Thursday, 11 February 2016

आर्डनेंस फैक्टरी की चिमनी बनी पीसा की मीनार
 तेज हवा के झोंकों में झूल रही बंद कराया गया वॉयलर
जबलपुर। आयुध निर्माणी स्थित फस्ट क्लास वायलर की हालत लम्बे अर्से से जर्जर हैै। करीब 130 फुट उंची इसकी चिमनी लोहे की बनी है जो जंग खाकर बुरी तरह खत गई है। शनिवार को तेज आंधी और बारिश के कारण जब चिमनी झूलने लगी तो फैक्टरी में खलबली बच गई। वायलर में काम काज रूक गया। इसका असर फैक्टरी के कामकाज पर पड़ा है। लम्बे अर्से से प्रस्ताविक चिमनी मरम्मत का काम फैक्टरी प्रबंधन एवं एकाउंट शाखा के बीच तालमेल न होने के कारण हो नहीं पा रहा है। एकाउंट शाखा प्रस्ताव को मंजूरी देखकर मुख्यालय नहीं भिजवा रहा है जिससे फैक्टरी में बड़ा हादसा होने का खतरा मंडरा रहा है। मजदूर यूनियनों ने इसको लेकर रोष जाहिर किया है।
जानकारी के अनुसार आर्डनेंस फैक्टरी में बम बनाने का काम में सर्वाधिक महत्वपूर्ण इकाइयों में वायलर होते है। फैक्टरी में तीन वायलर है जिससे बनने वाली स्टीम से फैक्टरी की सभी भारी भरकम मशीनरी को कम्प्रेशर दिया जाता है। फैक्टरी की 60 प्रतिशत मशीनों को कम्प्रेसर इसी यूनिट से मिलता है। करीब 12 बाय 12 फुट के भीमकाय वायलर की चिमनी लगभग 130 फुट उंची है। फैक्टरी में सभी फीलिंग सैक्शनों में वायलर से मिलने वाले कम्प्रेशर के माध्यम से ही फीलिंग का कार्य चलता है।
शनिवार को झूलने लगी थी चिमनी
सूत्रों की माने तो शनिवार को तेज आंधी और बारिश के चलते चिमनी झूलने लगी थी जिसके कारण उसके गिरने की आशंका के कारण फैक्टरी प्रबंधन ने उसे फिलहाल बंद करवा दिया। इससे फैक्टरी का करीब 60 प्रतिशत उत्पादन प्रभावित हुआ है तथा लेवरों का वर्क भी लगभग ठप्प हो गया है।
चिमनी के बाजू में केटीन
बताया गया कि जहां चिमनी स्थित है उसके ठीक बाजू में फैक्टरी की कैंटीन

है जिसमें रात दिन वर्कर मौजूद रहते है और उनकी संख्या सैकड़ों में होती है। फैक्टरी की केंटीन भी चिमनी के कारण खतरे के निशान पर आ गई है। कर्मियों में इस लावरवाही के कारण जबदस्त रोष व्याप्त है।
कर्मचारी नेता अरूण दुबे, केबी यादव, अनूप गोटिया, अखिलेश पटैल, अमित चौबे, मुकेश विनोदिया, केव्ही चौहान, एसके शर्मा आदि ने निंदा करते हुए शीघ्र चिमनी की शीघ्र मरम्मत करने की व्यवस्था की है।


दो विभागों की जंग का नतीजा
सूत्रों की माने तो आर्डनेंस फैक्टरी प्रबंधन जहां आर्डनेंस बोर्ड के अधीन है जबकि आर्डनेंस फैक्टरी एकाउंट विभाग कलकत्ता स्थित एकाउंट विभाग के अधीन है। आर्डनेंस फैक्टरी प्रबंधन और बोर्ड के अधीन एकाउंट विभाग के कर्मचारी एवं अधिकारी नहीं है जिसके कारण आए दिन वित्तीय मामले को लेकर फैक्टरी प्रबंधन एवं एकाउंट विभाग के अधिकारियों के बीच ठनी रहती है। इसी के चलते पिछले दो माह से फैक्टरी प्रबंधन के चिमनी मरम्मत की फाइल एकाउंट शाखा में लटकी पड़ी है और उसे मुख्यालय नहीं भेजी गई है। इस तहर की खीचतान के शिकार कर्मचारियों को होना पड़ रहा है। यूनियन ने कई बार मांग कर चूकि है कि आर्डनेंस फैक्टरी के एकाउंट विभाग को भी फैक्टरी बोर्ड के अधीन किया जाए। लेकिन वर्तमान व्यवस्था के तहत आर्डनेंस बोर्ड तथा एकाउंट विभाग अलग अलग इकाइयां है तथा उसके उपर नियंत्रण रक्षा मंत्रालय का रहता है।
 

अनुशासन और मेहनत ही अधिकारी की पहचान


 आशीष खरे, एएसपी जबलपुर
 सन 1998 बैच के मध्य प्रदेश पुलिस प्रशासन के अधिकारी आशीष खरे ने जबलपुर में एएसपी क्राइम के पद पर रहते हुए अनेक गंभीर बहुचर्चित  प्रकरणों एवं बड़े गिरोहों की धरपकड़ के लिए ख्याति अर्जित की। श्री खरे का कहना है कि विभाग में अनुशासन और मेहनत ही अधिकारी की पहचान बनाते है। उनका हाल ही में तबादला एएसपी शहर के पद पर किया गया है। इसके पूर्व वे भिंड, शाजापुर, भोपाल, बालाघाट, पीएचक्यू भोपाल में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। । श्री खरे से पीपुल्स संवाददाता दीपक परोहा की हुई बातचीत के अंश।
प्रश्न- जबलपुर में आप  एएसपी क्राइम पदस्थ रहें हैं, क्राइम ब्रांच की किसी शहर में क्या उपयोगिता है?
जवाब- कई प्रकरण ऐसे होते है जो बहुचर्चित होने के साथ समाज में एक संदेश भी देते है। प्रकरण का सुलझना और अपराधी का पकड़ा जाना समाज के लिए बेहद आवश्यक होता है। ऐसे गंभीर मामले में जब थाने की पुलिस संसाधनों की समस्या सामने आती है, मामले की जांच का क्षेत्र विस्तृत होता है तब क्राइम ब्रांच बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करता है। क्राइम ब्रांच का पूरा ध्यान अपराध अंवेषण पर केद्रित होता है। इसके चलते क्राइम  ब्रांच पुलिस में बेहद उपयोगी शाखा के रूप में उभर कर विभाग में आया है।
प्रशन- थाना में लॉ एण्ड आर्डर की समस्या से पुलिस को जूझना पड़ता रहता है, ऐसे में अपराध अंवेषण में पिछड़ जाती है। मामले पेडिंग रहते है, क्या थानों में लॉ एण्ड आर्डर एवं अपराध अंवेषण के लिए अलग अलग विंग क्या होना चाहिए?
जवाब - पुलिस मुख्यालय इस विषय पर काफी अर्से से विचार कर रहा है। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि कार्य विभाजन से बेहतर परिणाम आते हैं।
प्रश्न- एक अच्छे पुलिस अधिकारी में क्या खूबी होना चाहिए जिससे वह विभाग में अपना नाम कमा सके?
जवाब- एक पुलिस कर्मी एवं अधिकारी दोनो में अनुशासन में रहते हुए मेहनत

