफिया एकएक कर पहाड़ी का कत्ल करता जा रहा है और जबलपुर के पर्यावरण से जबदस्त तरीके से खिलवाड़ किया जा रहा है। जबकि ये पहाड़ियां जबलपुर की स्वास नलिका की तरह है जहां से पूर्वाई एवं पछुआ हवाओं के शहर में बहने की दिशा तय होती है और शहर को स्वच्छ हवाएं मिलती है।

 * बिना अनुमति के पहाड़ी की एक चट्टान भी नहीं तोड़ने दी जाएगी। नियम विरूद्ध बिना अनुमति के पहाड़ियों में तोड़फोड़ करने पर कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल किसी भी पहाड़ी को तोड़ने अनुमति नहीं दी गई है।
एसएन रूपला
कलेक्टर जबलपुर

राजवर्धन महेश्वरी

 राजवर्धन महेश्वरी  
जिले के बेहतरीन अधिकारियों में शुमार श्री महेश्वरी लम्बे समय तक जबलपुर लोकायुक्त में पदस्थ रहे तथा यहां जेडीए के बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया जिसमें बिल्डर्स, राजनेता तथा कई अधिकारी आरोपी बनाए गए। श्री महेश्वरी का मानना है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका पुलिस और प्रशासन की ही होती होगी  चंूकि उन्हें शासन से अधिकार मिले है। श्री महेश्वरी से पीपुल्स संवाददाता दीपक परोहा की बातचीत के अंश।
प्रश्न- पुलिस कंट्रोल रूम, लोकायुक्त, डीएसपी क्राइम में लम्बे समय तक पदस्थ रहें हैं, ये पुलिस विभाग में लूप लाइन माने जाते हैं, कंट्रोल रूम में पुलिस कर्मी क्यों नहीं जाना चाहता है?
जवाब- पुलिस कंट्रोल रूम की वर्किग और जिला पुलिस की वर्किग में अंतर होता है। पुलिस कंट्रोल रूम दरअसल संवाद एवं सूचाएं एकत्रित होते है और यहां पुलिस का बल पर नियंत्रण रखा जाता है। यहां भले ही बैठकर काम करना पड़ता है लेकिन बेहद जिम्मेदारी वाला काम होता है यहां गलती की कोई संभहोता है यहां गलती की कोई संभावना नहीं होनी चाहिए। मुझे समय पूर्व पदोन्नति कंट्रोल रूम प्रभारी रहते हुए मिली थी। कंट्रोल रूम की भूमिका के कारण ही सन 1997 में सदर में हुए मदान हत्याकांड का पर्दाफाश हुआ। हर पुलिस वाले को कंट्रोल रूम में काम करने का अनुभव होना चाहिए जिससे वह कम्युनिकेशन के महत्व को भली भांति समझ सकता है। बिना कम्युनिकेशन के फोर्स अंधे हाथी की तरह होती है।
प्रश्न- लोकायुक्त और पुलिस की वर्किग में बेहतर कौन सी है?
जबाव- लोकायुक्त भ्रष्टाचार संबंधी प्रकरणों की जांच पड़ताल करता है। इसके लिए सिर्फ एक ही तरह का काम होता है। लोकायुक्त में लम्बी विवेचना चलती है। यहां पदस्थ अधिकारी को भी फील्ड में काम करना पड़ा है लेकिन इसका क्षेत्र पुलिस की वर्किग से अलग होता है। पुलिस को विभिन्न अपराधों की विवेचना के साथ कानून व्यवस्था देखना पड़ता है। दरअसल आम जनता से पुलिस सीधे जुड़ी होती है इसलिए पुलिस की वर्किग ज्यादा रूचिकर लगती है।
प्रश्न- क्राइम ब्रांच में क्या सुधार होना चाहिए?
जवाब- जबलपुर में क्राइम ब्रांच मेंस्टॉफ की कमी हैं, वाहन तथा अन्य संसाधन कम है लेकिन क्राइम ब्रांच की उपयोगिता को महसूस करते हुए शासन बल के साथ संसाधन भी स्वीकृत किए गए है। 

