Wednesday, 6 April 2016

सिंघाड़ा भारतीय संस्कृति में रचा बसा फल


सेहत और स्वाद में लाजवाब 
 हलवाऔर पूड़ी का जायका उपवास में भी   

सिंघाड़ा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा फल है, जिसका साधु-संत और श्रद्धालुजन फलाहार में उपयोग करते है। दीवाली पर सिंघाड़ा आवश्यक रूप से लक्ष्मी जी को धान की लाई के साथ चढ़ाया जाता है। भारतीय सांस्कृति में सिंघाड़ा का महत्व इसलिए है कि इससे जीविकोपार्जन के लिए एक बड़ा वर्ग जुड़ा है। इसके अलावा सिंघाड़ा ऐसा फल है जिसका आटा भी बन जाता है। बस फिर क्या है आटे की अपनी खूबी होती है, इससे तरह तरह की डिस् तैयार होती है उपवास में जायकेदार भोजन उपलब्ध हो जाता है, वह भी फलहार। 
 फलाहारी  हलवा 
व्रत-उपवास में सिंघाड़े को फलाहार में शामिल किया जाता है। इसके बीज को सुखाकर और पीसकर बनाए गए आटे का सेवन किया जाता है। घर में जब सिंघाड़े के आटे का भूनकर हलुआ (काची) तैयार की जाती है तो उसकी मोहक खुशबू पकवान बनने की खबर आसपड़ोस के लोगों को दे देती है। 
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बाक्स -बनाने की विधी 
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विधि- 
सिंघाडे का आटा     :             1  कटोरी 
शक्कर                :             1 /2  कटोरी
 देसी घी               :             1 /2  कटोरी 
सर्व प्रथम कढाई में घी डाले । इसके बाद आटा को घी में डाले और धीमी आंच पर गुलाबी कर ले।  एक ग्लास  पानी डाले और चलाते रहे, जब थिक हो जाय तब शक्कर डाल दे ।  मध्यम आंच पर चलाते रहे थोड़ी देर में  एक ी थाली में घी लगा कर हलवा डालकर फैला दे और ठंडा करे । हलवा ठंडा होने पर जम जायेगा  तब उसे चाकू से काट कर निकाल दें। 
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फलाहारी व्यंजन
सिंघाड़े को हल्का उबालकर सेंधा नमक (उपवास में उपयोग आने वाला नमक) के साथ खाया जाता है। शिवरात्रि ,एकादशी उपवास तथा शीत ऋतु में धार्मिक व्रत में उपवास के दौरान इसे खाया जा सकता है। 
फलाहारी डिस और खोबे की जलेबी बनाने के मामले मे फैम बडकुल मिष्ठान के संचालक चंद्र प्रकाश बड़कुल ने बताया कि उनकी होटल में सिंघाड़ा कंद स्पेशल डिस है। यह दरअसल जिस तरह मावा से रसगुल्ला तैयार किया जाता है वैसे ही सिंघाड़े के आटे का मावा तैयार कर इससे सिंघाड़ाकंद तैयार किया जाता है। सिंघाड़े के सेव नमकीन, सिंगाड़ा की पुड़ी, सिंघाड़ाके आटे का हलवा, सिंघाड़े के आटे की बर्फी (काची) सिंघाड़ा का लड्डू, भजिया, आलू बंडा, सिंघाड़ा-साबुदाना का बड़ा आदि दर्जनों फलाहारी आईटम बनाए जाते है और लोग घरों में बनाते है। 
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खूबियों से भरपूर 
आयोडीन एक ऐसा तत्व है जो समुद्री मछली, हल्दी, केला और सिंघाड़ा में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। ये सभी उत्पादन जल अधारित है। पानी में उगने वाला सिंघाड़ा पौष्टिकता से भरपूर होता है। इसमें प्रचुरता से व्याप्त खजिन 