से काम करने का गुण होना चाहिए। इससे वह निश्वित ही नाम कमाएगा।
प्रश्न- आपका यादगार केस कौन सा है?
जवाब- सिविल लाइन जबलपुर में एक मासूम बच्ची आरोही का अपहरण की रिपोर्ट की गई थी, ये काफी चर्चित हुआ। जबलपुर सहित प्रदेश पुलिस के लिए बड़ी चुनौती थी। अपहरण के दिन गृह मंत्री भी शहर में थे, उन्होंने भी मामले को प्रदेश पुलिस के लिए बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किा। इस गंभीर प्रकरण में पहले से ही बच्ची की मां पर संदेह था लेकिन कोई भी ठोस प्रमाण नहीं थे। मामले की विवेचना में सैकड़ों पुलिस कर्मियों ने रात दिन मेहनत की , अंतत: प्रकरण का पर्दाफाश हुआ। बच्ची की ही मां ने ही मासूम आरोही का कत्ल किया था। इस प्रकरण में क्राइम ब्रांच का विशेष योगदान रहा। ये प्रकरण मेरा यादगार केस है।


दीपक बहरानी अधीक्षक जबलपुर हॉस्पिटल मो.9425155500



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दो दिन की बुखार में दम फूल गया था महिला का

टेस्ट कराने पर स्वाइन फ्लू पॉजेटिव निकला, बचा ली जान
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स्वाइन फ्लू का समय पर इलाज कराया जाए तो यह जानलेवा बीमारी नहीं है। इससे बचाव के लिए  उपाय करना बेहद आवश्यक है। हॉल ही में जबलपुर हॉस्पिटल के अधीक्षक दीपक बहरानी के  पास स्वाइन फ्लू से पीड़ित तीन मरीज इलाज के लिए  पहुंचे थे , तीनों की जिंदगी बच गई है। यहां पिछले सप्ताह ही सदर निवासी 35 वर्षीय महिला नर्गिस (काल्पिनिक नाम )  को इलाज के लिए  लाया गया था जिसका दो दिन बुखार के कारण दम फूलने लगा था तथा सांस नहीं ले पा रही थी, उसे तत्काल अस्पताल में दाखिल किया गया तथा महिला पांच दिन वेंटिलेटर पर रही और स्वास्थ्य होने के बाद घर चली गई। उसकी जान स्वाइन फ्लू से बचा ली गई।
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दीपक परोहा
9424514521
जबलपुर हॉस्टिल नेपियर टाउन के वरिष्ठ चिकित्सक दीपक बेहरानी  ने स्वाइन फ्लू के इलाज के संबंध में अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि पिछले सप्ताह जबलपुर हास्पिटल में स्वाइन फ्लू के तीन मामले आए और बेहद खुशी की बात है कि तीनों मरीज स्वस्थ्य होकर चले गए है। दरअसल स्वाइन फ्लू को लेकर लोगों में जबदस्त भ्रांति भी व्याप्त है कि बीमारी से मौत होना निश्चित है, यदि रोग के प्रारंभिक लक्षण नजर आते ही इलाज के लिए डॉक्टर के पास पहुंचा जाए तो लोगों की जान बचना तय है। अमूमन होता यह है कि वायरल एवं सर्दी का लोग इलाज नहीं कराना चाहते हैं, स्वयं ठीक होने का इंतजार करते है। यदि एच1एन1 वायरस से सर्दी एवं बुखार है तो उसमें देरी मौत का कारण बन जाती है।
 पिछले तीन सालों से जबलपुर हास्पिटल में स्वाइन फ्लू के मरीज आ रहे है जिसमें 5 में चार मरीजों की जान बचाई जा रही है। स्वाइन फ्लू वास्तव में बेहद खतरनाक बीमारी हो चुकी है। इसके वायरस एच1 एन1 बेहद शक्तिशाली हो चुके है। स्वाइन फ्लू पीड़ित मरीज के सम्पर्क में जैसे ही लोग आते है , उनको भी इंफैक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है।
मेरे पास हाल ही में सदर से 35 वर्षीय महिला को  लाया गया। उसको सांस लेने में भारी परेशानी हो रही थी। सांस नहीं ले पाने के कारण शरीर नीला पड़ रहा था। परिवार वालों ने बताया कि दो दिन से उसे तेज बुखार है और सर्दी खांसी है।  इस लक्षण से मुझे यही संदेह हुआ कि महिला को कहीं स्वाइन फ्लू तो नहीं है? उसको आइसोलेशन कक्ष में भर्ती किया गया तथा वेंटीलेटर में रखकर कृत्रिम सांस दी जाने लगी। उसके एक्सरे कराया गया तो फेफड़ों में सूजन एवं इंफैक्शन नजर आया। फेफड़ों में पानी भी भरा हुआ था। तत्काल टेस्ट कराया गया तो स्वाइन फ्लू की पॉजेटिव रिपोर्ट आई । महिला को टेमीफ्लू तथा अन्य दवाइयों को डोज प्रारंभ किया गया। तीन दिन तक महिला की हालत बेहद गंभीर रही। वह करीब 5 दिन तक वेंटीलेटर में रही । इसके बाद उसे आक्सीजन पर रखा गया । करीब 7 दिन के इलाज  के बाद वह स्वस्थ्य होकर घर चली गई। इसी तरह जबलपुर हास्पिटल में दो अन्य  मरीज स्वस्थ्य होकर गए।

स्वाइन फ्लू  के लक्षण
 स्वाइन फ्लू के लक्षण हैं सर्दी, जुकाम, सूखी खांसी होना, थकान आना , सांस फूलना, सिरदर्द और आंखों से पानी आना। संक्रमण गंभीर होने पर बुखार आता है। वायरल फीवर की तरह स्वाइन फ्लू के भी लक्षण है।
बवाव के उपाय
* सर्दी -खासी से पीड़ित व्यक्ति  से दूरी बनाकर रखे।  सार्वजनिक स्थल पर मास्क का इस्तेमाल करें। स्वाइन फ्लू के मरीज से दूरी बनाकर रखे।  बाहर से घर आने पर हाथों को साबुन से अच्छे से धोएं ।

बिन्दु के फेर में जजा की जनगणना हुई गफलत


याचिकाएं तक लगी है हाईकोर्ट में ,  प्रदेश में जनजाति का अनुपात बिगड़ा,  अचानक बढ़ गई जनसंख्या, अपात्र हुए लाभांवित
जबलपुर। सामाजिक एवं आर्थिक जनगणना 2011 में अनुसूचित जनजाति की गणना में हुई गड़बड़ी के कारण प्रदेश में अनुसूचित जनजाति का अनुपात गड़बड़ा गया है। इतना ही नहीं अपात्र लोगों को अनुसूचित जनजाति का बेजा फायदा हुआ है। इस मामले को लेकर पिछले तीन साल से कई याचिकाएं भी हाईकोर्ट में लम्बित है। इस गड़बड़ी की वजह मात्र एक बिन्दी लगाने की गफलत के कारण हुई है।
सूत्रों के अनुसार सामाजिक एवं आर्थिक जनजाति गणना के तहत कुल 43 अनुसूचित जनजातियां शामिल है। इसके तहत जाति क्रमांक 28 में माझी अंग्रेजी में लिखा गया है लेकिन इसी सूची में जहां देवनागरी लिपी में माझी की जगह मांझी लिख दिया गया है।
अनुसूचित जनजाति की सूची में इस त्रुटि के चलते बड़ी संख्या में मांझी समुदाय के लोग भी जनजाति में शामिल कर लिए गए । मध्य प्रदेश में अनेक जिलों में सामाजिक जनगणना में अनुसूचित जाति में मांझी जाति जिसके तहर कश्यप, केवट, मल्लाह आदि आते हैं उन्हें जनजाति में  शामिल कर गणना कर ली गई जबकि कई जिलों में सामाजिक जनगणना में इन मांझी जाति को जनजाति में शामिल नहीं किया गया। परिणाम स्वरूप मांझी जाति के लोग भी खिन्न है। उनका मानना है कि जनजाति में मांझी को शामिल कर लिया गया है लेकिन अनेक जिलों में शामिल नहीं किया गया है।
याचिका में शासन ने स्वीकार
होशंगाबाद के अशोक कुश्राम ने इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में एक याचिका भी लगाई है। इसमें कहा गया कि होशंगाबाद में मांझी जाति के लोगों को भी अनुसूचित जनजाति में शामिल करके उन्हें केन्द्र शासन द्वारा घोषित जनजाति सूची के लोगों की तरह लाभ मिल रहा है। इस याचिका में शासन ने