राजवर्धन महेश्वरी

 राजवर्धन महेश्वरी  
जिले के बेहतरीन अधिकारियों में शुमार श्री महेश्वरी लम्बे समय तक जबलपुर लोकायुक्त में पदस्थ रहे तथा यहां जेडीए के बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया जिसमें बिल्डर्स, राजनेता तथा कई अधिकारी आरोपी बनाए गए। श्री महेश्वरी का मानना है कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका पुलिस और प्रशासन की ही होती होगी  चंूकि उन्हें शासन से अधिकार मिले है। श्री महेश्वरी से पीपुल्स संवाददाता दीपक परोहा की बातचीत के अंश।
प्रश्न- पुलिस कंट्रोल रूम, लोकायुक्त, डीएसपी क्राइम में लम्बे समय तक पदस्थ रहें हैं, ये पुलिस विभाग में लूप लाइन माने जाते हैं, कंट्रोल रूम में पुलिस कर्मी क्यों नहीं जाना चाहता है?
जवाब- पुलिस कंट्रोल रूम की वर्किग और जिला पुलिस की वर्किग में अंतर होता है। पुलिस कंट्रोल रूम दरअसल संवाद एवं सूचाएं एकत्रित होते है और यहां पुलिस का बल पर नियंत्रण रखा जाता है। यहां भले ही बैठकर काम करना पड़ता है लेकिन बेहद जिम्मेदारी वाला काम होता है यहां गलती की कोई संभहोता है यहां गलती की कोई संभावना नहीं होनी चाहिए। मुझे समय पूर्व पदोन्नति कंट्रोल रूम प्रभारी रहते हुए मिली थी। कंट्रोल रूम की भूमिका के कारण ही सन 1997 में सदर में हुए मदान हत्याकांड का पर्दाफाश हुआ। हर पुलिस वाले को कंट्रोल रूम में काम करने का अनुभव होना चाहिए जिससे वह कम्युनिकेशन के महत्व को भली भांति समझ सकता है। बिना कम्युनिकेशन के फोर्स अंधे हाथी की तरह होती है।
प्रश्न- लोकायुक्त और पुलिस की वर्किग में बेहतर कौन सी है?
जबाव- लोकायुक्त भ्रष्टाचार संबंधी प्रकरणों की जांच पड़ताल करता है। इसके लिए सिर्फ एक ही तरह का काम होता है। लोकायुक्त में लम्बी विवेचना चलती है। यहां पदस्थ अधिकारी को भी फील्ड में काम करना पड़ा है लेकिन इसका क्षेत्र पुलिस की वर्किग से अलग होता है। पुलिस को विभिन्न अपराधों की विवेचना के साथ कानून व्यवस्था देखना पड़ता है। दरअसल आम जनता से पुलिस सीधे जुड़ी होती है इसलिए पुलिस की वर्किग ज्यादा रूचिकर लगती है।
प्रश्न- क्राइम ब्रांच में क्या सुधार होना चाहिए?
जवाब- जबलपुर में क्राइम ब्रांच मेंस्टॉफ की कमी हैं, वाहन तथा अन्य संसाधन कम है लेकिन क्राइम ब्रांच की उपयोगिता को महसूस करते हुए शासन बल के साथ संसाधन भी स्वीकृत किए गए है। 

आंकड़े बने गवाह , पुरूष समाज में भ्रांतियां व्याप्त




 जबलपुर। बढ़ते हुए जनसंख्या दबाव के कारण संसाधनों का बोझ बढ़ा है, ऐसे में परिवार नियोजन७ठŽ७ठज़् @ज्ज् कार्यक्रम की महत्व को दुनिया स्वीकार कर रही है लेकिन आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि इस कार्यक्रम को पुरूषवर्ग ने लगभग नकार दिया है। मध्य प्रदेश में जो शासकीय आंकड़े परिवार नियोजन में आए है, वह महिलाओं की बदौलत आए है। जबलपुर में  महिला नसबंदी करा रही है लेकिन महिलाओं की नशबंदी की तुलना में प बदौलत आए है। महिला नसबंदी करा रही है लेकिन महिलाओं की नशबंदी की तुलना में पुरूष नसबंदी का प्रतिशत 10 प्रतिशत भी कम है।
परिवार नियोजन कार्यक्रम के संचालन में पुरूषों में व्याप्त भ्रांतियां तोड़ने में हैल्थ वर्क स एवं आफिसर लग भग फेल हो गए है।  नशबंदी कराने को पुरूष अपने पौरूषत्व पर प्रहार मानता है।जिन पुरूषों ने नशबंदी कराई भी है तो वे भी अपने यार दोस्तों के साथ गर्व से नहीं कह पाते हैं कि उन्होंने नसबंदी कराई है।
एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक इस महिलाएं काफी आगे है। वे अपनी एटीटी आॅपरेशन होने से बताने में हिचक नहीं महसूस करती है और नही उन्हें इसमें संकोच रहता है। इतना ही नहीं विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ लेने के लिए महिलाएं नसबंदी कराने में आगे है।
जबलपुर में हुए नशबंदी के आंकड़ों को देखा जाए तो यहां यहां पिछले 5 साल में 91 हजार परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत आॅपरेशन हुए है। ये आपरेशन करने वालों में 89 हजार महिलाएं है।
 यही हाल हर जगह
जानकारों की माने तो मध्य प्रदेश ही नहीं देश के हर राज्य में यही हालत है। पुरूष नशबंदी का मध्यप्रदेश में 5 प्रतिशत से भी कम हो रही है। परिवार

