Friday, 5 February 2016

मिल्क  प्रोटीन के नैनो पार्ट से कैंसर का इलाज
-कीमो थैरेपी उपचार में आ सकता है क्रांतिकारी बदलाव
 -जबलपुर की छात्रा की रिसर्च लगभग पूरी
पीपुल्स संवाददाता
9424514521
जबलपुर। गाय के दूध की गुणवत्ता को लेकर जहां दुनिया भर में रिसर्च एवं दावे चलते रहे हैं, लेकिन जबलपुर में साइंस कॉलेज की छात्रा ने मिल्क में मौजूद कैसीन प्रोटीन को कैंसर के इलाज में डिलीवर की तरह उपयोग करने जा रही है। इस तकनीक में नैनो पार्टिकल्स का अहम उपयोग है। जहां नैनो टेक्नालॉजी के साथ यह परिकल्पना की गई थी। नैनो मशीनरी दवा की तरह रक्त में भ्रमण कर बीमारी के कीटाणुओं को मारेगी। इस परिकल्पना को साकार करने की शुरुआत हुई है, लेकिन ये यंत्र दूध के प्रोटीन से तैयार हुआ है।
दूध में पाए जाने वाला कैसीन प्रोटीन आराम से रक्त में घूम सके, इसके लिए पहले इसका प्रोटीन के नैनो पार्टिकल तैयार किए हैं।  इस नैनो कैसीन प्रोटीन में यह खासियत विकसित की गई है कि वे मैग्नेटिक फील्ड की ओर आकर्षित होंगे। कैंसरग्रस्त अंग के समीप मैग्नेटिक फील्ड विकसित करने का कठिन काम नहीं है और इस प्रोटीन में कीमो थैरेपी की दवा में लोड होगी और वह मैग्नेटिक फील्ड से आकर्षित होकर नैनो प्रोटीन सीधे वहीं पर एकत्र होगी, जहां कैंसर सेल मौजूद है और कीमो थैरेपी की दवा अपना जादू दिखाना शुरू कर देगी।
इसके फायदे
इस नई तकनीकी का फायदा यह होगा कि कीमो थैरेपी की दवा जो कैंसर सेल के साथ ही स्वस्थ सेल को मारती थी। कीमो थैरेपी के साइड इफेक्ट हुआ करते थे, इस प्रणाली से वे काफी हद तक कम हो जाएंगे।
अनामिका कर रही रिसर्च
यदि रिसर्च पूरी तरह से कामयाब होती है तो कैंसर के इलाज के लिए यह चमत्कारी खोज भारतीय छात्रा अनामिका सिंह एवं उनके निदेशक डॉ. एके वाजपेयी के खाते में जाएगी। पुलिस विभाग के सब-इंस्पेक्टर रवि करण सिंह की पुत्री घमापुर निवासी अनामिका सिंह ने शासकीय साइंस कॉलेज, जबलपुर से एमएससी रसायन शास्त्र में की है। इसके बाद पिछले चार वर्षों से पॉली कैमेस्ट्री विषय पर मिल्क प्रोटीन पर रिसर्च का कार्य कर रही है। हाल ही में इंदौर में हुए साइंस कॉन्फ्रेंस में उनके रिसर्च पेपर प्रस्तुत किए गए, जिसे न केवल काफी सराहा गया, वरन् प्रथम पुरस्कार भी मिला है।
ऐसे करेगा काम
कैसीन प्रोटीन के नैनो पार्ट का गुण स्पंज की तरह होता है। इसमें कीमो थैरेपी की दवाएं कैसीन प्रोटीन सोख लेता है।  बल्ड में नैनो प्रोटीन इंजेक्ट किए जाते हैं, जो दवाई लिए उसका परिवहन करते हैं। इसके पूर्व ही कैंसर संभावित अंग के आसपास  मैग्नेटिक फील्ड को विकसित करने वाले यंत्र स्थापित कर दिए जाते हैं, जो की मानव शरीर के बाहर लगाए जाते हैं। मैग्नेटिक फील्ड में  दवा युक्त एंटीबॉडी यानी नैनो कैसीन जो कि मैग्नीटिक फील्ड के प्रति संवेदनशील होती है, वह मैग्नेटिक फील्ड के समीप यानी कैंसर प्रभावित अंग के पास एकत्र हो जाते है। इसके बाद मैग्नेटिक फील्ड की रेंज बढ़ाने पर कैसीन सिकुड़ता है तथा उससे दवाई बाहर आ जाती है।
जानवरों पर होगा रिसर्च
दूसरे चरण का रिसर्च छात्रा द्वारा
डेढ़ साल तक जानवरों पर किया जाएगा। जानवरों पर इस थैरेपी संबंधी रिसर्च त्रिवेन्द्रम इंस्ट्टीयूट में किया जाएगा। रिसर्च के बाद यह मानव में प्रयोग के लिए भारत सरकार के हवाले किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि पहले चरण का शोध साइंस जर्नल में प्रकाशित हो चुका है। पूरी दुनिया से इस शोध पर सराहना मिल रही है। शोध को आगे बढ़ाने कई कम्पनियां अपनी रुचि भी दिखा रही है।
...वर्जन...
नैनो पार्टीकर पर रिसर्च पूर्ण कर लिया गया है तथा रिसर्च पेपर भी तैयार कर लिए हैं। अगले चरण मे जानवरों  पर शोध कार्य किया जाना है।  शोध के बाद मानव पर सफल प्रयोग होने पर ही यह दवा के रूप में बाजार में आएंगी।
अनामिका सिंह, साइंस शोधार्थी

अनामिका ने अपना रिसर्च लगभग पूरा कर लिया है। इसके दूसरे चरण में त्रिवेंद्रम में जानवरों पर रिसर्च किया जाना है जिसके लिए अनुमति मिल चुकी है।
 डॉ. एके वाजपेयी
प्रोफेसर रसायनशास्त्र विभाग
 साइंस कालेज जबलपुर

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