स्वीकार किया है कि होशंगाबाद में मांझी समाज के लोग अनुसूचित जनजाति में शामिल है।
मोती कश्यप के मामले में
मामला सर्वोच्च न्यायालय
जबलपुर जिले में भी मांझी समाज की कुछ जातियों को जनजाति की सूची में शामिल कर लिया गया। बड़बारा विधायक मोती कश्यप के जनजाति में शामिल न होने के मामले को लेकर हाईकोर्ट में एक याचिका लगाकर उनके चुनाव को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट से मोती कश्यपर को राहत नहीं मिल पाई थी जिसको लेकर मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया था। बहरहाल जबलपुर में मांझी जाति को जनजाति में नहंी शामिल किया गया है। इस तरह प्रदेश में एक ही जाति किसी जिलें में जनजाति में शामिल है तो किसी जिले में अनुसूचित जाति अथवा ओबीसी में शामिल है।
प्रदेश में अनुपात गड़बड़ाया
मांझी और माझी को हिन्दी और अग्रेजी में लिखने की त्रुटी का परिणाम यह हुआ है कि जनजाति को अनुपात बुरी तरह गणबड़ा गया है। अनुसूचित जनजाति की जनगणना भी प्रभावित हुई है। यदि आंकड़ों पर गौर किया जाए तो वर्ष 2001 की जनगणना में प्रदेश की कुल जनसंख्या में  20.3 प्रतिशत आदिवासी यानी अनुसूचित जनजाति के लोग मध्य प्रदेश में हैं जो कि देश में सर्वाधिक संख्या है। मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या गणना 2001 में 1 करोड़ 22 लाख 33 हजार 434 थी जबकि मांझी और माझी के फेर में  वर्ष 2011 की गणना में अनुसूचित जनजाति की संख्या में अचानक बढौतरी हो गई। जनजाति का प्रतिशत कुल आबादी में बढ़कर 21.3 प्रतिशत हो गया जबकि उसके अनुपात में सामान्य जाति, अनुसूचित जाति  तथा पिछड़ी जाति का कुल अनुपात तुलना में कम हो गया। वर्ष 2011 की गणना में अनुसूचित जनजाति की कुल संख्या 1 करोड़ 53 लाख 16 हजार 784 हो गई है। वर्ष 2011 की गणना के मुताबिक प्रदेश की कुल आबादी 7 करोड़ 26 लाख 26 हजार 809 है।
पल्ला झाड़ रहे है विभाग
सामाजिक एवं आर्थिक जनगणना विभाग इस गडबड़ी के लिए पल्ला झाड़ रहा है। विभाग का कहना है कि सामाजिक एवं आर्थिक गणना उनके द्वारा कराई गई है जबकि अनुसूचित जाति एवं जनजाति की गणना ग्रामीण विकास मंत्रालय ने करइशर्् है।

जंगल के राजा को किंग कोबरा से बचाने कवायद


केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने जारी किए निर्देश
जबलपुर। जंगल के राजा को किंग कोबरा से बचाने वन अमला एवं चिड़ियाघर प्रबंधन विशेष रूप से सतर्क है। दरअसल इंदौर चिड़ियाघर में 29 दिसम्बर को किंग कोबरा ने बाड़े में एक सफेद टाइगर को डस कर मार डाला था। विलुप्त होती सफेद टाइगर की मौत ने केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को हिलाकर रख दिया था। गर्मी के सीजन में चिड़ियाघर एवं नेशनल पार्क के बाड़ों में सर्प निकलने की घटनाएं बढ़ने के मद्देनजर किंग कोबरा से टाइगर को बचाने विशेष प्रयास शुरू किए गए है।
ज्ञात हो कि ं 29 दिसम्बर को किंग कोबरा ने इंदौर चिड़ियाघर में बाड़े में एक सफेद टाइगर को डस लिया जिससे उसकी मौत हो गई। टाइगर राजन की मौत को लेकर केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के आला अधिकारियों ने जांच पड़ताल की और विशेषज्ञों के दल से रिपोर्ट मांगी गई। इस रिपोर्ट के बाद केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण इस नतीजे पर पहुंचा है कि बाड़े में वाइल्ड एनीमल को रखने अब तक बने नियम निर्देश वैसे ही कड़े हैं लेकिन शेरों को किंग कोबरा से खतरा रहता है और इसके लिए सभी चिड़ियाघर तथा नेशनल पार्क जो इनक्लोजर में शेर-चीतों को रखते हैं, उनकी जहरीले सांप से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाए।
इस संबंध में केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने समस्त नेशनल पार्क एवं चिड़ियाघरों को सरकुलर भी जारी कर रखा है। इसके तहत चिड़ियाघरों को शेरों की सुरक्षा और खासतौर पर किंग कोबरा जैसे विषधर से बचाने और अधिक इंतजाम करने के निर्देश दिए है। इसके साथ प्रदेश के अनेक चिड़ियाघरों में सर्प विशेषज्ञों एवं सर्प पकड़ने वालों का सहयोग लिया जा रहा है।
सर्प विशेषज्ञ को बुलाया गया
जबलपुर के सर्प विशेषज्ञ मनीष कुलश्रेष्ठ को पन्ना नेशनल पार्क सहित रीवा में वाइट टाइगर प्रोजेक्ट से बुलाया जा चुका है। नेशनल पार्क में जहां टाइगरों को बाड़े में रखा गया हैं, वहां आसपास सर्प की मौजूदगी का पता लगाकर उनके पकड़ा भी जा रहा है। इस कार्य के लिए मनीष कुलश्रेष्ठ द्वारा वन कर्मियों को लगातार प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
 चिड़ियाघर में चूहे न पाले जाए
चिड़ियाघरों में जानवारों को दिए जाने वाले चने एवं अन्य खाद्यान्न डालने पर भी रोक लगाई जाने पर विचार चल रहा है। इस तरह के अनाज  चूहों को आकर्षित करते है और ये चूहे चिड़ियाघरों में जगह जगह बिल बना देते हैं और यही बिल जहरीलें सांप का घर बनता है और चूहे उनकी खुराक बनती है। इंदौर, भोपाल तथा ग्वालियर स्थित चिड़ियाघरों में पहले भी कई बार जहरीले सर्प निकल चुके है। इस सांपों से यहां के जंगली जानवारों पर मौत का खतरा मंडराता रहता है।
वर्जन
नेशनल पार्क से सांप को तो नहीं भगाए जा सकते हैं लेकिन जहां टाइगरों को बाड़े में रखा जाता है, वहां से सर्प न पहुंचे इसकी व्यवस्था बेहद जरूरी है। बाड़े में अमूमन सर्प पकड़ने वाले का घुसना मुश्किल रहता है। शेर के रहने वाली जगह का तापमान भी सांप के अनुकूल रहता है और बाड़े में चूहे भी रहते है जिसके कारण यहां सर्प न पहुंचे इसके इंतजाम बेहद जरूरी है। वर्तमान में इस दिशा में काम चल रहा है।
मनीष कुलश्रेष्ठ
प्राणी विशेषज्ञ 