नियोजन कार्यक्रम सिर्फ ट्यूबेक्टमी से चल रहा है जबकि बसेक्टमी(पुरूष नसबंदी) न के बराबर हो रहे हैं।
वर्जन
परिवार नियोजन कार्यक्रम में पुरूषों की भागीदारी न के बराबर है। पुरूष य् बराबर है। पुरूष यदि परिवार नियोजन के लिए आॅपरेशन कराता है तो किसी तरह की कोई परेशानी वाली बात नहीं होती है।
डॉ- विनोद कुमार
 कार्यक्रम अधिकारी
जिले में तुलनात्मक स्थिति
वर्ष पुरूष महिला कुल
2011- 5222 -22010 - 22532
2012 719 -23864 24583
2013 241 -13711 13952
2014 241 15048 1590
जारी वर्ष  175 14459 14634

पर्यावरण मंत्रालय की एनओसी मिलेगी एसएफआरआई की रिपोर्ट पर



जबलपुर। प्रदेश एवं देश में यदि कोई बड़ी परियोजना शुरू होना है ,चाहे बांध निर्माण हो , बड़ी सड़क निर्माण, बहु मंजिला इमारत, खदान तथा अन्य कोई प्रोजेक्ट हो जिसमें पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी आवश्यक है तो अब मंत्रालय राज्य वन अनुसंधान केन्द्र (एसएफआरआई) की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर देगा। दरअसल अब तक प्रदेश की कोई भी सरकारी संस्था ऐसी नहीं थी जिसको क् वालिटी कंट्रोल आॅफ इंडिया ने अधिकृत किया हो। इसके साथ ही प्रदेश सहित देश में हजारों संस्थाएं एवं व्यक्ति  व वैज्ञानिक थे जो रिपार्ट तैयार करते थे लेकिन नई नीति के तहत क्वालिटी कंट्रोल आॅफ इंडिया द्वारा ही अनुकृत संस्थाओं की रिपोर्ट अब विचारण योग्य समझी जाएगी।
 जानकारी के अनुसार देश में एसएफआरआई की तरह अन्य संस्थाएं भी है जिन्हें क्यूसीआई ने मान्यता दे रखी है। राज्य वन अनुसंधान केन्द्र ने भी क्यूसीआई के समझ मान्यता प्रदान करने आवेदन कर रखा था। क्सूसीआई की टीम ने पिछले दिनों अनुसंधान का दौरा किया। यहां के वैज्ञानिकों से रूबरू हुए। उनके बातचीत की। रिचर्स संबंधी साजो सामान एवं अन्य तमाम तरह की बिन्दुओं की गंभीरता से पड़ताल की।
गुरूवार को मिला मान्यता
राज्य वन अनुसंधान केन्द्र के डायरेक्टर डॉ. जी कृष्ण मूर्ति ने बताया कि क्यू सीआई से गुरूवार को मान्यता संबंधी आदेश प्राप्त हुए है। इस आदेश से संस्था में काफी उत्साह है। क्यूसीआई ने संस्था के चार वैज्ञानिकों को भी मान्यता प्रदान की है। जिसमें डॉ. आर के पांडे, डॉ प्रतिभा भटनागर, डॉ. अंजना राजपूत तथा डॉ अमित पांडे को अधिकृत किया है।
क्या होगा फायदा
मध्य प्रदेश शासन तथा उससे संबंधी विभाग कोई बड़ी योजना और प्रोजेक्ट
प्रारंभ प्रारंभ करते थे तो उन्हें पर्यावरण मंत्रालय के समझ पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव एवं उससे बचाव के उपाय संबंधी प्रोजेक्ट रिपोर्ट प्रायवेट कं सल्टेंट से तैयार करवानी पड़ती थी जिसमें करोड़ों का भुगतान करना पड़ता था लेकिन अब स्वयं शासकीय संस्था को मान्यता मिल गई है जिसका फायदा सरकार को होगा। इतना ही नहीं राज्य वन अनुसंधान संस्था को निजी एवं शासकीय क्षेत्र अपनी प्रोजैक्ट रिपोर्ट तैयार करने देश भर में कहीं के लिए अनुबंधित कर सकते है। इससे संस्था के वैज्ञानिक प्रदेश ही नहीं पूरे देश में कहीं भी प्रोजेक्ट तैयार करने का काम कर सकते हैं।
गाइड लाइन तय है
पर्यावरण मंत्रालय परियोजना के संबंध में जो प्रोजेक्ट मांगती है उसके गाइड लाइन तय है। सड़क निर्माण, रेल लाइन निर्माण, ब्रिज निर्माण, बांध निर्माण, खनन कार्य तथा बड़ी आवासीय कालोनी, नदी के किनारे नगर विकास संबंधी तमाम तरह के कार्य के लिए जीवन जन्तु, वनस्पिति, पर्यावरण, मानव, प्रदूषण की स्थित सहित अन्य बिन्दुओं पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव तथा प्रतिकूल प्रभाव से निपटने संबंधी योजना की जानकारी मांगती है। इसके अतिरिक्त प्रोजेक्ट से संतुष्ट न होने पर आवश्यक अन्य बिन्दुओं पर जानकारी मांग सकती है। इस प्रोजेक्ट को तैयार करने में ही काफी समय लगता है लेकिन गाइड लाइन के तहत पर्यावरण संबंधी प्रोजेक्ट रिपोर्ट राज्य वन अनुसंधान संस्था को एक वर्ष के भीतर करना पड़ेगा।
 कैसे करेगा काम
पर्यावरण संबंधी प्रोजेक्ट राज्य वन अनुसंधान संस्था कैसे तैयार करेगा? इस सबंध में बताया गया कि  उपलब्ध वैज्ञानिक एवं संसाधन का इस्तेमाल तो किया जाएगा लेकिन जररूत पड़ने पर क्यूसीआई द्वारा मान्य वैज्ञानिक को हम अनुबंधित कर सकते है। फिलहाल जिस संस्था के लिए हम प्रोजेक्ट पर काम करेंगे उनको वैज्ञानिकों एवं लगने वाले कर्मचारी, वाहन एवं अन्य संसाधन का खर्चे का भुगतान करना पड़ेगा। कुल खर्च का 15 प्रतिशत संस्था के विकास के लिए लिया जाएगा।
वर्जन
राज्य वन अनुसंधान को मान्यता मिलने से यहां उपलब्ध मानस संसाधन का लाभ उठाया जाएगा तथा संस्था को काम की कोई कमी नहीं रहेगी।
डॉ. जी कृष्ण मूर्ति
डायरेक्टर एसएफआरआई
न अनुसंधान केन्द्र 