तत्व पाए जाते है जो कई बीमारियों में फायदे मंद रहते है। जैसे की घेंघा रोग जो आयडीन की कमी से होता है, इसके निदान में सिंघाड़ा रामबाण है। स्मृति बढ़ाने वाला फल सिंघाड़ा है। इसमे मौजूद आयोडीन स्मरण शक्ति भी बढ़ाता है। सिंघाड़े में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन बी व सी, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयोडीन तथा रायबोफ्लेबिन जैसे खनिज तत्व एवं लवण होते हैं। ये तत्व अनेक रोग से बचाव करते हैं। इसमें कार्बोहाइडेÑड भी प्रचुर मात्रा में होता है जिसके कारण उपवास में आहार के रूप में उपयोग होता है। 
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जीविका साधन 
विचारणीय तथ्य से है कि फास्ट फुड के दौर में भी उबला हुआ सिंघाड़ा खूब बिकता है और खाया जा रहा है। सिंघाड़ा कर उसे बेचने वालों की कमी नहीं है। अममून जबलपुर शहर में सौ से अधिक लोग सिंघाड़ा बेचकर तीन माह रोजगार पाते है। 
सिंघाड़ा उत्पादन में जबलपुर में ही सैकड़ों परिवार लगे है। यहां प्रचुर मात्रा में सिंघाड़ा का उत्पादन होता है। दरअसल उथले पानी वाले तालाब में सिंघाड़ा की सदियों से खेती होती आई है। भारतीय जल प्रणाली में छोटे-बड़े तालाब प्रचुरता से पाए जाते रहे है। सैकड़ों साल में तालाब जब छिछले होने लगते है तब इसमें सिंघाड़े की खेती होती है तालाब पर्यावरण और जल संवर्धन के साथ जीविकोपार्जन का जरिया आदि काल से रहे है। तालाब में सिंघाड़े की उन्नत खेती प्राचीन समय से है। जबलपुर सिंघाड़े की प्रदेश में बड़ी मंडियों में एक रही है। इसकी वजह यह रही है कि गोंडकाल में जबलपुर में 52 ताल तलैया हुआ करते थे जिसमें से अधिकांश में बाद में सिंघाड़े की खेती होने लगी लेकिन अब तालाब सिमट गए है और जबलपुर शहर में सिंघाड़ा खेती कम हुई है लेकिन जिले में अब भी बड़ी मात्रा में सिंघाड़ा उत्पादन हो रहा है। 
तालाब में पानी में पैदा होने वाला सिंघाड़ा में फूल अगस्त माह में आ जाते है। तालाब के उपर फैले पत्तों के नीचे सिंघाड़े की जड़ रहती है जिसमें सिंघाड़ा फलता है। कृषक छोटी छोटी डोंगियों (नाव) में सवार होकर ठंड की कुनकुनी धूप में दिन भर सिंघाडेÞ के पौध उठाकर तैयार फल तोड़कर पौधे 
तालाब में वैसे ही छोड़ देते है। फसल तुड़ाई का काम अक्टूबर नवम्बर तथा   दिसम्बर माह तक चलता है। सिंघाड़े की फसल दीवाली के समय से आना शुरू हो जाती है। तिकोने आकार के फल खूबियों से भरा होता है। 
 जबलपुर है बड़ी मंडी 
सिंघाड़ा के थोक व्यापारी महेश साहू ने जानकारी दी कि सिंघाड़ा का जबलपुर में एक सयम ऐसा उत्पादन होता था।  सिंघाड़ा की खेती करने वालों की बस्ती सिंघरहा मोहल्ला अब भी गढ़ा क्षेत्र में स्थित है। सिंघरहा जाति भी है। वर्तमान में करीब 100 से अधिक परिवारों की जीविका सिंघाड़ा के कारोबार से जुडेÞ है। इसके अतिरिक्त सैकड़ों की संख्या में श्रमिकों को सिंघाड़ा उत्पादन और , बिक्री से रोजगार मिलता है। जबलपुर से अनेक प्रदेशों में सिंघाड़ा भेजा जाता है। गुुजरात , महाराष्ट्र से होकर सिंघाड़ा विदेश तक जाता है। करीब 3000 बोरा सिंघाड़ा प्रतिदिन जबलपुर के बाहर जा रहा है। जबलपुर, सिहोरा, पनागर, मझौली, भेड़ाघाट, शहपुरा सहित अन्य स्थानों में करीब 150 तालाबों में सिंघाड़ा की खेती होती है। दिसम्बर तक सिंघाड़ा की फसल आती रहेगी। सिंघाड़ा के प्रमुख व्यापारियों में शिव कुमार रैकवार, राम प्रसाद, पनागर सिहोरा में अब्बास एवं इजराल हैं। 
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