यदि काम करें तो संसाधन की कमी आड़े नहीं आती


* जीपी पराशर एएसपी जबलपुर
सन 2000 बैच के राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जीपी पराशर का कहना है कि पुलिस बल की कमी तथा संसाधनों की कमी जैसी बाते कभी आड़े नहीं आएगी यदि काम ईमानदारी पूर्वक किया जाए। श्री पराशर वर्तमान में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जबलपुर शहर पदस्थ है। इसके पूर्व दमोह में एएसपी थे। श्री पराशर एसडीओपी मैहर, सीएसपी मऊ, इदौर तथा जबलपुर में रह चुके हैं। उनकी पहचान विभाग के कर्मठ पुलिस अधिकारियों में हैं जो मुश्किल से मुश्किल मामलों को सुलझाते रहे हैं। उनसे हुई पीपुल्स संवाददाता दीपक परोहा से बातचीत के अंश-
प्रश्न- जबलपुर शहर में आप सीएसपी पदस्थ रहें है, यहां पुलिस के सामने मुख्य चुनौती किसे मानते हैं।
जवाब- जबलपुर में चैन स्नेचिंग, संपत्ति विवाद और संगठित अपराध के साथ चोरियां एवं ठगी जैसे आपराधिक घटनाएं होती है। इसके साथ मारपीट, अपहरण और चाकू बाजी के अपराध ज्यादा होते है। इसमें नियंत्रण के लिए हर मामले में अपराधी को पकड़ा और सजा दिलाने की चुनौती रहती है और यही पुलिस का मूल काम है। इसको करने में किसी तरह की अलाली नहीं होना चाहिए।
प्रश्न - आपने अपने अधिकार क्षेत्र के थानों के क्या प्राथमिकताएं तय कर रखी है।
जवाव- सभी पुलिस कर्मियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए है कि अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में बैसिक पुलिसिंग बेहतर से बेहतर तरीके से करे। सभी बीट प्रभारी अपने क्षेत्र में जाएं तथा आमजनता से सतत संवाद कायम रखे। पुलिस गश्त एवं चौकसी में जरा भी लापरवाही न की जाए। अपराधी तत्वों की लगातार धरपकड़ की जाए। पुलिस का काम आम जनता और अधिकारियों को दिखना चाहिए।
प्रश्न- पुलिस थानों में बल की कमी है, संसाधनों का अभाव है, ऐेसे में बेसिक पुलिसिंग आप कैसे करवा पाएंगे।
जवाब- यह सब काम न करने के बहाने है। पुलिस थानों में जितना भी बल मौजूद है उसका तरीके से उपयोग किया जाए, यानी की मैनपावर का मैनेमेंट होना चाहिए। हर काम समय पर और तत्काल किया जाए। ऐसे में बल एवं संसाधन की कोई कमी नहंी रहती है। काम चोरी करना हो तो सौ बहाने मिल जाते है। दर असल हर पुलिस कर्मी की अपनी जवादेही तय की जाए तो वे स्वयं ही काम करते है।
्रप्रश्न- पुलिस का अधिकांश समय कानून व्यवस्था में जाया जाता है जिसके कारण थानों में पेडिंग मामले बढ़े हुए हैं
जवाब- कानून व्यवस्था कायम रखना भी महत्वपूर्ण काम है। जबलपुर शहर में ऐसे कानून व्यवस्था को लेकर विशेष समस्या नहंी आती है लेकिन शहर संवेदनशील है। पुलिस अधीक्षक द्वारा क्राइम मीटिंग ली जाती है, इस दौरान पेडिंंग मामलों पर भी चर्चा होती है। मेरा प्रयास रहता है कि थानों में पेडिंग न रहे, इसलिए लगातार मै मानीटरिंग करता हूं। 