बंदी के फरार होने से बंदियों की बढ़ी मुसीबत



जबलपुर।  केन्द्रीय जेल के दो बंदियों  के कारण प्रदेश भर के जेले के हजारों बंदियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनकी पैरोल पर जाना आसान नहीं रह गया है।  दरअसल पैरोल पर छोड़े गए केन्द्रीय जेल जबलपुर का एक बंदी छूटने के बाद से फरार है। केद्रीय जेल जबलपुर से पैरोल पर छूटे दो बंदी फरार थे जिसमें से एक तो कुछ दिनों बाद लौट आया जबकि दूसरा बंदी आज तक नहंी लौटा है।
  जेल सूत्रों के मुताबिक लम्बी सजा काट रहे बंदियों को साल भर में करीब 48 दिन की छुट्टी मिलती है। वर्ष में एक  बार बंदी अपनी छुट्टी लेकर कुछ दिन अपने घर में बिता सकते है। पहली पैरोल बंदी को जिला दण्डाधिकारी देता है यदि बंदी जबलपुर जेल का है तो उसको पैरोल की अनुमति अन्य जिले के डीएम द्वारा प्रदान की जाती है। जेल पैरोल का प्रकरण बनाकर डीएम के पास भेजता है। डीएम तत्सबंध में बंदी की गोपनीय चारित्रिक जानकारी संबंधि पुलिस स्टेशन से बुलवाता है जिसके अधार पर पैरोल की मंजूरी ही जाती है। यदि बंदी को डीमए पैरोल मंजूर नहीं करता है तो डीजीपी जेल के पास अपील का अधिकार होता है। जबलपुर जेल के दो बंदी के भागने के कारण इन दिनों केन्द्रीय जेल जबलपुर में बंदियों को पैरोल पर जाने कड़ी पड़ताल का सामना करना पड़ रहा है।
बंदियों को मिल रहा पैरोल
पैरोल में घर जाकर फरार होने वाले बंदियों के मामले बेहद कम है जिसके  कारण शासन  फिलन  पैरोल पर भेज रही है। यूं भी उन्हीं बंदियों को पैरोल पर छोड़ा जाता है जिनके भागने की संभावना शून्य होती है। जेल मुख्यालय भोपाल के मुताबिक इस वर्ष पैरोल पर छूटे बंदियों में से दो बंदी ही फरार हुए है।
बंदी फरार होने से सख्ती
प्रशासन भी बंदियों को पैरोल में छोड़ने के मामले में बेहद सख्त जांच पड़ताल करवा रहा है चूंकि जबलपुर केन्द्रीय जेल से  दो बंदी के भागने के बाद पूरा जेल प्रशासन एवं शासन सजग हो गया है। जेल सूत्रों पैरोल पर भेजे जाने के मामले में सख्ती बढ़ी हुई है जिसके चलते अनेक  बंदी पैरोल से वंचति है फिर भी प्रतिवर्ष प्रदेश भर से हजारों बंदी पैरोल पर छोड़े जा रहे है।