आर्थोपेडिक सर्जरी आधुनिक चिकित्सा का चमत्कार






सन 1990 के दशक प्रदेश के शहरों में आर्थोपेडिक सर्जरी की क्रांतिकारी शुरूआत वाला समझा जाता है। सर्जरी से बोन फैक्चर में लोगों को महीनों के लम्बे इलाज से छुटकारा मिल जाता है। अब तो दो तीन दिनों में ही टूटी हड्डियां सर्जरी के माध्यम से जोड़ी जाने लगी और मरीज हफ्ते भर में नियमित होने लगे है। इंग्लैड, स्विट्जर लैण्ड, मुम्बई में हड्डियों की शल्य चिकित्सा करने का अभुव अर्जित कर डॉ सुधीर तिवारी जबलपुर में आधुनिक तरीके से  अस्थि सर्जरी कर रहे हैं। जबलपुर में आधुनिक शल्य चिकित्सा की शुरूआत करने वालों में  चिकित्सकों में शुमार हैं।
डॉ. तिवारी बताते है कि सन 1992-93 में मल्टी फैक्चर के मामले आने पर जबलपुर के मरीजों को सीधे नागपुर एवं मुम्बई रेफर किया जाता रहा है लेकिन आज जबलपुर में कुल्हे तथा घुटने प्रत्यारोपित  किए जा रहे है।
डॉ सुधीर तिवारी वर्ष 1994 से लेकर आज तक जबलपुर में शल्य चिकित्सा एवं अस्थि रोग का उपचार कर रहे हैं। वर्तमान में जबलपुर हास्पिटल एवं डॉक्टर भंडारी हास्पिटल में सर्जरी करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने कितनी सर्जरी की इसके गिनती कभी नहीं की। चाहे बड़ी से बड़ी सर्जरी हो अथवा छोटी से छोटी सर्जरी उतनी ही तन्मयता और सावधानी पूर्वक नई तकनीकि का इस्तेमाल करके की।
उनके द्वारा की गई यादगार सर्जरी
केस 1-
वर्ष 1993 में इंग्लैड से लौट कर आने पर सतना से एक्सीडेटल मामले का एक केस उनके पास आया था जो पॉली ट्रामा का प्रकरण था। इस मामले में मरीज की घुटने और कूल्हे की हड्डियों में असंख्य फैक्चर थे, हड्डियां जगह जगह से चकनाचूर हो चुकी थी। इस चुनौती पूर्ण आपरेशन में डॉ सुधीर तिवारी एवं उनकी टीम को 14 घंटे लगे। उनके साथ अस्थिरोग  सर्जन डॉ.संजीत बैनजी थे। इसमें सभी हड्डियों को उनके निर्धारित स्थान में बैठाया गया। उच्च तकनीकि का इस्तेमाल कर स्कू्र, नट बोल्ट से हड्डियों को जोड़ा  गया। स्टील की छोटी बाड़ी कई प्लेटें लगाई गइ। इस तहर का आॅपरेशन जबलपुर में पहली बार और सफतला पूर्वक किया गया।
केस -2
जबलपुर के ही एक मरीज के घुटने में कई फैक्चर आए थे। उसके घुटने बदले जाने की स्थिति निर्मित हो गई थी लेकिन इस घुटने में डायनमिक कंडालर स्कू डाला गया जिससे घुटने का मुड़ना संभव हो सका और मरीज के पैर में स्थायी विकृति नहीं आ पाई।
केस -3
कोहनी टूटने में एक या दो फैक्चर अमूमन होते है लेकिन डॉक्टर सुधीर तिवारी के पास एक महिला मरीज आई जिसके कोहनी के 8 तुकड़े हो गए थे। आॅपरेशन करने के दो दिन बाद ही उसकी कोहनी का मूवमेंट शुरू हो गया।
केस-4
स्पोर्ट इंज्यूरी संबंधी मामले के संबंध में डॉ तिवारी ने बताया कि संजू माथन नामक एथलीट जो वर्तमान में सेना में पदस्थ है। उसके अंगूठा लगभग पूरी तरह टूट कर घुम चुका था। उससे तीन माह में पूरी तरह दौड़ने कूदने लायक बनाया गया और बाद में वह नेशनल एवार्ड भी प्राप्त किया। उनका कहना है कि स्पोर्ट इंज्यूरी में उनके द्वारा आर्थो स्कोपी से चिकित्सका की जा रही है। दूरबीन पद्धति से बिना आॅपरेशन किए सर्जरी कर हड्Þडी जोड़ी जाती है जिससे खिलाड़ी जल्द ठीक होए। डॉ तिवारी ने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में खिलाड़ियों की चिकित्सा इसी तरीके से की।
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उनकी फैलाशिप इग्लैंड में हुई। वे जबलपुर के ही मूल निवासी है और राइट टाउन में स्वयं की क्लिनिक है। उन्होने सेंट जार्ज हास्पिटल लंदन, टिमेली हॉस्पिटल ज्यूरिच स्विटजरलैण्ड , क्लीन मेरी चिल्डन आर्थोपेडि हास्पिटल इग्लैड तथा जसलोक हास्पिटल एंड रिसर्ज सेंटर मुम्बई के कई वर्ष सेवाएं देने के उपरांत अपने गृह नगर में सेवाएं दे रहे है।
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इंटर व्यू --
गंभीर अस्थि रोग से थोड़ी
सावधानी से बचना संभव
 भारत में अस्थिरोग तेजी से बढ़ रहा है। गंभीर अस्थि रोग से थोड़ी सावधानी दिनचर्चा में बरतने से बचा जा सकता है। इससे लोग भविष्य में बड़ी आर्थोपेडिक सर्जरी और बीमारी से बच सकते है। ये कहना है डॉ. सुधीर तिवारी का। उनसे हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश-
प्रश्न- इन दिनों अस्थि व्याधि संबंधी कौन से बीमारी ज्यादा सामने आ रही है?
जवाब -मध्य प्रदेश सहित पूरे देश में तेजी से आस्टोपोरोसिस नामक बीमारी हो रही है। ये बीमारी बच्चों, प्रौण महिला-पुरूषों एवं वृद्धों में सर्वाधिक हो रही है। हस्थिरोग में हर दसवां मामला इसी बीमारी का होता है। इस बीमारी में मानव की अस्थियों से कैल्सियम की मात्रा घट जाती है जिससे हड्डियां खोखली हो जाती है। यह एक स्वस्थ्य व्यक्ति के लिए बेहद घातक है।
 प्रश्न- इस बीमारी का उपचार क्या है और बचाव के क्या उपाय है?
जवाब- बीमारी विटामिन डी की कमी से होती है तथा बाजार में दवाइयां उपलब्ध है लेकिन हड्डियों में खोखलापन न आए इसके लिए हर व्यक्ति को उपचार करना चाहिए। एक तो हड्डियों की मजबूती के लिए दूध का सेवन बेहद जरूरी है। सस्ते फल संतरा, पाइनएपल, बिही, आवला आदि का सेवन करना चाहिए। विटामिन डी बनाने की शरीर में स्वयं क्षमता होती है। व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह आधा घंटे सनबाथ लेना चाहिए। मालिस एवं सनबाथ लेने

वाले व्यक्ति की हड़डी मजबूत रहती है।
प्रश्न-रूमरथ्राटाइज से लोग तेजी से पीड़ित हो रहे है। इसके मरीज की हड्डियां अकड़ जाती है, असहनीय वेदना से गुजरना पड़ता है, आखिर बीमारी क्यों फैल रही है?
जवाब-  ये मूलत: अस्थिरोग नहीं है लेकिन इफैक्टर हड्डियों पर पड़ता है। दरअसल ये गुप्त संक्रमण हैं, यानी कि किसी बाहरी वैक्टिरिया या वायरस से संक्रमण नहीं होता है वरन मानव का स्वयं का रोग प्रतिरोधन तंत्र स्वयं के शरीर पर अटैक करता है। इसके होने के पीछे मुख्यत: अनियमित दिनचर्चा, वंशानुगत कारण, अत्यधिक तनाव तथा भोजन में पोषक तत्वों की कमी हो सकते है। इसमें संयमित तरीके से दवा देने से रोग से छुटकारा संभव है।
प्रश्न - अधिकांश वृद्धजनों को ओस्ट्रियो आर्थराइट्स , घुटने खराब होना जैसे कई रोग हो जाते है। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारतीयों में ये बीमारी ज्यादा है क्या?
जवाब- औसतन भारतीय जनों में ओस्टियों आर्थराइट्स ज्यादा होता है। यूं तो वृद्धा अवस्था में सभी को अस्थि व्याधि होती है लेकिन भारतीय लोगों की दिनचर्चा में असावधानी बड़ा कारण है। इस संबंध में मेरा कहना है कि ‘कम वजन, सुखद सफर’ यानी व्यक्ति अपना वजन नियंत्रित रखे, मोटापा से बचे तो कई हड़्डियों संबंधी होने वाली बीमारी और दर्द से छुटकारा मिलेगा। इसके साथ ही पाल्थी एवं उकडू बैठना बिल्कुल भी उचित नहंी है। इससे बचने की कोशिश करना बेहद जरूरी है। भोजन में पौष्टिक पदार्थो की कमी भी हड्डियों की समस्या को बढ़ा रही है। 

चीटियां बना रही पेड़ पर घोसला


प्रकृति के करीब जन्तुओं से लगाते है आदिवासी मौसम की भविष्यवाणी

 जबलपुर । जी हां जंगली लाल चीटियों ने इस वर्ष अभी से पेड़ों पर अपने अंडे को सहेजने के लिए घोसला बना लिए है। चीटिंयों की इस हरकत को लेकर आदिवासी और ग्रामीण लोग मौसम की भविष्यवाणी से जोड़ कर देखते है। ये संकेत बताते हैं कि इस वर्ष मानसून समय पर और जोरदार तरीके से दस्तक देगा यानी की जमकर बारिश होगी।
जहां पिछले वर्ष जंगलों तथा शहरी क्षेत्रों में काले चिड्डे बड़ी संख्या में निकले थे जिसको लेकर अनुमान लगाया जा रहा था कि आकाल जैसी स्थिति निर्मित होगी। मानसून ने लगभग आकाल जैसी ही स्थिति निर्मित कर दी थी।
प्रकृति के बेहद करीब रहने वाले जीव जन्तु के संबंध में एक धारणा एवं काफी हद तक वैज्ञानिक आंकलन भी है कि प्राकृतिक आपदाओं एवं घटनाओं का उनका लभगभ पूर्वाभास हो जाता है यानी की वे उन परिस्थितियों से निपटने तैयारी कर लेते है।
जानकारों का कहना है कि आम तथा अन्य पेड़ों में रहने वाली लाल चिटियां अमूममन पेड़ के नीचे ही अपने घर एवं कॉलोनी बनाती हैं  लेकिन जब वे पेड़ के पत्तों एवं टहनियों के सहारे अपने घर बनाते है तो समझना चाहिए उस वर्ष जंगली उपज बड़ी मात्रा में होनी है तथा उस वर्ष बारिश भी समय पर और जोरदार तरीके से दस्तक देती है। इस हिसाब से आदिवासियों का अनुमान है आम, तेन्दू तथा अचार आदि की जंगली उपज जोरदार होनी है। इसके संकेत
भी नजर आने लगे है। जंगल प्लास के फूलों से लद गए है जो संकेत देते है कि जल्द ही और समय बारिश भी दस्तक देगी।

वर्जन

आदिवासी एवं पुराने कृषक जीव जन्तुओं की हरकत के हिसाब से ही मौसम का पूर्वानुमान लगाते आ रहे है। इसके हिसाब से ही खेती किसानी की तैयारियां करते रहे है। यह परम्परा वर्षो से आदिवासी समाज में अब भी चल रही है। जानवरों का धूल पर लोटना या चिडियां का धूल से स्नान आदि कई हरकतें मौसम संबंधी भविष्यवाणी से जोड़कर ग्रामीण अब भी देखते हैं।
मनीष कुलश्रेष्ठ
 प्राणी विशेषज्ञ 

जंगल से भटके जानवरों की हो रही लगातार मौत


 वन अमला सकते में, तमाम प्रयासों में फिरा पानी
 आधा दर्जन चीतलों की मौत
 जबलपुर। गर्मी के मौसम में जंगल में जल स्त्रोत सूखने पर प्यासे गांव और शहर में पानी की तलाश में घुसते है और यहां बेमौत मारे जाते है। इस समस्या से निपटने के लिए वन विभाग द्वारा  जंगल के भीतर पानी पहुंचाने की योजना चलाई लेकिन इसके बावजूद वन्य प्राणी लगातार गांवों में घुस रहें है। अब तक जबलपुर और कटनी वन क्षेत्र के छह चीतलों की मौत हो चुकी है।
्रप्राप्त जानकारी के अनुसार पिछल्ले दिनों कटनी क्षेत्र के जंगल से भटके चीतल की गांव में मौत हो गई थी। इसके पूर्व तीन चीतलों की मौत यहां केण्ट क्षेत्र में हुई थी तथा दो चीतल की मौत सीता पहाड़ी क्षेत्र में हुई थी।
जबलपुर शहर सहित अनेक गांव में हर वर्ष चीतल एवं हिरण की मौत नहर में डूबने तथा गांवों में कुत्तों से हमले के कारण गर्मियों में होती रही है। इसके साथ ही गर्मी में शिकारियों द्वारा इन जानवरों का  लगातार शिकार भी किया जाता रहा है। जंगल में जल स्त्रोत सूखने पर जानवर जंगल से बाहर आते रहे है और घात लगाए शिकारियों द्वारा मारे जाते है। वन विभाग ने इस समस्या से निपटने गांव के भीतर गड़ढे आदि खोद कर तथा प्राकृतिक जल स्त्रोत जो सूख गए हैं उनमें टेंकरों से पानी भरा जाता है। इसके साथ ही जबलपुर में नहर के किनारे टंकी अथवा गड़्ढों में पानी भरा जाता है जिससे चीतल नहर में न गिरे लेकिन इसके बावजूद चीतलों की होने वाली मौत से वन अमला  परेशान है।
वर्जन
वन्य प्राणी पानी की तलाश में जंगल से बाहर न आए इसके लिए  जंगल तक पानी पहुंचाया जाता है, लेकिन फिर भी कुछ जानवर वाहर आ जाते है, इसको लेकर दिनों विशेष  चौकसी बरती जा रही है।
आरके पांडे

एसडीओ फारेस्ट 

रिेकार्ड तेजी से चला विद्युतीकरण




जबलपुर। डब्ल्यूसीआर द्वारा रेलवे विद्वुतीकरण जबलपुर योजना में जिस तेजी से काम किया जा रहा है, वह अब तक का सर्वाधिकत तेजी से विकास कार्य बताया गया है।
रेलवे के मुताबिक रेल विद्युतीकरण, जबलपुर परियोजना को छिवकी से इटारसी रेल खंड जिसमें सतना-रीवा रेल खंड सम्मिलित है, के 653  कि.मी. तथा 1611 ट्रेक किमी. के विद्युतीकरण की जिम्मेदारी दी गई हैं। यह कार्य वर्ष 2012-13 में स्वीकृत हुआ था तथा स्वीकृत राशि  861.33 करोड़ रूपए है। इस रेल खंड का 92 किमी उत्तर मध्य रेलवे तथा 561  किमी. पश्चिम मध्य रेल में आता है। इस रेलखंड के विद्युतीकरण कार्य को 4 भागों में बांटा गया है।
छिवकी-मानिकपुर रेल खंड के तहत मानिकपुर-सतना-रीवा रेल खंड , 3बी, सतना-जबलपुर रेल खंड एवं जबलपुर-इटारसी रेल खंड में पिछले एक वर्ष से  रेल विद्युतीकरण कार्य जोर-शोर  से चल रहा है। वित्त वर्ष 2014-15 के प्रारंभ में 222 किमी  रेल खण्ड का 22 के.व्ही. पर इनरजाइज करने का लक्ष्य रखा था जिसे उसी वर्ष के मध्य में 282 किमी कर दिया गया।