जमानत दार पर कार्रवाई
केन्द्रीय जेल जबलपुर के अधीक्षक अखिलेश तोमर ने बताया कि पैरोल पर छूटे दो बंदियों के लौट कर नहीं आने पर पुलिस थाने में एफआई दर्ज कराई गई है।  जबलपुर से फरार  दो बंदियों में एक बंदी लौट आया जबकि हत्या का फरार आरोपी शमीम उर्फ शानू को गत 18 जनवरी को पैरोल पर छोड़ा गया था जो अवधि पूरी होने के बाद नहीं लौटा है। पैरोल पर बंदी छोड़े जाने की प्रक्रिया में जमानदार भी रखा जाता है। यदि बंदी फरार होता है तो जमानतदार पर भी कार्रवाई की जाती है। वर्तमान में केन्द्रीय जेल जबलपुर को एक ही पैरोल से फरार बंदी की तलाश है।
वर्जन
प्रदेश भर में मात्र दो बंदी ही पैरोल पर छूटने के बाद इस वर्ष फरार हुए है जिसमें से एक केन्द्रीय जेल जबलपुर का है।
आरएस विजयवर्गीस
डीआईजी जेल
मध्यप्रदेश
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लकड़ी की बनाई बीएमडब्ल्यू बाइक



बुद्धसेन को कलाकृतियां तैयार करने का हैजुनून
नरेन्द्र मोदी को करेंगे भेंट
 जबलपुर। रीवा के बैकुण्ठपुर निवासी 50 वर्षीय बुद्धसेन विश्वकर्मा को लकड़ी की कलाकृति बनाने का जुनून हैं। इन कलाकृति का क्या होगा, कौन खरीदेगा, इसकी लागत कितनी आएगी? वे यह भी नहीं सोचते, मन में  विचार आया और बनाने जुट जाते है। इस कलाकार में सिर्फ कला का जुनून हैं। उसका अपना काम लकड़ी के फर्नीचर बनाना है किन्तु अदना सी दुकान भी नसीब नहीं है।  फेरी लगाकर फर्नीचर का काम कर अपने पूरे परिवार की परवरिस कर रहा है। उसके  बच्च्चे स्कू ल -कालेज में पढ़ रहे है। अपने काम से समय निकाल कर कला की सेवा करते हैं।
कलाकार बÞुद्धसेन ने हफ्तेभर पहले लकड़ी की बनी बीएमडब्ल्यू मोटर बाइक तैयार की है। ये इतनी खूबसूरत और जीवंत लगती है कि ऐसा लगता है पेट्रोल डालो और इसमें बैठकर हवा में बाते करों किन्तु सावधान ये बाइक सड़कों पर दौड़ने के लिए नहीं बनाई गई है। यह तो शो मॉडल है और कलाकृति का बेजोड़ नमूना है। यह बीएमडब्ल्यू या अन्य किसी  बड़े शो रूम को बेंचने अथवा वहां की  शोभा बढ़ाने के लिए नहीं बनाई गई है। बुद्धसेन की ख्वाइश है कि वह इस बाइक को प्रभानमंत्री नरेन्द्र मोदी को  गिफ्ट करें। वे कभी भी अपनी बाइक लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भेंट करने दिल्ली कूच कर सकते है।
सब कुछ लकड़ी का
मोटर सायकिल का हैंडल, पेट्रोल टैंक, इंजन, टायर , मडगार्ड ,चके , सायलेंस सहित तमाम पार्ट सिर्फ लकड़ी से बनाए गए है जिससे बाइक को तैयार करने में करीब ढाई महीने का समय और कठिन परिश्रम लगा है, और अब यह तैयार हो चुकी है। आसपास से लोग इस बाइक को देखने बुद्धसेन के घर पहुंच रहे है और जो देखता है वह सराहना किए बिना नहीं रहता है।
नरेन्द्र मोदी को भेंट करूगा
ये बाइक मैने नरेन्द्र मोदी को गिफ्त करूंगा। मुझे किसी से मिलने के लिए मध्यस्थ की जरूरत नहीं पड़ती है मै सीधे उन तक पहुंच जाता हूं। चार साल पहले बिग  अभिताभ बच्चन को लकड़ी के गणेश जी भेंट किए थे। इसी तरह की लकड़ी कल कलाकृति मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्य मंत्री दिग्वजय सिंंह, कलेक्टर , एसपी और कई लोगों को भेंट कर चुका हूं। मेरे लकड़ी के मंदिर लोग बेहद पसंद करते है। रीवा सहित प्रदेश के कई शहरों में उनके बनाए मंदिर लोगों के घरों में है।
बुद्धसेन विश्वकर्मा
कलाकार 

शहर बारूद के ढेर में ...