रेल विद्युतीकरण परियोजना में इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सटीक योजना बनाई। जिससे  न केवल 282 किमी का विशाल लक्ष्य को प्राप्त किया गया अपितु लक्ष्य से अधिक 290 किमी का कार्य सम्पन्न हुआ ये  एक कीर्तिमान है।
 50 हजार का इनाम
 रेल विद्युतीकरण,  परियोजना को इस सर्वाधिक उपलब्धि के लिए महाप्रबंधक, केन्द्रीय रेल विद्युतीकरण संगठन, इलाहाबाद द्वारा  50 हजार का नगद पुरस्कार प्रदान किया गया तथा महाप्रबंधक स्तर पर 2 शील्ड प्रदान की गई एवं 5 अधिकारयों तथा 8 कर्मचारियों को रेल सप्ताह के दौरान  पुरस्कृत किया गया । मुख्य परियोजना प्रबंधक स्तर पर भी 24 कर्मचारियों कार् , 2015 में पुरस्कृत किया गया।
2017 तक पूर्ण हो जाएगा
मुख्य परियोजना प्रबंधक, रेल विद्युतीकरण आर.पी.शर्मा,  के अनुसार दिसम्बर, 2017 तक इटारसी-छिवकी खंड पर रेल विद्युतीकरण का कार्य पूर्ण कर लिया जाएगा। इसके साथ ही रेल गाड़ियां बिजली से चलने लगेगी।
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 भविष्य की रेल बिजली भी उत्पादन करेगी
  सोलर एनर्जी तैयार करने
 वाली एक कोच तैयार
जबलपुर। बढ़ती हुई बिजली की जरूरत को देखते हुए रेलवे स्वयं अपनी जरूरतों के लिए बिजली उत्पादन की दिशा में सोचने लगा है। भविष्य में कोच को और सुविधा सम्पन्न और बनाया जाता है तो निश्चित ही उर्जा की और जरूरत पड़ेगी। यदि सब कुछ ठीक ठाक चला तो निकट भविष्य में ट्रेन की बोगियों में ही बिजली उत्पादन होगा। रेलवे के इस स्वप्न को साकार और कोई नहंी अक्षत उर्जा स्त्रोत यानी सौर्य उर्जा एवं बिंड उर्जा ही करेगी।
इस दिशा में पश्चिम मध्य रेलवे ने पहल शुरू कर दी है। यहां एक कोच ऐसा तैयार करवाया गया है जिसकी छत पर सोलर पैनल लगाया गया है। दिन भर सूरज की किरणों से बिजली बनती रहती है। इसी तहर विंड एनर्जी के उपयोग का भी भविष्य में इस्तेमान हो सकता है। इसके लिए प्लेटफार्म की छतों तथा रेलवे अपनी भूमि पर विंड उर्जा उत्पादन की दिशा में काम कर सकता है।  पश्चिम मध्य रेलवे जोन के इंजीनियर इस दिशा में लगातार प्रयोग और शोध कर रहें है। कोटा रेल मंडल में बिन्ड उर्जा से बिजली उत्पादन के लिए गेट पर टावर लगाया गया है। यह टावर सिर्फ प्रयोग के तौर पर लगाया गया है।
भविष्य की बोगियों की मांग
 भविष्य में यदि यात्री की सुविधाओं को बढ़ावा दिया जाता है। ं वाइफाई, मिनी एसी, पेंटी कारों में हीटर तथा उर्जा के अन्य संसाधन बढ़ते है और बोगियों में वर्तमान डिमांड से अधिक बिजली की जरूरत पड़ती है तो प्रदूषण रहित विद्युत उत्पादन ट्रेनों में क्यों न किया जाए? इस पर रेलवे विचार कर रहा है।
छतों पर होगा उत्पादन
बोगियों की छतों पर सोलर प्लेट लगाई जा कसती है और उससे काफी उर्जा उत्पादन होगा। इसको प्रयोग के चलते पश्चिम मध्य रेलवे ने सोलर एनर्जी से लैस एक कोच तैयार भी कर लिया है।  इस बोगी का निर्माण वर्तमान तो पमरे ने बाहर से कराया है लेकिन पश्चिम मध्य रेलवे में ऐसे इंजीनियरों की फौजै
 मौजूद हैं जिन्हें साजो-सामान उपलब्ध हो जाएग तो वे सोलर प्लेट वाली बोगियों की लाइन लगा सकते है।
गर्मी में होगी उपयोगी
गर्मी में ट्रेन में नान एसी में यात्रा करने वाले यात्री को भीषण गर्मी में सफर करना पड़ता है। इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ साइंस ने रेलवे कोच की छतों पर सोलर सीट फिट करने की सलाह दी है जिससे कोच में गर्मी भी कम रहेगी और इसके साथ बोगी में बिजली की आपूर्ति भी होगी। इससे डीजन तथा बिजली की किफायत भी होगी। वर्तमान में एसी कोच में करीब 25 किलोवाट बिजली की खपत होती है जबकि नान एसी कोच में पंखे ओर लाइट के लिए करीब 15 किलोवाट बिजली की जरूरत पड़ती है।
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 बोगियो पर सोलर पैनल लगाने का कार्य फिलहाल एक बोगी में प्रयोग की तौर पर किया गया है। रेलवे की अन्य बोगियों पर सोलर पैनल लगाने का कोई विचार एवं प्रस्ताव नहीं है। भविष्य की संभावनाओं को तलाशते हुए सिर्फ रेलवे इंजीनियर्स प्रयोग कर रहे है। इसी तरह विंड एनर्जी पर भी रेलवे प्रयोग कर रहा है।
 पीयूष माथुर, सीपीआरओ, डब्ल्यूसीआर

व्यापमं मामले से जुडेÞ 40 आरोपियों की मौत पर रहस्य का पर्दा!


सरकार कह रही 40, विपक्ष का दावा 158 मरे, अब सिर्फ न्याय ही सहारा
जबलपुर। व्यापमं मामले से जुडेÞ लोग एवं आरोपियों की लगातार हो रही मौत से एक और मुद्दा खड़ा हो गया है। विपक्ष इस मामले में होने वाली मौतों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है। व्यापमं मामले की जांच के चलते राज्यपाल के पुत्र सहित अब तक 40 आरोपियों की मौत हो गई है, जबकि विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे का दावा है कि व्यापमं मामले में 158 लोगों की मौत हो चुकी है। इनकी मौत की वजह और मरने वालों की सूची सरकार सार्वजनिक नहीं कर रही है।
जानकारी अनुसार मध्य प्रदेश के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा मामला व्यापमं घोटाला है, इसमें सर्वाधिक 2500 आरोपी बनाए गए हैं और मामले में आरोपियों की संख्या अब भी बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है। इस महाघोटाले में अब तक अलग-अलग 55 प्रकरण पंजीबद्ध किए गए हैं। हाईकोर्ट के निर्देश पर हाल ही में व्यापमं मामले में जांच के लिए 20 विशेष कोर्ट गठित की गई है। इसका उद्देश्य ही रहा है कि व्यापमं मामले में जल्द न्याय मिल सके। मामले में जुड़े आरोपियों को जमानतें मिलना भी आसान नजर नहीं आ रहा है। इसके साथ ही अनेक आरोपी अपने को निर्दोष मान रहे हैं। पिछले तीन साल से चलने वाली जांच के दरमियान आरोपियों की मौतों का सिलसिला भी थम नहीं रहा है। उनकी मौत के पीछे आखिर क्या वजह है? इसको लेकर पुलिस कुछ भी स्पष्ट नहीं कर पाई है। इसी तरह अनेक छात्र ऐसे हैं, जिनका पूरा जीवन इस मामले में दांव पर लगा है और उनमें तेजी से अवसाद की स्थिति निमर््िात हो रही है। बहरहाल इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए त्वरित न्याय के लिए स्पेशल कोर्ट गठित की जा चुकी है।
विपक्ष ने लगाए आरोप
व्यापमं मामले में अब तक 40 आरोपियों की मौत को लेकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस इसे संदिग्ध बता रहा है। विधानसभा में विपक्ष के नेता सत्यदेव कटारे का कहना है कि मृतकों में अनेक व्यापमं मामले में बड़े राजदार रहे हैं। उनकी मौत ही अपने आप में एक बड़ा सवाल है, बहरहाल हाल ही में लक्ष्मीनारायण शर्मा की भी जेल में मौत होने की आशंका संबंधित चर्चा सुर्खियों में रही है।

न्याय की उम्मीद खो चुके हम
व्यापमं मामले में हम लोग न्याय की उम्मीद पूरी तरह से खो चुके हैं। यह मामला निर्दोषों की मौत का कारण बनता जा रहा है। शासन ने इस मामले में अब तक 40 आरोपियों की मौत होना स्वीकार किया है, लेकिन शासन ने अब तक इन 40 मौतों की कोई सूची सार्वजनिक नहीं की है। मेरे पास जो जानकारी उपलब्ध है, उसमें 158 लोगों की जानकारी शामिल है। व्यापमं घोटाले में सिर्फ आरोपियों की ही नहीं, बल्कि छात्रों और उनके अभिभावकों, प्राध्यापकों सहित अन्य कई लोगों की मौतें हुई हैं। इन मौतों में वे लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं, जो व्यापमं मामले में आरोपी तो नहीं थे, लेकिन व्यापमं घोटाले के राज जानते थे, घोटालेबाजों की प्रताड़ना के शिकार थे। मेडिकल कॉलेज जबलपुर के डॉ. शाकल्ये भी व्यापमं घोटाले की बलि चढ़े हैं। मामले में हमें न्याय की कोई उम्मीद नहीं हैं, इतने बड़े घोटाले में यदि सीबीआई जांच के आदेश दे दिए जाते तो क्या फर्क पड़ता? सुनियोजित तरीके से व्यापमं मामले में गड़बड़ी सरकार ही कर रही है।
सत्यदेव कटारे, नेता प्रतिपक्ष, विधानसभा, मप्र
प्रमुख संदिग्ध मौत
राज्यपाल के पुत्र शैलेष सिंह, मौत की वजह जहर।
फार्मासिस्ट विजय सिंह, मौत की वजह अज्ञात
इंदौर की छात्रा-नम्रता खुदकुशी का संदेह
व्यापमं मामला एक नजर में
पंजीबद्ध प्रकरण-55
 आरोपी        - 2500
 गिरफ्तार  -    1980
 गिरफ्तारी शेष-   550
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ये हैं विशेष अदालतें
अति. जिला सत्र न्यायालय- न्यायधीश
 भोपाल राम कुमार चौबे, अरुण कुमार वर्मा, भूपेन्द्र कुमार सिंह, बीएस भदौरिया, दिनेश प्रताप सिंह,
ग्वालियर-सतीश शर्मा, धरमिंदर सिंह, अनिल कुमार सुहाने
जबलपुर-सुनील कुमार जैन
रीवा-अरुण सिंह
इंदौर-दिलीप कुमार मित्तल
खंडवा-प्रकाश चंद्रा
 मरेना-राकेश मोहन प्रधान
 भिंड-दीपक कुमार अग्रवाल
दमोह-देवेन्द्र देव द्विवेदी
छतरपुर-रामगोपाल सिंह
गुना-पीसी गुप्ता
सागर-अजीत सिंह

- संस्कार की क्लास




 जबलपुर। नौनिहालों के संस्कार में गिरावट को स्कूली शिक्षा विभाग गंभीरता से ले रहा है। फिल्म और टीवी के चलते बच्चों में संस्कार में आने वाली गिरावट के मद्देजनर नैतिक शिक्षा के पाठ पर इस सत्र से विशेष जोर दिया जाएगा। नैतिक शिक्षा यूं तो माध्यमिक स्तर तक पूर्व से ही लागू है लेकिन स्कूलों में शिक्षक नैतिक शिक्षा की क्लास नहीं लेते रहे है। इसको लेकर इस सत्र से नैतिक शिक्षा के पाठ पर जोर दिया जा है।
इस संबंध में सभी जिलों में जिला योजना समन्वयक को निदेश दिए गए है कि स्कूलों में नैतिक शिक्षा की पीरियड भी लगाया जाए। स्कूली शिक्षा विभाग इस नतीजे पर पहुंचा है कि प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के छात्र कच्ची मिट्ठी की तरह होते हैं उन्हें जिस रूप में ढाला जाए वैसा स्वरूप ले लेते है। शासकीय स्कूल के बच्चे तेजी से बिगड़ रहे है। इसके लिए उनको सही दिशा एवं मार्ग दर्शन देने की जरूरत है। नैतिक शिक्षा की जरूरत है लेकिन इसके लिए फिलहाल कोई पाठ्य पुस्तक निर्धारित नहीं है। पूर्व में मॉरल साइंस की पुस्तकें लागू थी लेकिन इसकी अनिवार्यता खत्म कर दी गई है।
मूल्यांकन होगा
 प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूल तक के विद्यार्थियों को परीक्षा विभाग ने पास फेल से फिलहाल दूर रखा है किन्तु उनका मूल्यांकन करने का निर्णय लिया जा चुका है। इसके तहत नैतिक शिक्षा की जगह व्यक्तिव विकास पर शिक्षक अपने छात्रों को अंक देंगे। इसके तहत उनका कक्षा में सहपाठियों के प्रति व्यवहार, शिक्षकों के प्रति व्यवहार, होम वर्क के प्रति रूझान, उनकी हेंड राइटिंग, कल्चर एक्टिविटी में शामिल होना आदि के आधार पर उन्हे मार्क कक्षा शिक्षकों को देना है। कक्षा शिक्षक ही उनको नैतिक शिक्षा के पाठ पढ़ाएं।
पाठ्यक्रम जोड़े जाने पर विचार
कुछ वर्ष पूर्व सामाजिक विज्ञान का विषय शामिल था जिसमें नैतिक शिक्षा के पाठ थे लेकिन इसे कुछ साल से बंद कर दिया गया है। इसे फिर चालू करने

पर मंथन चल रहा है लेकिन फिलहाल नैतिक शिक्षा के लिए कोई पाठ्यक्रम तय नहीं हुआ है अलबत्ता नैतिक शिक्षा के पीरियड इस सत्र से चालू करने के निर्देश मिल चुके है और नैतिक शिक्षा पर इस सत्र से जोर दिया जाएगा।

वर्जन
नैतिक शिक्षा सभी शासकीय स्कूलों में लागू करने के निर्देश है लेकिन कई स्कूल के प्राचार्य नैतिक शिक्षा के पीरियड नहीं लेते है। इस सत्र से इस पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। शिक्षक ही बच्चें को राष्ट्र प्रेम , सामाजिक मर्यादा, शिष्टाचार, महापुरूषों आदि विषयों की जानकारी देते हुए नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाएंगे।
एलएल पाठक
जिला समन्वयक जबलपुर

आरएस कालरा, एएसपी ग्रामीण



प्रश्न- आप जबलपुर में सीएसपी पदस्थ रहें हैं, और शहर से वाकिफ हैं,       इसका फायदा शहर किस तरह आपसे मिलेगा?
जवाब- मै सीएसपी रांझी के रूप में जबलपुर में पदस्थ रहा हूं। इस दौरान मेरा क्षेत्रीय गणमान्य लोगों से जीवंत संपर्क था। संभाग के थानों के स्टाफ के साथ ही शहर के अन्य पुलिस संभाग के स्टाफ मुझे जानता था और मै भी उनसे परिचित हा हँ। शहर को और यहां के लोग तथा यहां की अपराध के ट्रेन्ड से मै भलीभांति परिचित हूं। अत: कारगर पुलिसिग के किए योजनाएं बनाना नए अधिकारी की तुलना में मेरे लिए आसान है।
प्रश्न- जबलपुर पुलिस के सामने मुख्य समस्या क्या है?
जवाब- शहर के लगभग अधिकांश थानों में पुलिस बल की कमी बनी हुई है। ड्यूटी अधिकारी की कमी बनी रहती है। परिणाम स्वरूप कई बार पुलिस वालों को घंटों अपना काम करना पड़ता है। पुलिस काम के दबाव में रहती है।
 प्रश्न - बल की कमी और कार्य के तनाव के बीच में बेहतर पुलिससिंग क्या संभव नहीं है?
जवाब- जी नहीं। यह संभव है। इसके लिए बेहतर वर्क मैनेजमेंट की जरूरत है। समय पर काम पूरा करना, पेडिंग मामलों का निराकरण करते रहना तथा तनाव प्रबंधन ऐसे गुर है जिनकी मदद से पुलिस कर्मियों की दक्षता में इजाफा किया जा सकता है। पुलिस अधीक्षक सहित वरिष्ठ अधिकारी सतत इस दिशा में प्रयास करते रहे है जिसके कारण हम विषम परिस्थितियों में बेहतर परिणाम दे रहे हैं।