  शहर बारूद के ढेर में ...
्र्र पेटलावद की घटना के बाद भी प्रशासन में नहीं दिखी चुस्ती
 जबलपुर। जिले में बारूद एवं पटाखे के लायसेंस को लेकर चलने वाली भर्राशाही के बीच प्रशासन ने पटाखा एवं बारूद के कारोबार करने वालों को छूट दे रखी है। शहर के व्यस्तम इलाकों में पटाखों के अब भी भंडारण किए गए है जबकि पेटलावद की घटना के बाद प्रशासन  ने कछियाना की कुछ दुकानों में दबिश देकर रस्म अदायगी की जबकि दर्जनों पटाखा व्यापारी ने व्यस्तम व्यवसायिक  एवं रहवासी इलाको में आतिशबाजी के  सामान का जखीरा लगा रखे है। पत्थरों की तुड़ाई एवं खदान में काम के लिए बारूद एकत्र कर खा गया है।

मालूम हो कि पिछले दिनों मुख्य मंत्री ने वीडियो कांफ्रेसिंग में तमाम बारूद के कारोबार करने वाले की सूची के साथ उनके यहां व्यवस्था संबंधी जांच पड़ताल करने सख्त निर्देश दिए थे। अनेक कलेक्टरों के पास इनकी व्यवस्थित सूची भी नहीं थी जिसके कारण उनकी खिंचाई भी की गई। जिला प्रशासन ने आूूॅनफानन लायसेंस शाखा से लायसेंस धारकों की सूची तैयार की है लेकिन उनके भंडारण की जांच पड़ताल करने अब तक कोई टीम नहीं निकली।
यहां है भारी बारूद
सूत्रों की माने तो गलगला में  ही करीब आधा दर्जन दुकानदारों ने अपने बाजार में ही गोदाम बना रखे है। दीवाली के समय तो यहां टनों से बारूद वाले पटाखे एकत्र होती है। यूं आतिशबाजी को लेकर वर्ष भी यहां भारी मात्रा में विस्फोटक रहता है। इसी तरह कछियाना , घोडा नक्कास, मिलौनीगंज, हनुमानताल ,  गढ़ा फाटक में भी करीब दो दर्जन दुकानों में पटाखे का भंडारण किया जाता है। कोतवाली में एक पटाखा गोदाम में आगजनी की घटना भी हो चुकी है लेकिन इसके बावजूद यहां भंडार अब भी हो रहा है।
माइनिंग कारोबारी हुए सतर्क
पेटलावद में हुई घटना के  बाद जबलपुर तथा पड़ोसी जिले कटनी के मानइनिंग का कारोबार करने वालों ने अपने बारूद के गोदाम व्यवसायिक एवं रहवासी क्षेत्र से  रातों रात हटा लिए है जबकि पटाखा का कारोबार करने वाले बेखौफ है चूंकि वे शस्त्र शाखा में हर महीना भेंट चढ़ाते है जिससे वे बेखौफ हैं।
वर्जन
बारूद संबंधी कारोबार करने वालों की सूची तैयार की गई है। एसडीएम तथा पुलिस अधिकारियों को वहां जांच पड़ताल करने के निर्देश दिए गए है। ब्लास्ट का कारोबार करने वालों के स्टॉक कर्मचारी आदि की जांच कराई जा रही है।
एस धनराजू
प्रभारी कलेक्टर
ये है कारोबारियों की संख्या
कारोबार   -   लायसेंस संख्या
स्टोनक्रेशर ब्लास्ट -  11
मार्बल माइंस - 5
आतिशबाजी निर्माता - 27
12 महीना पटाखा - 88
फुटकर पटाखा   1287 

प्रदेश के परेशान उपभोक्ताओं को राहत



* लोक सेवा गारंटी के दायरे में बिजली मीटर भी

जबलपुर। प्रदेश में बिजली के घरेलू उपभोक्ता अनाप शनाप बिल से परेशान हैं। उनकी मुख् य शिकायत होती है कि उनका मीटर खराब है और ज्यादा रीड़िग दे रहा है। विद्युत वितरण कंपनियों में शिकायत के बाद बमुश्किल टेस्टिंग के लिए बिजली कर्मचारी आते है और अधिकांश मामलों में ओके रिपोर्ट देकर इतिश्री कर लेते है लेकिन अब बिजली मीटर भी लोक सेवा गारंटी के दायरे में आता है। बिजली उपभोक्ता का शिकायत और यदि वह मीटर की टेस्टिंग एवं मरम्मत चाहता है तो बिजली कंपनी सेवा देने के लिए बाध्य है।
सूत्रों के अनुसार लोक सेवा गारंटी के तहत शहरी क्षेत्रों में मीटर की मरम्मत व टेस्टिंग 22 दिन के भीतर करनी पड़ेगी। वहंी ग्रामीण क्षेत्रों में दूर राज स्थित मीटर लगे होने के कारण वहां 37 दिनों में उनको सर्विस हर हालत में देनी होगी। अब उपभोक्तााओं को बिजली कार्यालय अथवा उपभोक्ता केन्द्र में जाने के बजाए सीधे लोक सेवा केन्द्र में अपनी शिकायत दर्ज करनी पड़ेगी। बिजली विभाग 22 दिनों में समस्या का निराकरण कर के देगा। सूत्रों की माने  तो प्रदेश भर में उपभोक्ता केन्द्रों में मीटर को लेकर ढाई से तीन लाख मीटर खराब होने की शिकायतें हैं।
नागरिक उपभोक्ता मार्ग दर्शक मंच के पीजी नाजपांडे ने बताया कि  शासन ने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के दायरे में बिजली मीटर सेवा की गारंटी को भी शामिल कर लिया है। इससे जहां बिजली मीटर सप्लाई कंपनी को भी अब विशेष पापड़ बेलना पड़ेगा। कंपनी पर बिजली वितरण कंपनी का विशेष दबाव पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व उच्च दाब एवं निम्न दाब बिजली कनेक्टशन भी लोकसेवा गारंटी  अधिनियम के दायरे में आ चुके   है। इस व्यवस्था के तहत अब बिजली उपभोक्तााओं को बिजली विभाग के बाबुओं एवं अधिकारियों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेगे। बिजली दफ्तरों में लोक सेवा केन्द्र के काउंटर में जाकर अपनी कम्पलेंट देनी होगी। लोकसेवा गारंटी के तहत यदि उपभोक्ता की समस्या का निराकारण निर्धारित समय सीमा पर नहीं होता है तो कंपनी के कार्यपालन यंत्री पर जुर्माना का प्रावधान है।
वर्जन
 लोक सेवा गांरंटी के दायरे में बिजली मीटर भी आए है। शहरी क्षेत्र के लिए  कंपनी को 22 दिन तथा ग्रामीण क्षेत्र के लिए 37 दिन की अवधि मिली है जिसमें उपभोक्ता की समस्या का निराकरण किया जाएगा।
आरके स्थापक
एसई सिटी जबलपुर वृत 

विलम्ब पक्षकार के साथ अन्याय: मणिन्द्र सिंह



 किसी प्रकरण के निराकरण के लिए  पक्षकार आता है और उसके निर्णय में विलम्ब करना पक्षकार के साथ अन्याय की तरह है। यह कहना है  गोहलपुर संभाग जबलपुर के कार्यपालन दण्डाधिकारी  एवं तहसीलदार मणिन्द्र सिंह का। श्री सिंह सन 1994 के राजस्व  अधिकारी है।  जबलपुर में पदस्थाना के पूर्व गोहशंगाबाद,कटनी तथा मंडला जिले में पदस्थ रह चुके है। उनका कार्य शैली की विशेषता है कि वे त्वरित और समय पर निर्णय लेते हैं। मणिन्द्र सिंह से पीपुल्स संवाददाता दीपक परोहा की बातचीत के अंश-
प्रश्न- बड़े जिले और छोटे जिलों में काम में क्या अंतर महसूस करतें है,आप?

जवाब-  मेरी पदस्थापना छोटे जिले में भी रही है ओर जबलपुर जैसे छोटे जिले में भी हुई है। बड़ी जगह पर मामले ज्यादा होते है तथा वर्क लोड ज्यादा रहता है। लॉ एण्ड आर्डर की समस्या भी ज्यादा उत्पन्न होती है जिससे फील्ड में जाना पड़ता है।
प्रश्न- शहर में काम की अधिकता रहती है जिससे मामले में लंबित रहते होंगे, ऐसे में  क्या करते हैं?
जवाब - मेरा प्रयास रहा है, उसी दिन का मामला उसी दिन निपटाया जाए  किन्तु कोर्ट के मामले की सुनवाई कोर्ट में ही करनी पड़ती है जिसके कारण  नामांतरण आदि के अनेक मामले लंबित हो गए है। इसके निपटाने के लिए प्रति शनिवार सुबह से लेकर शाम 5 बजे तक कोर्ट लगाई जा रही है जिसमें तमाम लंबित मामलों को निराकरण किया जा रहा है।
प्रश्न - क्या नया करना चाहते हैं ?
जवाब- जिला प्रशासन द्वारा नवाचार के तहत कई काम कर रही है , जिसमें मै अपना पूर्ण सहयोग कर रहा हूं।
 प्रश्न - एक अच्छे अधिकारी के क्या गुण होने चाहिए, और आप स्वयं को उस कसौटी में कसा महसूस करते हैं अथवा नहंी?
जवाब- एक अच्छे अधिकारी को पक्षकार की बात अच्छे से सुनने और समझने की जरूरत है। इसी तहर कोई पीड़ित यदि आता है तो उसको पूरे ध्यान से सुनने पर उसकी आधी समस्या का समाधान हो जाता है। अधिकारी को समस्या सुनने के बाद पूरी सूझबूझ से मामले में जल्द निर्णय लेते हुए उसका निराकरण करना चाहिए। अनुशासन एवं इमानदारी प्रशासनिक अधिकारी में होना चाहिए। इन गुणों को अपनी कार्यप्रणाली में उतारने मेरी हमेशा कोशिश रहती है।

दो दिन की बुखार में दम फूल गया था महिला का




स्वाइन फ्लू का समय पर इलाज कराया जाए तो यह जानलेवा बीमारी नहीं है। इससे बचाव के लिए  उपाय करना बेहद आवश्यक है। हॉल ही में मेरे पास स्वाइन फ्लू से पीड़ित तीन मरीज इलाज के लिए  जबलपुर हास्पिटल पहुंचे थे , तीनों की जिंदगी बच गई है। यहां पिछले सप्ताह ही  सदर निवासी 35 वर्षीय महिला नर्गिस (काल्पिनिक नाम )  को इलाज के लिए  लाया गया था जिसका दो दिन बुखार के कारण दम फूलने लगा था तथा सांस नहीं ले पा रही थी, उसे तत्काल अस्पताल में दाखिल किया गया तथा महिला पांच दिन वेंटिलेटर पर रही और स्वास्थ्य होने के बाद घर चली गई।

दीपक परोहा
9424514521
जबलपुर हॉस्टिल नेपियर टाउन के वरिष्ठ चिकित्सक दीपक बेहरानी एमडी, कार्डियोलाजिस्ट ने स्वाइन फ्लू के इलाज के संबंध में अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि पिछले सप्ताह जबलपुर हास्पिटल में स्वाइन फ्लू के तीन मामले आए और बेहद खुशी की बात है कि तीनों मरीज स्वस्थ्य होकर चले गए है। दरअसल स्वाइन फ्लू को लेकर लोगों में जबदस्त भ्रांति भी व्याप्त है कि बीमारी से मौत होना निश्चित है। किन्तु पिछले तीन सालों से जबलपुर हास्पिटल में स्वाइन फ्लू के मरीज आ रहे है जिसमें 5 में चार मरीजों की जान बचाई जा रही है। स्वाइन फ्लू वास्तव में बेहद खतरनाक बीमारी हो चुकी है। इसके वायरस एच1 एन1 बेहद शक्तिशाली हो चुके है। स्वाइन फ्लू पीड़ित मरीज के सम्पर्क में जैसे ही लोग आते है , उनको भी इंफैक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है।
मेरे पास हाल ही में सदर से 35 वर्षीय महिला को  लाया गया। उसको सांस लेने में भारी परेशानी हो रही थी। सांस नहीं ले पाने के कारण शरीर नीला पड़ रहा था। परिवार वालों ने बताया कि दो दिन से उसे तेज बुखार है और उल्टी भी हो रही है। इस लक्षण से मुझे यही संदेह हुआ कि महिला को कहीं स्वाइन फ्लू तो नहीं है? उसको आइसोलेशन कक्ष में भर्ती किया गया तथा वेंटीलेटर में रखकर कृत्रिम सांस दी जाने लगी। उसके एक्सरे कराया गया तो फेफड़ों में सूजन एवं इंफैक्शन नजर आया। फेफड़ों में पानी भी भरा हुआ था। तत्काल टेस्ट कराया गया तो स्वाइन फ्लू की पॉजेटिव रिपोर्ट आई । महिला को टेमीफ्लू तथा अन्य दवाइयों को डोज प्रारंभ किया गया। तीन दिन तक महिला की हालत बेहद गंभीर रही। करीब 5 दिन तक वेंटीलेटर में रही । इसके बाद उसे आक्सीजन पर रखा गया । करीब 7 दिन के इलाज  के बाद वह स्वस्थ्य होकर घर चली गई। इसी तरह जबलपुर हास्पिटल में दो अन्य  मरीज स्वस्थ्य होकर गए।
डॉक्टर टॉक
कोई जवान मरता है तो बेहद दुख होता है
स्वाइन फ्लू के मरीज प्रतिवर्ष बढ़ रहे है। इस वर्ष अभी तक तीन मामले आ चुके है जबकि पिछले वर्ष 5 मामले तथा उसके पूर्व वर्ष में 4 मामले जबलपुर हास्पिटल में आए थे। औसतन पांच में एक व्यक्ति की मौत हो रही है। किन्तु जब स्वाइन फ्लू से किसी बच्चे अथवा  जवान की मौत होती है , बेहद दुख होता है।
स्वाइन फ्लू  के लक्षण
 * स्वाइन फ्लू के लक्षण हैं सर्दी, जुकाम तथा बुखार आना।
* सूखी खांसी , शरीर में थकान तथा सांस फूलना।
बवाव के उपाय
* सर्दी जुकाम एवं खासी के मरीज  से दूरी बनाए रखे।
* सार्वजकिन स्थल पर मॉस्क का इस्तेमाल करें।
* स्वाइन फ्लू के मरीज के पास मॉस्क लगाकर ही मिले।
*  घर आने पर  हाथों को साबुन से अच्छे  से धोएं ।